हवाओं ने रुख क्या बदला,
सारे पत्तों ने अपनी जगह छोड़ दी,
हम जड़ थे, सो जमे रहे,
और आँधियों ने राह मोड़ ली।
कल तक सवार था उनका जुनून माथे पर,
आज उसी याद ने नींदें तोड़ दीं,
जिस नाम से सजती थीं हर सुबहें,
उसी नाम ने शामें निचोड़ दीं।
हमने खामोशी को भी वफ़ा समझा,
उन्होंने खामोशी से ही बात मोड़ ली,
हम तो ठहरे रहे उसी चौखट पर कुछ देर,
उन्होंने उन राहों से परछाईं भी मोड़ ली।
सच तो ये है, हेमंत…
तुम एक ही दिन में नहीं टूटे हो,
इतने सालों की वफ़ा के धागों को
एक ही झटके में अपने हाथों से तोड़े गए हो।
अब नहीं पूरा होगा वो सफ़रनामा
जिस पर टिका था जीवन हमारा,
हम उम्र भर धागों-सा बुनते रहे,
उन्होंने एक ही झटके में उधेड़ दिया सारा ताना-बाना।
हम सालों से घर बनाते रहे,
वो एक लम्हे में मलबा कर गए,
हम साँसों से सींचते रहे रिश्ता,
वो खामोशी से बंजर कर गए।
हवाएँ आज भी चलती हैं,
पर अब पत्ते गिरने का डर नहीं,
क्योंकि पेड़ खड़ा तो है अभी,
बस हरियाली उसका घर नहीं।
और अंत में बस इतना जाना —
उम्मीदें मत रखो, बस निभाते जाओ,
अपनी ही चाहत को समझाते जाओ,
तुम्हें हक नहीं है सवाल करने का —
ये भी खुद को ही सिखाते जाओ।