मैं सबका हो गया,
पर मेरा कोई न हो पाया,
दर्द को छुपाते-छुपाते,
अपनी खुशी भी बाँट आया।
हर रिश्ते को दिल से सींचा,
हर रिश्ते को अपना माना,
किसी की आँखों में आँसू देखे,
तो अपना दर्द भी भूल जाना।
किसी की ख़ामोशी पढ़ ली मैंने,
किसी की धड़कन समझ आया,
सबके ज़ख्मों पर मरहम रखा,
पर अपना ज़ख्म छुपाया।
सारी भीड़ मेरी जानी-पहचानी,
हर चेहरा अपना सा पाया,
सबके बीच हँसता रहा मगर,
लौटकर खुद को तन्हा पाया।
जिनके लिए खुद को खोता रहा,
उनसे ही दूर होता गया,
जिन्हें अपना कहकर उम्र दी,
उनका भी दिल दुखाता गया।
मुझे लगा कि सब ही गलत हैं,
सबने मुझे समझा नहीं,
फिर जब खुद से आँख मिलाई,
तो कोई पर्दा बचा नहीं।
गलतियों का पहाड़ खड़ा था,
मेरे ही कदमों के सामने,
जिन्हें दोषी कहता था मैं,
मैं भी था उन इल्ज़ामों में।
किसी को वक्त नहीं दे पाया,
किसी का मन नहीं पढ़ पाया,
कभी अपनी ज़िद को सच समझा,
कभी अहंकार को प्रेम बताया।
किसी के आँसू देखे तो भी,
उनका कारण समझ न पाया,
अपनी बात मनवाने की धुन में,
कितने अपने का दिल दुखाया।
आज पुरानी यादें आती हैं,
तो आँखें नम हो जाती हैं,
जो बातें तब छोटी लगती थीं,
वो अब सीने में चुभ जाती हैं।
कुछ रिश्ते मेरी भूलों से टूटे,
कुछ मेरी ख़ामोशी से रूठे,
कुछ मेरे शब्दों से घायल हुए,
कुछ मेरे लौटने तक छूटे।
विरह की ये रातें पूछती हैं,
क्यों इतना देर से समझ आया?
जिसे अपना समझकर खो दिया,
उसे अपना क्यों न रख पाया?
अब किससे जाकर माफ़ी माँगूँ,
किसके आगे सिर झुकाऊँ,
जो लौटकर आना ही नहीं चाहते,
उनको कैसे फिर से बुलाऊँ?
ना कोई शिकवा बचा अब,
ना कोई इल्ज़ाम रहा,
दूसरों को गलत कहने वाला,
आज खुद ही कटघरे में खड़ा।
मैं सबका होकर भी तन्हा था,
ये सच अब समझ में आया,
सबको अपना कहते-कहते,
खुद से ही रिश्ता टूटता पाया।
काश समय फिर लौट के आता,
कुछ पल फिर से मिल जाते,
जिन दिलों को मेरी वजह से ठेस लगी,
उन पर हाथ रखकर कह पाता—
“मुझसे भी गलतियाँ हुई थीं,
मैं हर बात में सही नहीं था,
तुम्हें खोना मेरी नियति नहीं,
मेरी अपनी भूलों का नतीजा था।”
अब जो बचा है जीवन में,
उसे शिकायत में नहीं गँवाना,
जिनसे प्रेम रहा दिल में,
उनको दिल से ही निभाना।
क्योंकि उम्र ने आखिर सिखलाया,
रिश्ते जीतने से नहीं बचते,
कभी झुकना भी पड़ता है,
कभी अपने भी दोष समझते।
मैं सबका हो गया उम्रभर,
पर मेरा कोई न हो पाया,
शायद कमी दुनिया में नहीं थी—
मैंने ही खुद को बहुत देर से समझ पाया।
दर्द को छुपाते-छुपाते,
अपनी खुशी भी बाँट आया,
सारी भीड़ मेरी अपनी थी,
फिर भी खुद को अकेला पाया।
आज बस इतना कह पाता हूँ—
पूरी उम्र गलतियाँ करता रहा,
बस मानने में पूरी उम्र लग गई…
सबको अपना समझता रहा,
पर खुद को समझने में उम्र लग गई।