Wednesday, 31 December 2025

मैं फिर लौटूंगा

टूट गया था मैं बिल्कुल,
हिम्मत साथ छोड़ने लगी थी,
खुद को समेट भी नहीं पा रहा था,
फिर भी कहीं भीतर
बच गया मैं।

दर्द हुआ था मुझे,
ऐसा जो किसी को दिखा नहीं,
दिन चलता रहा,
रात भारी होती गई,
फिर भी
बच गया मैं।

कड़वाहट भर गई थी मुझमें,
हर बात चुभने लगी थी,
अपनों से भी दूरी बनने लगी,
उस हाल में भी
बच गया मैं।

डर गया था मैं,
अपने ही ख्यालों से,
आगे का रास्ता धुंधला था,
पीछे कुछ बचा नहीं था,
तब भी
बच गया मैं।

घबरा गया था मैं,
जब सब कुछ हाथ से फिसलने लगा,
सवाल बहुत थे,
जवाब कहीं नहीं,
उस पल में भी
बच गया मैं।

लौटने वाला था मैं,
सब छोड़कर,
खुद से हार मानकर,
पर उसी मोड़ पर
बच गया मैं।

अब मैं चलता रहूँगा,
निडर होकर,
खुद को जोड़ता रहूँगा,
दर्द को पीछे छोड़कर—
मैं लौटूँगा फिर।

Saturday, 27 December 2025

दो लफ्जों का साथ तेरा

थोड़ी थोड़ी सी ही सही,
मगर बातें तो किया करो।
ख़ामोशी बहुत भारी पड़ती है,
कभी दो लफ़्ज़ों में ही जी लिया करो।

हमेशा मुस्कान ही सच नहीं होती,
कभी उदासी भी पढ़ लिया करो।
जो कह न सकूँ लफ़्ज़ों में मैं,
उसे मेरी आँखों से समझ लिया करो।

कभी साथ चलते नहीं हो मेरे,
थोड़े कदम मेरे संग बढ़ा लिया करो।
मंज़िलें यूँ ही आसान हो जाएँगी,
थोड़ा-सा मेरा भी हाथ थाम लिया करो।

अगर कभी थक जाओ रास्तों से,
तो मुझमें थोड़ा ठहर लिया करो।
मैं हर मोड़ पर साथ रहूँगा,
बस यूँ ही मेरा यक़ीन किया करो।

मुझसे नाराज़ होना सीखो ज़रा,
पर दूर कभी मत रहा करो ।
कुछ शिकवे मुझसे कह लिया करो,
ख़ामोशी में सब छोड़ मत दिया करो।

Thursday, 25 December 2025

ख़ामोश खोज

वो आज भी अपने होने का सबब ढूंढती है,
ख़ामोश सवालों में अपना जवाब खोजती है।

जो भोर होने से पहले ही उठ जाती है,
वो अपने जीवन में उजाले की किरण खोजती है।

लगा देती है दाँव पर ज़िंदगी परिवार के लिए,
और बदले में फ़र्ज़ों की फेहरिस्त के निशान खोजती है।

सभी को ख़ुश करने में ख़ुद ही मिट जाती है,
पर वही थकान मिटने के लिए सुकून का कोना खोजती है।

घरों को चहचहा कर ज़िंदा रखने वाली,
अपने ही घर में हक़ मांगने का अधिकार खोजती है।

वो हर बार बिखरती है, फिर भी सवाल नहीं करती,
बस चुपचाप अपने होने का सबब खोजती है।

तब भी नहीं आने देती पैशानी पर सलवटें कभी,
अपनों के लिए अब भी मर-मिटने का जस्बा खोजती है।

Tuesday, 23 December 2025

"में तुम्हे चुन लूंगा"

तुम वो चुन लेना जो तुम्हें सही लगे,
और मैं तुम्हें चुन लूँगा।

तुम अगर मुस्कुराकर भी कुछ छुपा लो,
मैं तुम्हारी आँखों से सब पढ़ लूँगा।

तुम्हें ज़रूरत न पड़े कुछ कहने की,
मैं हर बात ख़ामोशी में सुन लूँगा।

तुम अगर वक़्त की धूप में झुलस जाओ,
मैं छाँव बनकर हर क़दम चलूँगा।

तुम्हारे डर अगर मुझसे भी छुपे रहें,
मैं फिर भी तुम्हारा हौसला बनूँगा।

तुम जहाँ खुद से भी सवाल करोगी,
मैं वहीं तुम्हारा यक़ीन बनूँगा।

तुम बस अपना दिल चुन लेना,
और मैं उम्र भर तुम्हें चुन लूँगा।

तेरी साँसें, मेरी कहानी

तू वो हस्ती है
जिसमें मेरी दुनिया बसती है।
तेरी मुस्कुराहट से मेरी दुनिया चलती है,
तेरी उदासी से मेरी दुनिया ढलती है।

मेरे हर कदम में तेरी आहट होती है,
तेरे होने से ही दिल में बसाहट होती है।
धड़कनें चाहे कितना भी शोर करें,
मेरी साँसें तुझ पर आकर ही थम जाती हैं।

तू साथ हो तो डर भी कम लगता है,
हर रास्ता थोड़ा अपना सा लगता है।
तू समझ लेता है बिना कुछ कहे,
इसलिए दिल तुझ पर आकर ही टिकता है।

ना ज़्यादा चाहत, ना कोई दिखावा,
बस तेरा होना ही काफ़ी है।
मेरी इस सादी सी ज़िंदगी में,
तेरी मौजूदगी ही सबसे बड़ी कहानी है।

Wednesday, 17 December 2025

मजबूरी का हौंसला

वो फिर से उठ खड़ा हो जाता है,
सुबह की नींद में बसे सपनों को तोड़कर,
निकल पड़ता है अकेला
जलती धूप में,
छाँव के लिए लड़ने का बहाना ओढ़कर।

कुछ चुभन उसे भी रोज़ होती है,
मसले हैं उसके
जो कभी खत्म नहीं होते,
फिक्र ने उसे मजबूत बनाया है
मगर
पहले उसे हर रोज़
कमज़ोर करके।

कंधों पर ज़िम्मेदारियों का बोझ है,
और जेब में
ख़ामोश तंगी,
वो थकता है—
पर रुकने की
इजाज़त उसे नहीं।

कोई नहीं पूछता
आज दर्द कितना है,
वो मुस्कुरा देता है
और अपने आँसू
अंदर ही कहीं
सुला देता है।

शाम ढलती है
तो उसका जिस्म बैठ जाता है,
पर अगली सुबह
फिर वही कहानी—
वो फिर से उठ खड़ा हो जाता है।

Thursday, 11 December 2025

✨ अगले मोड़ पर मोहब्बत ✨


अगले मोड़ पर सुकून होगा,
चल ज़िंदगी थोड़ा और चलें।
अभी रिश्तों में थोड़ी नमी है,
आगे दिलों में कोई भीगी कहानी मिले।

कदम थमा नहीं करते,
दर्द भी राहों में साथी बन चले;
हर मोड़ पर एक नया दर्द मिलता है,
क्या पता दर्द बाँटने वाला अगले मोड़ पर मिले।

कभी कोई मुस्कान राह रोक ले,
तो शायद दिल फिर से यक़ीन करना सीख ले;
टूटे मौसम भी नए रंग दिखाते हैं,
जब किसी की आँखों में अपना-सा नूर मिले।

चल, उम्मीद का हाथ थाम लें,
अधूरी चाहतें भी पूरी बन कर खिल उठें;
क्या पता अगले पते पर
किसी दिल के दरवाज़े पर हमारा नाम लिख दे।

फिर सफ़र भी क्या-ही प्यारा लगे,
जब साथ में हाथ की गर्माहट मिले;
दुनिया अपनी जगह रहे—
और हम छोटी-सी ख़ुशी में पूरी दुनिया पा लें।

Thursday, 4 December 2025

“पिताजी की याद में”

आज भी एहसास होता है,
कि एक साया हमेशा साथ चलता है,
जब भी मन कहीं उदास होता है,
आपके होने का ही आभास मिलता है।

सीख आपकी अब भी राह दिखाती है,
हर मुश्किल को आसान बनाती है,
आपकी सिखाई छोटी छोटी बातें,
आज भी जीवन में काम आती  हैं।

प्यार आपका यूँ ही धड़कनों में बसा है,
सख़्त लहज़े में छिपा अपनापन जैसा है,
कभी डाँट में, कभी मुस्कान में मिला—
वो स्नेह अब भी मेरे साथ चला।

आदर्श आपके जैसे पर्वत से अटल,
व्यक्तित्व आपका उजाला-सा निर्मल,
आपके शब्द, आपके तरीके, आपकी पहचान—
आज भी जीवन की सबसे बड़ी खदान ।

प्रेरणा आपकी हर मोड़ पर संभालती है,
गिरने से पहले ही थाम लेती है,
आपकी बातें, आपका विश्वास—
मेरे कदमों को अब भी ताक़त देती है।

आपकी कमी तो हर पल खलती है,
आपके बिना ये दुनिया अधूरी-सी लगती है,
पर आपकी छाप दिल में इतनी गहरी है—
कि लगता है आप यहीं, मेरे पास ही कहीं हैं।

आपके जाने के बाद भी पिताजी,
आप रुके हुए हैं मेरे हर काम में,
मेरे हर निर्णय में, हर साँस में,
मेरी हर जीत में… मेरी हर याद में।

Saturday, 29 November 2025

उलझनों के रंग

यूं ही उलझा हुआ-सा रहने दे तुझमें,
अभी जीने की तमन्ना बची है थोड़ी।
अगर सुलझ गया तो बिखर जाऊंगा,
तेरे ही अक्स में जिंदा रहने दे मुझे।

मुझे यूं बेफ़िक्रा-सा होना नहीं जमता,
थोड़ा अपने करीब ठहरने दे।
अभी तो तेरे सवाल समझने हैं,
मुझे तेरे जवाबों में ही उलझा रहने दे।

इतने सालों से देखता रहा हूँ तुझको,
और कोई तस्वीर जमती ही नहीं।
एक आईना ही है जो तुझे बना सके,
तू नहीं मिली, उस आईने को ही रखने दे मुझे।

तुझे आज तक समझ नहीं पाया,
उन नाज़ुक भावों तक पहुँच नहीं पाया।
दिल की तड़प बाकी रहने दे तुझमें,
तेरे बिना तेरा ही एहसास रहने दे मुझमें।

Friday, 28 November 2025

✨ क्या अब भी तुम वहीं हो ना ✨

जहाँ से हम हाथ पकड़े चले थे,
बंधन दुनिया के तोड़े थे,
राहें बदल गई, मोड़ छूट गए,
क्या अब भी तुम वहीं हों ना।

हमने जो ख्वाब आधे-अधूरे बोए थे,
क्या उनकी ख़ुशबू तुम तक पहुँचती है,
रातों की ख़ामोशी में कहीं
मेरा नाम अब भी तुम पुकारते हो ना।

हम वक़्त से हारकर अलग तो हुए,
पर एहसासों की डोर कहाँ छूटी,
दिल के किसी चुप कोने में
धडकनों में अब भी मुझे ढूंढते हो ना।

जिसपे जानिसार थी सारी खुशियाँ,
वो थी मेरी खुशियों की बगियाँ,
छूटा था साथ जहाँ अपना—
अब भी तुम… शायद वहीं हो ना।

तू इतना जरूरी क्यों है

तू इतना भी ज़रूरी क्यों होता है,
मेरा है—पर मेरे हिस्से में आता भी नहीं,
फिर भी खयालों में रहता है—
शायद ज़िद है दिल की,
ओर ये दिल है कि, मानता ही नहीं है।

दिनभर की थकान के बाद
सुकून की नींद सुलाता भी तू ही है,
सपनों में रहता है—
सुबह उठता भी तू ही है।
तू इतना ज़रूरी क्यों होता है?

मेरे अनगिनत अनसुलझे सवाल
इनके जवाब लाता भी तू ही है
मेरे हर मोड, हर गली के रास्ते
मंजिल पर पहुंचाता भी तो तू ही है ।

जब भी मैं निराश हूँ तो
तू ही तो आशा की किरण ले आता है ।
में तो तेरा कोई भी नहीं लगता
फिर भी तू ही इतना ज़रूरी क्यों होता है?

सबर नहीं होता तुझसे मिलने का,
तू दूर है, पर लगता सबसे करीब-सा है,
जैसे हवा को छू न पाएं, पर महसूस सा लगता है,
वैसे ही… हर पल तू ही ज़रूरी होता है।

Wednesday, 26 November 2025

खुद से मुलाक़ात — एक सफ़र

कभी-कभी रो भी लेना चाहिए,
दिल का बोझ हल्का कर देना चाहिए।
जब बह जाएँ दर्द के सारे निशान,
तो आँसू पोंछकर फिर मुस्कुराना चाहिए।

कभी राह अकेली भी चुननी पड़ती है,
संग-साथ की भी कीमत चुकती है।
हिम्मत करो अकेले सफ़र को तय करने की—
न लगे मन को ठीक, तो वापस लौट आना चाहिए।

कभी-कभी खुद पर गुस्सा भी आ जाना चाहिए,
दबा दर्द आवाज़ बन बाहर आना चाहिए।
हर बार गुस्सा बुरा नहीं होता,
बस खुद को ही शांत करना आना चाहिए।

कभी दुख और तकलीफ़ भी उठानी चाहिए,
दूसरों की पीड़ा भी महसूस होनी चाहिए।
यही तो वक़्त बताता है—कौन है अपना,
और खुद को ही दर्द से निकालना आना चाहिए।

कभी खुद से भी शर्मिंदा हो जाना चाहिए,
दिल की सफ़ाई का सबूत मिल जाना चाहिए।
गलतियों से डरना नहीं, मानना है उन्हें,
सही राह पर फिर लौट आना चाहिए।

कभी-कभी टूटकर बिखरना भी आना चाहिए,
गिरकर फिर उठने का हुनर जगना चाहिए।
हम भी बिखरकर ही समझते हैं—
कि खुद को खुद से जोड़ना फिर से आना चाहिए।

कभी-कभी उलझनों से भी भिड़ जाना चाहिए,
ये रास्ते हैं, बंधन नहीं—मान जाना चाहिए।
इन राहों की पहचान जरूरी है,
और खुद को ही सुलझाना आना चाहिए।

कभी-कभी किसी की बात बुरी भी लग जानी चाहिए,
सच के घाव से दिल तप जाना चाहिए।
पर लौटना है आखिर खुद की ओर ही—
क्योंकि खुद को ही मानना और मनाना आना चाहिए।

Saturday, 22 November 2025

मोहब्बत की हद

आज मोहब्बत भी एक हद में क़ैद नज़र आई,
वो पार कर गए अपनी सारी हदें  — 
फिर भी उसकी कोई ख़ता न पाई।

उसके लिए तो रिश्ते बस टूटता हुआ एक दायरा थे,
मेरी बारी आई… 
तो फिर उसे दायरे की याद आई।

उसकी चाहत के आगे कोई सरहद कभी नहीं ठहरी,
वो बंदिशें तोड़े तो कोई बात नहीं,
उसने मेरी हर कोशिश पर बस लगाम ही लगाई।


वो बेख़ौफ़ खेलते रहे अपनी मर्ज़ी की हर लकीर से,
और वही लकीर .....
सिर्फ़ मेरी बारी पर ही उसे फिर याद आई।

Sunday, 9 November 2025

💔 "आँसू क्यों निकल आते हैं" 💔


हर बात पर क्यों निकल आते हैं आँसू,
बात बेबात पर क्यों रुलाते हैं आँसू।

ज़ख़्म तो पुराने हैं, भर भी नहीं पाते,
तुम याद दिलाओ तो छलक जाते हैं आँसू।

लब ख़ामोश हैं, पर दिल पुकार उठता है,
हर नाम के पीछे तेरा चेहरा लाते हैं आँसू।

भुलाने की कोशिश में सौ दफ़ा टूटा हूँ,
पर तेरे ख़यालों से टकरा जाते हैं आँसू।

लोग कहते हैं — वक़्त बदल देता है सब कुछ,
मगर उस वक़्त में भी तेरे निशां लाते हैं आँसू।

ख़ुशी में भी तेरा एहसास सताता है मुझको,
हँसते हुए भी पलकों पे ठहर जाते हैं आँसू।

हेमंत अब क्या लिखे अपनी तन्हाई का फ़साना,
हर शेर में तेरी झलक दिखा जाते हैं आँसू।

Wednesday, 5 November 2025

तुम खत्म, मै खत्म

मिलना ख़त्म — नज़दीकियाँ ख़त्म,
नज़दीकियाँ ख़त्म — एहसास ख़त्म।
एहसास ख़त्म — जज़्बात ख़त्म,
जज़्बात ख़त्म — तो संबंध भी ख़त्म।

बात ख़त्म — बातचीत ख़त्म,
साथ ख़त्म — तो सफ़र भी ख़त्म।
साँस ख़त्म — धड़कन भी ख़त्म,
ग़ुस्सा ख़त्म — तो असर भी ख़त्म।

नज़रें ख़त्म — तो पहचान ख़त्म,
पहचान ख़त्म — तो अरमान ख़त्म।
पल ख़त्म — तो उम्मीद भी ख़त्म,
उम्मीद ख़त्म — तो तामीर भी ख़त्म।

शिकवा ख़त्म — शिकायत ख़त्म,
झगड़ा ख़त्म — तो प्यार भी ख़त्म।
प्यार ख़त्म — तो दुनिया भी ख़त्म,
दुनिया ख़त्म — तेरी यादें ख़त्म।

यादें ख़त्म — तो सुकून भी ख़त्म,
सुकून ख़त्म — तो नींदें भी ख़त्म।
सवाल ख़त्म — तो जवाब भी ख़त्म,
रिश्ता ख़त्म — तो नाते भी ख़त्म।

अब कुछ नहीं बचा कहने को,
दलील खत्म, फ़रियाद खत्म।

💫 और कितनी ज़िद करोगी… 💫

किसको झुकाना चाहती हो,
किससे जितना जताना चाहती हो?
ये कैसी जंग है तुम्हारी,
जिसमें कोई अपना संग नहीं है।

क्या पा लोगी इस सख़्ती से,
किसे और तोड़ोगी अपनी ख़ामोशी से ?
जहाँ पहले हँसी का बसेरा था,
अब सन्नाटे का डेरा है।

इस जिद का क्या मोल रहेगा,
जब साथ कोई अपना न रहेगा।
जब देखोगी आईने में तन्हा चेहरा,
तब समझोगी — ये सब था घना कोहरा ।

तुम्हारी ज़िद शायद जीत जाएगी,
पर तन्हाई की चुप्पी संग लाएगी।
जो एहसास रूह से जुड़े थे,
अब आँखों से अश्क बह रहे हैं ।

और कितनी ज़िद करोगी,
कितना और नुकसान करोगी...
ऐसे में न तुम सुकून पाओगी,
न सामने वाले को चैन दिलाओगी ।

प्यार कोई सौदा नहीं होता,
जिसका हिसाब लगाया जाए,
ये तो वो सजदा है —
जहाँ दिल नहीं, रूह झुक जाए।

तुम्हारी ज़िद ने दूर किए सारे अपने,
हर बार तोड़े भरोसे के सपने।
जो साथ थे तेरे हर मुश्किल में,
अब खामोश हैं अपनी मंज़िल में।

पर तुमने उस यक़ीन को ठुकरा दिया,
बस अपनी जिद को सच मान लिया।
और मैं चुप रहा — शायद यही सही था,
क्या हर बार तुम सही — और मैं ही ग़लत था?

एक आख़िरी बार मैं कोशिश करूँगा,
इस बार मैं तुम्हारी कुछ नहीं सुनूंगा।
खुद हार जाऊँ — वो चलेगा,
पर तुम्हारी ज़िद को अब जीतने नहीं दूँगा।

Wednesday, 29 October 2025

ज़िद है जितने की

आज सुलगा ही दो चिराग़ों को,
दो हिस्सों में फाड़ दो आग को।
दम खत्म नहीं — बस बदन थका है,
इरादा अब भी सीना ठोककर ज़िंदा खड़ा है।

आज भी गिरकर,
उठना आता है,
दम टूट जाए,
तब भी चलना आता है।

जो टूट गए,
वो मामूली काँच थे,
जिद पर आ जाएं तो,
लोहा मोड़ दें हाथ से।

जितनी बार गिरेंगे,
उतनी बार खुद को गढ़ेंगे।
न डरेंगे, न भागेंगे,
जीत की दास्तान अपने हाथ से लिखेंगे।

कई कसौटियों पर परखे जाएँगे,
खुद को आग में तपाएँगे।
तूफ़ानों में घिरी अपनी कश्ती को,
किनारे भी हम ही लगाएंगे।

आज पसीने को खून की तरह बहा दो,
मेहनत को अपनी ज़िद बना लो।
जो मंज़िल आज लगती है दूर,
कल वही बनाएगी तुम्हें असली कोहिनूर।

फ़नाः ए इश्क

वो आरज़ू ही क्या
जो बिना रंज-ओ-फ़ना मुकम्मल हो जाए,
वो इश्क़ ही क्या
जो रूह को दहका कर राख न कर जाए।

वो मोहब्बत कैसी
जिसमें दिल हिज्र की स्याही से न भीगे,
बिना अपने आप को तस्लीम किए
ये दरवेश-सा रोग समझदारों से कैसे निभे।

वो इंतिज़ार भी इंतिज़ार नहीं
जिसमें रूह तलक कंपकंपी न उतरे,
वो दीदार भी दीदार नहीं
जिसमें तजल्ला-ए-नज़र से धड़कनें बाहर न बहें।

वो बेकली कैसी
जो रात की सजदा-गाह पर नींदें कुर्बान न करे,
जिस इश्क़-ए-नफ़्स में सुकून उतर आए
वो तलब कहाँ — बस खिलौना-ए-दिलासा ठहरे।

वो तड़प भी तड़प नहीं
जिसमें सीने में फ़साद-ए-जज़्ब न उठे,
ये इश्क़ वही इश्क़ है
जो राहत नहीं — नफ़्स को फ़ना लिख जाए।

Friday, 24 October 2025

बस यादों में ही

क्या मालूम लोग समय क्यों बिगाड़ते हैं,
हम तो एक शख्स के पीछे उम्मीद लगाए बैठे हैं।
जिन्हें फ़र्क तक नहीं हमारे होने या ना होने से,
उन्हीं की राह में हम ज़िंदगी लगाए बैठे हैं।

नुकसान नहीं करते हम एक पल को भी,
उनकी राह को हर पल निहारा करते हैं।
अब जान चुके हैं वो नहीं लौटने वाले,
फिर भी दिल को हम समझाया करते हैं।

वो धड़कनों सी हरकत करते रहते हैं दिल में,
साँसों की लय भी ठीक नहीं चलने देते।
याद तो आते हैं कुछ इस क़दर हमें,
साँस और धड़कन में ताल नहीं बनने देते।

कुछ रिश्ते मुकम्मल नहीं होते कभी,
बस यादों में ही साँस लिया करते हैं।
मान लेते हैं यही हमारी किस्मत थी,
इसी यक़ीन पर हम जिया करते हैं।

Sunday, 12 October 2025

💔 थोड़ी कमी सी लगती है... 💔

कुछ कमी सी लगती है तेरे एहसासों में,
अब वो बात भी नहीं रही तेरी गर्म सांसों में।
पहले तो हँसी पर भी नज़रें ठहर जाती थीं,
अब तेरी मुस्कुराहट भी बनावटी लगती है।

अब तेरी आँखों में वो चमक नहीं रहती,
ना ही उन बातों में पहले जैसी नर्मी रहती।
हम तो आज भी तुझे दिल से चाहते हैं,
पर अब तेरे लहजे में वो बेशर्मी नहीं रहती।

अब शिकवा नहीं, ना कोई गिला बाकी है,
तेरी यादों का बस धुंधला सिलसिला बाकी है।
तू बदल गया तो क्या हुआ, मैं तो वही हूँ,
पर लगता है दिलों में थोड़ा फ़ासला बाकी है।

प्यार रोज़मर्रा की परेशानियों पर बलिदान हो गया,
जो सालों से अपना था वो मेहमान हो गया।
जिन्हें जीते थे अपनी हर सांस में हर पल,
कोशिश तो बहुत की… पर वो एहसास अनजान हो गया।

Thursday, 9 October 2025

🌿 जीवन दर्शन 🌿

कई किस्से अभी अधूरे हैं,
पूरी बात बताना अभी बाकी हैं।
ज़िंदगी थोड़ी सी ही गुज़री है,
पर बहुत कुछ जीना अभी बाकी है।

हर मोड़ कुछ सिखा जाता है,
हर ठोकर मंज़िल दिखा जाती है।
रुकने से बेहतर है चलते रहना,
क्योंकि अभी बहुत सा सफ़र बाकी है।

ग़म में भी उजाला ढूँढना सीखो,
ख़ुशी को खुद में पाना बाकी है।
बस दो चार कदम ही चले हैं, 
अभी तो जिंदगी की पूरी दौड़ बाकी है।

भटकने को तो दुनिया पड़ी है,
सही राह चुनना बाकी है।
अभी राह में हमने देखा ही क्या,
अभी तो पूरी कायनात बाकी है।

अभी तो थोड़े से ठहरे हैं हम,
मुकाम पर पहुंचा भी जरूरी है।
अभी तो पंख फैलाए हैं हमने,
ऊँची उड़ान भरना अभी बाकी है।

कुछ अपने गहरे घाव दे गए हैं,
कुछ ज़ख्म खाना बाकी है।
वक़्त अच्छा आ ही जाएगा,
बस थोड़ा मरहम लगाना बाकी है। 

कुछ लोगों ने साथ छोड़ दिया,
कुछ को छोड़ना अभी बाकी है।
कुछ लोग दुश्मन बन गए हमारे,
कुछ चाहने वाले अभी भी बाकी हैं।

कुछ ख्वाब अधूरे हैं अभी,
कुछ पल जीना बाकी हैं।
अभी तो शुरुआत की है लिखने की,
बहुत कुछ लिखना बाकी है ।

🌸

Wednesday, 8 October 2025

🕊️ ज़िंदगी का सफ़र अकेले मत करना

किसी की फिक्र करो तो,
उससे ज़िक्र ज़रूर करना।
किसी का साथ होना ज़रूरी है,
जिंदगी का सफ़र अकेले मत करना।

नाराज़गी बहुत बिखरी पड़ी है,
हर किसी को मनाना मुश्किल है।
कभी किसी के लिए थोड़ा रुक जाना,
ज़िंदगी का सफ़र अकेले मत करना।

दुःख आने के हज़ारों रास्ते हैं,
ख़ुशी की राह ढूंढनी पड़ती है।
भटकने से हासिल कुछ न होगा,
ज़िंदगी का सफ़र अकेले मत करना।

हर कोई ऊब गया है, एक-दूसरे से,
कब तक अकेले इम्तिहान देना होगा।
जो अपने लगें, उन्हें थामे रखना,
ज़िंदगी का सफ़र अकेले मत करना।

Monday, 6 October 2025

मन का महाभारत

जब मन में हो महाभारत,
और दिल में हो रामायण,
तब बुद्धि बस मौन हो जाती,
ज्ञान की रोशनी अंधेरे में खो जाती।

अर्जुन-सा खड़ा होता हूँ मैं,
विचारों के गांडीव को लेकर रण में,
कभी कृष्ण की वाणी सुनता हूँ,
कभी दुर्योधन के अंतःमन में।

एक ओर शांत-सा गागर है,
जहाँ संयम की सीमा जगती है,
दूजी ओर हिंडोले मारता सागर है,
जहाँ तर्क की लहरें टूटती हैं।

राम की मर्यादा, लक्ष्मण की रेखा,
भाई में भाई का त्याग देखा है,
उधर दुर्योधन का अहम अनोखा,
मन में लाक्षागृह का धोखा है।

जहाँ सत्य और मोह टकराते हैं,
पाषाण भी सुमेरु बन जाते हैं,
जब धर्म के युद्ध में भाई लड़ जाते हैं,
तब कृष्ण भी — अर्जुन के हो जाते हैं।

आख़िर ये द्वंद कब तक चलेगा,
राम को रावण कब समझेगा?
जब तक भीतर युद्ध सुलगता है
मन में महाभारत चलता है ।

💫 वो अपना सा 💫

कोई तुमसे पूछे — कौन हूँ मैं,

कह देना — दोस्त हूँ, सच्चा सा, अपना सा। 🤝


खड़ा रहता है ढाल बनकर,

हर मुश्किल में — बिना कहे, तेरे सिर का दर्द बनकर। 😄


हँसते-रोते हर जज़्बात में,

साथ देता है — आधी रात में भी बात में। 🌙


कोई साथ न दे, हर रिश्ता निभाता है,

खुश रखता है — दुखों में भी मुस्कान लाता है। 😊


जैसा भी वक्त आए —

कभी बाप, कभी माँ, कभी यार,

कभी झगड़ू बनकर भी करता है प्यार। ❤️


यादों में बसा हर प्यारा पल,

सुख-दुख में साथी, कभी अलग नहीं।

वो मेरी बगिया का फूलों का —

गुच्छा है, अच्छा है, सच्चा अपना सा। 🌸


कभी लड़ाई भी हो, तो भी दिल न टूटे,

हर हँसी, हर आँसू, हर पल —

सच्चा, अपना सा, भरोसे का साथ न छूटे। 💫


मेरा नहीं है वो,

पर हर मुश्किल में किनारा है, सहारा है,

लगता है — उसी से हौसला है,

मुस्कान है मेरी, मेरे आसमान का तारा है। 🌟


Saturday, 4 October 2025

🌸 मैं अकेली नहीं हूं 🌸

🌸 मैं अकेली नहीं हूं 🌸

गिरती हूं, सीखती हूं, समझती हूं,
देर से ही सही, अपने मुकाम तक पहुंचती हूं।
गिर भी जाऊं तो खुद ही उठ खड़ी हो जाऊंगी,
अपने जज़्बे से हर बार नई राह बनाऊंगी।

नहीं चाहिए मुझे किसी का सहारा,
जिसे अपना समझा, वही निकला दुश्मन हमारा।
चाहे लाख कठिनाइयाँ राह में आएं,
सबसे लड़कर मैं आगे बढ़ जाऊंगी।

लिए होंगे कुछ फैसले गलत 
राह चुनी होगी सबसे अलग
मुझे अब नहीं पछताना है 
अपना खोया अस्तित्व फिर पाना है ।

कमज़ोर मत समझना मुझे मेरे स्त्री होने से,
मैं दुर्गा हूं, में शक्ति हूं, अपना अस्तित्व खुद गढ़ जाऊंगी।
सिंचा है खून से जिन रिश्तों को,
उसी ने विश्वास तोड़ा है ।
आँसुओं से मैंने हिम्मत को बुन लिया,
मज़बूत होकर नया युद्ध पथ चुन लिया।

अभी भी लोग मुझे दबाते हैं,
मुझे सबसे कमजोर आँकते हैं।
मगर मुझे मेरी हद याद है,
जिम्मेदारी का भी पूरा एहसास है।

पर मुझे तो आगे बढ़ना है,
अब किसी से नहीं डरना है।
अब कोई रोक नहीं पाएगा मेरी उड़ान,
मेरे अपने पर होंगे और मेरा अपना आसमान।

जुनून मेरी पहचान बनेगा,
हर जीत मेरी कहानी कहेगा।
मैं अकेली नहीं,
मेरा साहस मेरे साथ है,
मेरी मेहनत ही मेरी सबसे बड़ी बात है।

सबका गुरूर मैं अब तोड़ दूंगी,
अपने संकल्प से नई दुनिया गढ़ लूंगी ।
में स्त्री हूं, वीरों ने मेरा दुग्धपान किया है,
मैने ही लक्ष्मीबाई बन कर भयाक्रांत किया है ।

जब बात स्वाभिमान पर आती है
स्त्री सारी हद तोड़ जाती है
जो सोच ना सका एक पुरुष
वो सारे काम स्त्री कर जाती है ।

Tuesday, 30 September 2025

रिश्तों का अंत

रिश्ते का अंत समझदारी से हो,
ना कोई मलाल हो, ना मन भारी हो।
एक ही जीवन मिला है हमको,
जो भी हो अंत, वो लाभकारी हो।

अंत तो सबका तय होता,
यही तो शुरू से भय होता।
किसी का मिलन आंसुओं से तो,
किस का बिछोह हंसी खुशी होता है।

अब नहीं बन रही है तो छोड़ो,
नव कड़ियों से जीवन जोड़ो।
खत्म करो इस बोझ को,
बदल दो अपनी सोच को ।

वो रास्ते जो ठहर गए हैं,
उन्हें हवा में उड़ जाने दो।
जो दिल में जमी हैं गांठें,
उन्हें खुलकर बिखर जाने दो।

कुछ यादें छोड़ना पड़ेगी,
बची हुई तन्हाई समेटना पड़ेगी।
वक्त अच्छा था समझ ना पाए,
उन रिश्तों को सहेज ना पाए।

मन में कोई बोझ रखना नहीं,
कोई बुरी बातें सहेजना नहीं।
यादें जीवनभर साथ निभाएंगी,
हर सुख-दुख में पास आएंगी।

रिश्तों में भावनाएँ ही होती हैं,
उन्हें आहत होने ना देना।
उस रिश्ते को सुंदर अंत देना,
जीवन को जीने का मंत्र देना।

रिश्ते का अंत समझदारी से हो,
ना कोई मलाल हो, ना मन भारी हो।
एक ही जीवन मिला है हमको,
जो भी हो अंत, वो लाभकारी हो।

Monday, 29 September 2025

👨‍👧 पिता और बेटी 👨‍👧

पिता और बेटी, का एक अपना संसार है,
जहाँ हर कोने में बस बेहिसाब प्यार है।

बेटी अगर एक आंख है तो पिता उसकी पलक है,
पिता अगर दिल है तो बेटी उसकी धड़क है।

बेटी बाप की दुनिया का सबसे प्यारा फरिश्ता है,
उन दोनों के बीच अनमोल, अटूट सा रिश्ता है।

जब बेटी रोती है तो बाप का मन भीग जाता है,
और जब वो मुस्कुराती है तो उसका जहान जगमगाता है।

बाप काम पर जाता है तो बेटी राहें तकती है,
उसकी मासूम पुकार हर थकान हर लेती है।

बेटी की मुस्कान से पिता की रूह खिल जाती है,
उसकी खामोशी से उसकी सांसें भी थम जाती हैं।

बेटी का हर अरमान बाप का सपना होता है,
बिन मांगे उसकी हर ख्वाहिश पूरी कर देता है।

जिस घर में बेटी नहीं होती,
वहां उसकी मन्नत होती,

क्योंकि बेटी ही तो पिता की
सबसे बड़ी जन्नत होती।

बाप का घर बेटी की किलकारियों से महकता है,
और उसकी विदाई से वही घर वीराना सा लगता है।

बाप का दर्द शब्दों में बयां नहीं होता,
उसकी आंखों में नमी, लबों पर दुआ होता।

वो एहसास कोई नहीं समझ पाएगा,
ऐसा भाग्य सिर्फ नसीब वाला पाएगा।

पिता ही है जो दिल थाम कर मुस्कुराता है,
बेटी को विदा कर भी उसे दुआएं देता जाता है।

जब बेटी हंसेगी वहां,
बाप की रूह खिल उठेगी यहाँ।

पढ़कर रोना मत मेरे भाई,
अगर तुझे बेटी है तो सहना पड़ेगी जुदाई।

ऐसा बलिदान कोई कर पाएगा,
अपने जिगर के टुकड़े को किसी दे पाएगा।

जिगर के टुकड़े को कोई देता है,
जो देता है, बस वही सच्चा बाप होता है।

अगर आपको बेटी है तो उसे संभालना,
उसके सारे नाज-नखरे मुस्कुराकर उठाना।

उसकी हर ख्वाहिश को अपने दिल में बसाना,
उसकी हर हँसी में खुद को भूला देना।

जब वह रोए तो उसकी चुप्पी समझना,
उसके आँसुओं में अपनी आँखें डुबो देना।

और जब वह उड़ान भरे,
उसे अपने पर फैलाने देना,

उसकी पीठ थपथपाना, 
उसका हौसला बढ़ाना।

दुनिया से उसको लड़ना सिखाना,
सबसे बहादुर बेटी बनाना है ।

जब उसको मिलेंगे अच्छे संस्कार,
तभी तो बनेगी परिवार का आधार ।

जब जब उसको मिलेगा सम्मान,
तब तब बढ़ेगा बाप का मान ।

बेटी को खोना मत,
अगर खोया तो फिर रोना मत,

बेटी का है ये हम पर एहसान
उससे ही फैलती हर घर में मुस्कान ।

Friday, 26 September 2025

राधा का कृष्ण, मीरा का श्याम

जग में एक ही प्यारा नाम,
राधा-मीरा करे गुणगान।
राधा का वृंदावन में था वास,
मीरा राजमहल की थी खास।

गोकुल गलियों में राधा की छवि,
यमुना तट पर मुरली की तान बजी।
राधा ने बरसाने में लीला रचाई,
मीरा ने भजनों से कथा सुनाई। 

राधा संग गोपियों का रंगीला रास,
मीरा ने सहा विरह का दुःख खास।
राधा ने अमृत रस पीया,
मीरा ने जहर भी हँसकर जिया।

राधा संग बंसी की मधुर तान,
मीरा के गीत भजन थे जान।
राधा ने लीला में मन बहलाया,
मीरा ने दूरी में प्रेम निभाया। 

राधा रानी, वृंदावन की दीवानी,
मीरा दीवानी, त्याग की रानी।
राधा ने पाया मिलन का सुख,
मीरा ने सहा विरह का दुःख। 

बरसाने की गलियों में राधा भटकी,
यमुना के तट पर मुरली अटकी।
राधा मगन रहीं रास में,
मीरा रोई विलाप में।

राधा द्वापर की सखी सुहानी,
मीरा कलियुग की साध्वी ज्ञानी।
राधा ने कान्हा संग लीला सजाई,
मीरा ने भजन में आत्मा डुबाई। 

मीरा विरह में उम्र गुज़ारी,
राधा ने की कृष्ण की मनुहारी।
मीरा ने पाया स्मरण का जीवन,
राधा ने किया कृष्ण संग रमण। 

राधा हो या मीरा…
कथा सब गावे…
मिलन हो या विरह…
प्रेम वही सिखावे…

बरसाने की लीला, यमुना की छाया…
चित्तौड़ की हवेली में भी भक्ति समाया ।
मीरा ने विरह में आपणी रूह गंवाई,
राधा ने वियोग में परम आनंद पाई।

मीरा जैसा कोई ना भजे,
राधा जैसा कोई ना सजे ।
सांवरे के नाम के मजे,
इस जग में ना कोई प्रेम ताजे ।।

राधा – मोहब्बत की दीवानी,
मीरा – भक्ति की दीवानी।
मिलन हो या विरह,
दोनों प्रेम को ही पहचानी ।

मीरा राधा नाम से, जग जाए गुणगान ।
भक्ति मोहमयी कथा, अमर रहे भगवान ।।

Thursday, 25 September 2025

अगर सपने सच होते

अगर सपने सच होते,
तो कितने अधूरे ख्वाब पूरे होते।
उम्मीदों के सब दरवाज़े खुलते,
पाँव ज़मीं पर, पर सपने आसमान में होते।

हर गरीब की थाली में पकवान होते,
किसानों के खेत सोने से लहलहाते।
हर माँ की आँखों में चमक होती,
हर बाप के हाथ सदा भरे होते।

ना बेरोज़गारी की लाइन होती,
ना महंगाई की कोई मार होती।
हर परिवार के सिर पर छत होती,
हर थाली में दो वक़्त की रोटी होती।

घर-आँगन में एकता होती,
जायदाद में झगड़ा नहीं होता।
रात को चूल्हा सबके लिए जलता,
हर दिल में खुशियों का दीप जलता।

हर बच्चा पढ़ने जाता,
पढ़-लिखकर ऊँचा मुकाम पाता।
ना कोई भूख से बिलखता,
ना कोई दवा को तरसता।

ना उम्र की कोई कैद होती,
ना रिश्तों में कोई बंधन होता।
जैसा दिल चाहता वैसा होता—
काश ये सपना सच होता।

Wednesday, 24 September 2025

तेरे साथ होने के ये एहसास

तेरे साथ होने के ये एहसास
होते हैं बहुत खास,
पूरी रूह महक जाती है
जब बदलती हो तुम अंदाज़।

वो नजाकत, वो नफ़ासत,
वो गुलाबी से बोल,
नशीली आँखें, गाल पर तिल,
और चेहरे पर गिरते घुंघराले बाल।

वो तेरी महकती साँसें,
धड़कनों में गूंजता संगीत,
गालों पे दमकती चांदनी,
बोली तेरी जैसे सुमधुर गीत।

बलखाती लहराती तेरी चाल,
हर कदम पे ठहर जाए हर सवाल,
जैसे चाँदनी बिखर जाए रात में,
वैसे ही तू समा जाए मेरी बात में।

और जब भी तू पास होती है,
दिल में बस जाती है मिठास,
हर ख्वाब सच सा लगने लगता है—
तब होता है तेरे साथ का ये एहसास।

Monday, 22 September 2025

मुलाकातों का सिलसिला

मुलाकातों का सिलसिला थमने मत देना,
दिलों के बीच फासले बढ़ने मत देना।
जमाना तोड़ना चाहता है हर अपनापन,
उनकी साजिशें रिश्तों में घुलने मत देना।

सिंचा है हर रिश्ते को अपने प्यार से,
उस चाहत को कमज़ोर होने मत देना।
वक्त कठिन है, मगर गुजर ही जाएगा,
तुम हालात को दिल के बीच आने मत देना।

बनाया है घरौंदा बड़े प्यार से हमने,
उसका एक एक तिनका जोड़ के रखना ।
उम्मीदों के साथ पकड़ा है हाथ तेरा,
किसी के बहकावे में उसे छूटने मत देना।

भरोसा रखना साथ निभाने का उम्र भर,
साथ रहा तो मुश्किलों को भी हरा देंगे ।
लड़ जाएंगे हर बिगड़े हालातों से,
तुम उम्र भर हौंसला टूटने मत देना।

Saturday, 20 September 2025

मेरा बचपन

आज थोड़ा सा बचपन जी आया,
कुछ पुरानी यादों से मिल आया।

आज की भगमभग वाली ज़िंदगी,
और नकली हँसी पीछे छोड़ आया।

कंचों की चमक, गिल्ली-डंडे का शोर,
फिर से मन को अपना बना आया।

माँ की पुकार, आँगन की रौनक,
उस मिट्टी की खुशबू संग लाया।

बचपन के खिलौने, गलियों के कोने,
सपनों के महल और मिट्टी के खिलौने।

पेड़ की छाँव तले बैठना घंटों,
नदी के पानी में पत्थर गिन-गिन फेंकना।

गुड़िया की शादी, गुड्डे का घरौंदा,
पतंगों की डोर में उलझा किस्सा।

बरसात में कागज़ की नावों का सफ़र,
धूप में आम के पेड़ों पर चढ़ने का हुनर।

माँ की पुकार पर खेल का रुक जाना,
नानी की कहानियों में खो जाना।

आज मैं अपने गाँव हो आया,
थोड़ा-सा बचपन फिर जी आया।

Thursday, 18 September 2025

तेरी आंखें और हंसी

देखा है तेरी आंखों में,
प्यार ही प्यार बेशुमार।
हर ख्वाब में तू ही तू है,
हर धड़कन तेरा इंतज़ार।

तेरी हंसी से रोशन है,
मेरी हर सुबह और शाम।
तेरे बिना अधूरी लगे,
ये ज़िंदगी का हर पैग़ाम।

तेरी आंखों की गहराई में,
एक समंदर छुपा हुआ है।
उनकी खामोशियों में भी,
प्यार का दरिया बहा हुआ है।

तेरी आंखों का हर जादू,
मेरे दिल को छू जाता है।
हर नजर का तेरा इज़हार,
मुझसे कुछ कह जाता है।

तेरी हंसी की खनक सुनूं,
तो फूलों सा महक उठूं।
उसकी मासूम सी मिठास से,
हर ग़म अपना भुला बैठूं।

तेरी आंखें जैसे आईना,
जिसमें मैं खुद को देखूं।
उनकी रौशनी में हर पल,
अपनी दुनिया मैं खोजूं।

तेरी हंसी की मासूमियत,
बनती है मेरी पहचान।
तेरी आंखों की गहराई ही,
मेरे जीने का अरमान।

तेरी आंखें और तेरी हंसी,
दोनों मेरी दुनिया हैं।
इनसे ही सजती है मेरी,
हर खुशी, हर चाहत, हर दुआ हैं।

भगवान की बनाई सीक्वेंस

भगवान ने कैसी सीक्वेंस जमाई,
हार के बाद ही जीत दिखाई ।

पहले होता घोर अंधेरा,
फिर खिलता सुनहरा सवेरा ।

जबान को जब तीखा लग जाता,
फिर सबको मीठे का स्वाद याद आता ।

तलवार के संग ढाल बनाई,
तो सुलह के पहले लड़ाई भी सजाई ।

राह में न जाने कितनी रुकावटें आईं,
हर रुकावट के बाद कुछ राह सुझाई ।

हर खुशी के पहले आँखें हुईं नम,
भूल गए उसके पहले के सारे ग़म ।

पतझड़ के बाद ही बहार आई,
सूखी टहनियों पर कली मुस्कुराई ।

गिरने के बाद ही संभलना सिखाया,
ग़मों के बाद ही खुशियों का रस आया ।

संग संघर्ष के ही मंज़िल सजाई,
भगवान ने कैसी अद्भुत सीक्वेंस बनाई ।

Thursday, 11 September 2025

"ट्रैफिक जाम"

ट्रैफिक जाम,

हर तबका हर इंसा परेशान,

ये रोज रोज का काम,

नहीं मिलता बिल्कुल भी आराम ।


हर चौराहा रेड लाइट,

स्थिति बहुत है टाइट,

हौसला है थका,

सिर्फ उम्मीदों पर टीका ।


बेवजह का शोर,

नहीं चलता अपना जोर,

कोशिश आगे निकलने की,

एक दूसरे को पीछे छोड़ने की ।


तब कान फूट जाते हैं

जब सारे हॉर्न बज जाते हैं

कईं इंजन शोर मचाते हैं

प्रदूषण का इंडेक्स बढ़ाते हैं ।


अस्पतालों के बेड भर रहें

करोड़ों लोग पीड़ित बन रहे,

कईं सांस नहीं ले पा रहे,

बाकी अपने फेफड़े में धूल जमा रहे ।


बेवजह का चक्काजाम,

दुकानदार फैला रहा सड़क पर दुकान,

कोई अपनी हद पार कर रहा,

उधर एम्बुलेंस में लेटा भगवान को याद कर रहा ।


सिपाही सिटी बजा रहा,

जैसे कानों में म्यूजिक सुना रहा,

इंस्पेक्टर चलान बना रहा,

आम आदमी अपनी जेब से चुका रहा ।


सड़क पर ठेलों का राज,

भीड़ में खड़े जोर जोर से देते आवाज,

एक दिन सब सुधर जाएगा,

क्या मालूम वो दिन कब आएगा ।


क्यों नहीं अपनाते पब्लिक ट्रांसपोर्ट,

नहीं जाना पड़ेगा चालान चुकाने कोर्ट,

सड़कों को भी थोड़ी सांस आएगी,

सबकी 2- 4 साल जिंदगी बढ़ जाएगी ।


अब नई पीढ़ी आयेगी,

साफ़ हवा संग मुस्कुराएगी,

हर बच्चा होगा तंदरुस्त,

युवा रहेंगे मन और शरीर होगा स्वस्थ ।


हर सड़क पर हरियाली होगी,

न धुआं, न कचरे की ढेरी होगी,

साफ़ हवा का तोहफ़ा पाएंगे,

पक्षियों की चहचहाहट फिर से लौटाएंगे ।


ना हॉर्न का शोर, ना जाम की मार,

साइकिल और पैदल चलना होगा अपार,

पब्लिक ट्रांसपोर्ट बनेगी पहचान,

कम होगा प्रदूषण, शहर का बढ़ेगा सम्मान।


जब सांसें होंगी हल्की और साफ़,

दिल भी रहेगा मजबूत और ख़ास,

नई सुबह एक वादा लाएगी,

अबकी पीढ़ी मुस्कुराती जाएगी। 


भाई कहां खो गया,

तब इस जाम से भी मुक्ति मिल जाएगी ।

ए इश्क़ — तू क्या चाहे

 ए इश्क़ तू क्या चाहे,
थोड़ा सा अदब और
प्यार के दो बोल चाहे।

चोरी-चोरी, चुपके से मिलना,
और फिर ढेर सारी बातें करना चाहे।

कभी खामोश लम्हों को याद बना दे,
तो कभी छोटी से बात में रूठ जाना चाहे।

घंटों तक एक-दूजे की राह तकना,
मिलते ही फिर मासूम-सा झगड़ना चाहे।

ना जाने कितने झगड़े,
और अंत में बस इक समझौता चाहे।

कभी हंसी में आंसू छुपाना,
कभी आंसुओं में सुकून पाना चाहे।

रात रात भर बात करना और
आखिर में लड़कर रोना चाहे।

ए इश्क़—तेरी बड़ी अजीब चाह है,
हम तेरे रहे या ना रहें, तू क्या चाहे।

कभी कभी दिल को तोड़ना
फिर मुझे ही समझाना चाहे।

खुद को धीमा दर्द देना चाहे,
फिर उसी दर्द में राहत भी पाना चाहे।

बार बार तुझ पर मरना चाहे,
मर मर कर तेरे साथ जीना चाहे।

ये रोना चाहे, हंसना चाहे,
तेरे इश्क में फ़ना होना चाहे।

ए इश्क जिद ना कर, 
आज तो तू बता,
तू मुझसे क्या चाहे ।

Wednesday, 10 September 2025

मंजिल यही है

 कभी-कभी रस्ते नहीं,

खुद को बदलना पड़ता है ।


​जिस मंजिल की तलाश में चले थे,

उसे भी छोड़ना पड़ता है।


​उम्र निकल जाती है पहुँचने में,

कईं अपनों का साथ छोड़ना पड़ता है।


​राह दर राह बदलते रहे हम,

मुकाम भी वहीं मिला,

जहाँ से चले थे हम।


​कितने करीब से निकले थे,

हम मंजिल के, 

फिर भी, दूरियों का अहसास था।

शायद, मंजिल नहीं, 

सफर ही जिंदगी का सार था।


​अब चलते हैं हम,

बिना किसी मंजिल की आस में,

हर हर कदम पड़े अपनों के साथ से ।


​यहां हर कदम पर नया सवेरा है।

और हर मोड़ पर एक नई कहानी है।

यही तो अपनी जिंदगानी है।

Tuesday, 9 September 2025

ठहर जा अब

कभी-कभी रस्ते नहीं,
खुद को बदलना पड़ता है।

जिस मंज़िल की तलाश में निकले थे,
उसे भी छोड़ना पड़ता है।

उम्र निकल जाती है पहुँचने की चाह में,
छोड़ना पड़ता है कितनों को ही इस राह में।

राह दर राह बदलते रहे हम,
मुकाम भी वहीं मिला,
जहाँ से चले थे हम।

कितने करीब से गुज़रे थे हम मंज़िल के,
फिर भी दूरियों का अहसास था।

शायद, मंज़िल नहीं,
सफ़र ही ज़िंदगी का सार था।

अब चलते हैं हम
बिना किसी मंज़िल की आस में,

हर कदम रखते हैं,
अपनों के साथ में।

यहाँ हर कदम पर घना कोहरा है,
उसी के बाद तो नया सवेरा है ।

हर मोड़ पे छुपी हुई एक कहानी है,
यही तो अपनी जिंदगानी है।

खुद को खुद में तलाश,
अब कहीं और न भाग।

तेरी चाही मंज़िल शायद कभी न आएगी,
बस तुझे यूं ही भटकाएगी।

मत भटक, ठहर जा अब...
सुकून इसी ठहराव में पाएगा,

नहीं तो दौड़ते-दौड़ते
अंत में समा जाएगा।

ना रहेगी मंजिल ओर 
ना फिर कोई मुकाम आयेगा ।

जहां से चला था खुद को ढूंढने 
अपने आप को फिर वहीं पाएगा ।।

Sunday, 7 September 2025

तुम



तुम्हें लगता है मेरे हो तुम,
मगर मेरे नहीं हो तुम।
हर धड़कन में गूंजते हो तुम,
पर धड़कन के संग नहीं हो तुम।

सपनों की चौखट पे ठहरते हो तुम,
सुबह होते ही खो जाते हो तुम।
जैसे अधूरी कोई दुआ हो तुम,
जो लबों पे रह जाते हो तुम।

बारिश की वो पहली बूंद हो तुम,
ज़मीन तक आते ही बिखर जाती हो तुम।
धूप की वो नर्म किरण हो तुम,
जो छूकर भी अक्सर जला जाती हो तुम।

मैं चाहता हूँ थाम लो मुझको तुम,
जैसे हर रिश्तों को थामती हो तुम।
मगर किस्मत के सख़्त हाथ हो तुम,
हमें हर बार दूर कर निकल जाते हो तुम।

तुम्हें लगता है मेरे हो तुम,
पर ये सच्चाई है कि गुम हो गई हो तुम।
में मुसाफिर सा खड़ा रह गया, 
इस बार बहुत दूर निकल गई तुम ।।

✨ कड़ी, जोड़, संबंध✨


🌸 संबंध की ताक़त 🌸


दिखने में तो छोटी-सी है,

पर काम बड़े-बड़े कर जाती है।

तोड़ दो चाहे सब कुछ जीवन में,

ये एक झटके में जोड़ जाती है।


ध्रुव तारे से जब जोड़ो इसे,

ज्ञान का पथ प्रकाशित हो जाता है।

सितारों में ढूंढो जब इसको,

तो सप्तऋषि रूप सामने आ जाता है।


रिश्तों से जोड़ो तो रिश्तेदार,

अनजान से जोड़ो तो दोस्ती बन जाते।

हर जोड़ में छुपी एक दास्तान होती है,

कुछ नई खिलती, कुछ पुरानी पहचान होती है।


एक-एक जोड़ते जाओ तो,

कईं सुराग़ सामने आ जाते हैं।

कईं रहस्यों की परतें खुल जातीं,

छुपे हुए राज़ सामने आ जाते हैं।


DNA के रहस्य भी उजागर हो जाते,

जब खून से धागे जुड़ जाते।


पर इंसान ही अक्सर चूक जाता है,

रिश्तों में जोड़ना भूल जाता है।

अगर जोड़ ले अपने परिवार से,

तो रिश्तों के फूल खिल उठते हैं।

खुशियों के ताले खुल जाते हैं।


संबंध ही सच्ची शक्ति है,

जो दिल के द्वार खोल देती है।

बिन कुंजी भी जब जुड़ जाए,

तो हर राह रौशन हो जाती है।

Saturday, 6 September 2025

परिवार के संबंध

 मेरी एक नई रचना से फिर से शुरुआत कर रहा हूं ।


माँ-बाप से बच्चा जो रिश्ता पाता,

उसमें सारा संसार समा जाता।

यह रिश्ता ही जीवन का पहला गीत,

हर पल देता स्नेह का मीत।


भाई-बहन का मीठा नाता,

खुशियों से भरा हुआ प्यारा साधा ।

कभी झगड़ा, कभी हंसी की बात,

नाते से ही सजती जीवन की रात।


पति-पत्नी का गहरा बंधन,

सुख-दुख में बनता अटूट संगम।

बंधन से ही जीवन संवर जाता,

हर आंधी तूफ़ान को पार कर जाता।


दादा-दादी का स्नेहिल संपर्क,

बचपन में भर देता अद्भुत आकर्षण ।

संपर्क से ही पीढ़ियाँ जुड़ पातीं,

अनुभव की रोशनी इसे आगे बढ़ातीं।


दोस्तों से जो गहरा लगाव हो जाए,

तो मन का बोझ हल्का हो जाए।

लगाव ही है जीवन की सच्ची पूँजी,

जिससे हर मुश्किल हो जाए दूजी।


रिश्तों में जब जुड़ाव गहराता है,

दिल से दिल का फासला मिट जाता है।

जुड़ाव ही है अपनापन की निशानी,

जो बना देता है पराया भी अपना पानी।


परिवार में बसती आत्मीयता की धारा,

जो हर दिल को बना दे प्यारा।

आत्मीयता से ही बंधे घर-आँगन,

यही है जीवन का सबसे बड़ा धन।


हर पीढ़ी की अपनी अलग कड़ी है,

पर इन्हें जोड़ती प्रेम की लड़ी है।

कड़ी से ही चलता वंश का क्रम,

यही बनाता जीवन को गरिमामय दम।


दिल से दिल का सच्चा मेल,

बिन शब्दों के कह देता खेल।

मेल से ही रिश्ते खिल उठते हैं,

हर कोना फूलों-सा महक उठते हैं।


जीवन में परस्परता ज़रूरी है,

यही तो परिवार की मजबूती है।

परस्परता से बढ़ता अपनापन,

यही है जीवन, यही है संबंध का दर्पण।


हेमंत शर्मा