Wednesday, 31 December 2025
मैं फिर लौटूंगा
Saturday, 27 December 2025
दो लफ्जों का साथ तेरा
Thursday, 25 December 2025
ख़ामोश खोज
Tuesday, 23 December 2025
"में तुम्हे चुन लूंगा"
तेरी साँसें, मेरी कहानी
Wednesday, 17 December 2025
मजबूरी का हौंसला
Thursday, 11 December 2025
✨ अगले मोड़ पर मोहब्बत ✨
Thursday, 4 December 2025
“पिताजी की याद में”
Saturday, 29 November 2025
उलझनों के रंग
Friday, 28 November 2025
✨ क्या अब भी तुम वहीं हो ना ✨
तू इतना जरूरी क्यों है
Wednesday, 26 November 2025
खुद से मुलाक़ात — एक सफ़र
Saturday, 22 November 2025
मोहब्बत की हद
Sunday, 9 November 2025
💔 "आँसू क्यों निकल आते हैं" 💔
Wednesday, 5 November 2025
तुम खत्म, मै खत्म
💫 और कितनी ज़िद करोगी… 💫
Wednesday, 29 October 2025
ज़िद है जितने की
फ़नाः ए इश्क
Friday, 24 October 2025
बस यादों में ही
Sunday, 12 October 2025
💔 थोड़ी कमी सी लगती है... 💔
Thursday, 9 October 2025
🌿 जीवन दर्शन 🌿
Wednesday, 8 October 2025
🕊️ ज़िंदगी का सफ़र अकेले मत करना
Monday, 6 October 2025
मन का महाभारत
💫 वो अपना सा 💫
कोई तुमसे पूछे — कौन हूँ मैं,
कह देना — दोस्त हूँ, सच्चा सा, अपना सा। 🤝
खड़ा रहता है ढाल बनकर,
हर मुश्किल में — बिना कहे, तेरे सिर का दर्द बनकर। 😄
हँसते-रोते हर जज़्बात में,
साथ देता है — आधी रात में भी बात में। 🌙
कोई साथ न दे, हर रिश्ता निभाता है,
खुश रखता है — दुखों में भी मुस्कान लाता है। 😊
जैसा भी वक्त आए —
कभी बाप, कभी माँ, कभी यार,
कभी झगड़ू बनकर भी करता है प्यार। ❤️
यादों में बसा हर प्यारा पल,
सुख-दुख में साथी, कभी अलग नहीं।
वो मेरी बगिया का फूलों का —
गुच्छा है, अच्छा है, सच्चा अपना सा। 🌸
कभी लड़ाई भी हो, तो भी दिल न टूटे,
हर हँसी, हर आँसू, हर पल —
सच्चा, अपना सा, भरोसे का साथ न छूटे। 💫
मेरा नहीं है वो,
पर हर मुश्किल में किनारा है, सहारा है,
लगता है — उसी से हौसला है,
मुस्कान है मेरी, मेरे आसमान का तारा है। 🌟
Saturday, 4 October 2025
🌸 मैं अकेली नहीं हूं 🌸
Tuesday, 30 September 2025
रिश्तों का अंत
Monday, 29 September 2025
👨👧 पिता और बेटी 👨👧
Friday, 26 September 2025
राधा का कृष्ण, मीरा का श्याम
Thursday, 25 September 2025
अगर सपने सच होते
Wednesday, 24 September 2025
तेरे साथ होने के ये एहसास
Monday, 22 September 2025
मुलाकातों का सिलसिला
Saturday, 20 September 2025
मेरा बचपन
Thursday, 18 September 2025
तेरी आंखें और हंसी
भगवान की बनाई सीक्वेंस
Thursday, 11 September 2025
"ट्रैफिक जाम"
ट्रैफिक जाम,
हर तबका हर इंसा परेशान,
ये रोज रोज का काम,
नहीं मिलता बिल्कुल भी आराम ।
हर चौराहा रेड लाइट,
स्थिति बहुत है टाइट,
हौसला है थका,
सिर्फ उम्मीदों पर टीका ।
बेवजह का शोर,
नहीं चलता अपना जोर,
कोशिश आगे निकलने की,
एक दूसरे को पीछे छोड़ने की ।
तब कान फूट जाते हैं
जब सारे हॉर्न बज जाते हैं
कईं इंजन शोर मचाते हैं
प्रदूषण का इंडेक्स बढ़ाते हैं ।
अस्पतालों के बेड भर रहें
करोड़ों लोग पीड़ित बन रहे,
कईं सांस नहीं ले पा रहे,
बाकी अपने फेफड़े में धूल जमा रहे ।
बेवजह का चक्काजाम,
दुकानदार फैला रहा सड़क पर दुकान,
कोई अपनी हद पार कर रहा,
उधर एम्बुलेंस में लेटा भगवान को याद कर रहा ।
सिपाही सिटी बजा रहा,
जैसे कानों में म्यूजिक सुना रहा,
इंस्पेक्टर चलान बना रहा,
आम आदमी अपनी जेब से चुका रहा ।
सड़क पर ठेलों का राज,
भीड़ में खड़े जोर जोर से देते आवाज,
एक दिन सब सुधर जाएगा,
क्या मालूम वो दिन कब आएगा ।
क्यों नहीं अपनाते पब्लिक ट्रांसपोर्ट,
नहीं जाना पड़ेगा चालान चुकाने कोर्ट,
सड़कों को भी थोड़ी सांस आएगी,
सबकी 2- 4 साल जिंदगी बढ़ जाएगी ।
अब नई पीढ़ी आयेगी,
साफ़ हवा संग मुस्कुराएगी,
हर बच्चा होगा तंदरुस्त,
युवा रहेंगे मन और शरीर होगा स्वस्थ ।
हर सड़क पर हरियाली होगी,
न धुआं, न कचरे की ढेरी होगी,
साफ़ हवा का तोहफ़ा पाएंगे,
पक्षियों की चहचहाहट फिर से लौटाएंगे ।
ना हॉर्न का शोर, ना जाम की मार,
साइकिल और पैदल चलना होगा अपार,
पब्लिक ट्रांसपोर्ट बनेगी पहचान,
कम होगा प्रदूषण, शहर का बढ़ेगा सम्मान।
जब सांसें होंगी हल्की और साफ़,
दिल भी रहेगा मजबूत और ख़ास,
नई सुबह एक वादा लाएगी,
अबकी पीढ़ी मुस्कुराती जाएगी।
भाई कहां खो गया,
तब इस जाम से भी मुक्ति मिल जाएगी ।
ए इश्क़ — तू क्या चाहे
Wednesday, 10 September 2025
मंजिल यही है
कभी-कभी रस्ते नहीं,
खुद को बदलना पड़ता है ।
जिस मंजिल की तलाश में चले थे,
उसे भी छोड़ना पड़ता है।
उम्र निकल जाती है पहुँचने में,
कईं अपनों का साथ छोड़ना पड़ता है।
राह दर राह बदलते रहे हम,
मुकाम भी वहीं मिला,
जहाँ से चले थे हम।
कितने करीब से निकले थे,
हम मंजिल के,
फिर भी, दूरियों का अहसास था।
शायद, मंजिल नहीं,
सफर ही जिंदगी का सार था।
अब चलते हैं हम,
बिना किसी मंजिल की आस में,
हर हर कदम पड़े अपनों के साथ से ।
यहां हर कदम पर नया सवेरा है।
और हर मोड़ पर एक नई कहानी है।
यही तो अपनी जिंदगानी है।
Tuesday, 9 September 2025
ठहर जा अब
Sunday, 7 September 2025
तुम
✨ कड़ी, जोड़, संबंध✨
🌸 संबंध की ताक़त 🌸
दिखने में तो छोटी-सी है,
पर काम बड़े-बड़े कर जाती है।
तोड़ दो चाहे सब कुछ जीवन में,
ये एक झटके में जोड़ जाती है।
ध्रुव तारे से जब जोड़ो इसे,
ज्ञान का पथ प्रकाशित हो जाता है।
सितारों में ढूंढो जब इसको,
तो सप्तऋषि रूप सामने आ जाता है।
रिश्तों से जोड़ो तो रिश्तेदार,
अनजान से जोड़ो तो दोस्ती बन जाते।
हर जोड़ में छुपी एक दास्तान होती है,
कुछ नई खिलती, कुछ पुरानी पहचान होती है।
एक-एक जोड़ते जाओ तो,
कईं सुराग़ सामने आ जाते हैं।
कईं रहस्यों की परतें खुल जातीं,
छुपे हुए राज़ सामने आ जाते हैं।
DNA के रहस्य भी उजागर हो जाते,
जब खून से धागे जुड़ जाते।
पर इंसान ही अक्सर चूक जाता है,
रिश्तों में जोड़ना भूल जाता है।
अगर जोड़ ले अपने परिवार से,
तो रिश्तों के फूल खिल उठते हैं।
खुशियों के ताले खुल जाते हैं।
संबंध ही सच्ची शक्ति है,
जो दिल के द्वार खोल देती है।
बिन कुंजी भी जब जुड़ जाए,
तो हर राह रौशन हो जाती है।
Saturday, 6 September 2025
परिवार के संबंध
मेरी एक नई रचना से फिर से शुरुआत कर रहा हूं ।
माँ-बाप से बच्चा जो रिश्ता पाता,
उसमें सारा संसार समा जाता।
यह रिश्ता ही जीवन का पहला गीत,
हर पल देता स्नेह का मीत।
भाई-बहन का मीठा नाता,
खुशियों से भरा हुआ प्यारा साधा ।
कभी झगड़ा, कभी हंसी की बात,
नाते से ही सजती जीवन की रात।
पति-पत्नी का गहरा बंधन,
सुख-दुख में बनता अटूट संगम।
बंधन से ही जीवन संवर जाता,
हर आंधी तूफ़ान को पार कर जाता।
दादा-दादी का स्नेहिल संपर्क,
बचपन में भर देता अद्भुत आकर्षण ।
संपर्क से ही पीढ़ियाँ जुड़ पातीं,
अनुभव की रोशनी इसे आगे बढ़ातीं।
दोस्तों से जो गहरा लगाव हो जाए,
तो मन का बोझ हल्का हो जाए।
लगाव ही है जीवन की सच्ची पूँजी,
जिससे हर मुश्किल हो जाए दूजी।
रिश्तों में जब जुड़ाव गहराता है,
दिल से दिल का फासला मिट जाता है।
जुड़ाव ही है अपनापन की निशानी,
जो बना देता है पराया भी अपना पानी।
परिवार में बसती आत्मीयता की धारा,
जो हर दिल को बना दे प्यारा।
आत्मीयता से ही बंधे घर-आँगन,
यही है जीवन का सबसे बड़ा धन।
हर पीढ़ी की अपनी अलग कड़ी है,
पर इन्हें जोड़ती प्रेम की लड़ी है।
कड़ी से ही चलता वंश का क्रम,
यही बनाता जीवन को गरिमामय दम।
दिल से दिल का सच्चा मेल,
बिन शब्दों के कह देता खेल।
मेल से ही रिश्ते खिल उठते हैं,
हर कोना फूलों-सा महक उठते हैं।
जीवन में परस्परता ज़रूरी है,
यही तो परिवार की मजबूती है।
परस्परता से बढ़ता अपनापन,
यही है जीवन, यही है संबंध का दर्पण।
हेमंत शर्मा