Thursday, 24 September 2026

मेरे मैं का विसर्जन

आज मैंने मेरे ‘मैं’ का विसर्जन कर लिया,
कुछ यादों और अनुभवों का सृजन कर लिया।

कुछ आदतों, कुछ लोगों का तर्पण कर लिया,
कुछ शब्दों और रिश्तों का विसर्जन कर लिया।

जो मेरा था ही नहीं, उसका त्याग कर लिया,
जो मेरा अपना था, उसका वरण कर लिया।

कर रखा था कई जगह मैंने अपना समर्पण,
आज सबसे अपना थोड़ा-सा आहरण कर लिया।

बहुत खो चुका था खुद को औरों को निभाते हुए,
आज अपने अस्तित्व का पुनः सृजन कर लिया।

न कोई शिकायत रखी, न कोई अपेक्षा रखी,
आज अपने मन का स्वयं ही शुद्धिकरण कर लिया।

अब किसी की स्वीकृति की चाह नहीं रही,
अपने होने को ही अपना प्रमाण कर लिया।

जो बीत गया, उसे बीते कल में छोड़ दिया,
आज अपने आने वाले कल का वरण कर लिया।

आज मैंने मेरे ‘मैं’ का विसर्जन कर लिया,
और उसी विसर्जन में अपना पुनर्जन्म कर लिया।

Friday, 18 September 2026

मैं तुम्हें फिर मिलूँगा

मैं तुम्हें फिर मिलूँगा,
किसी शाम की तन्हाई में,
जब तुम चुपचाप बैठी होगी,
अपने ही सवालों की गहराई में।

मैं तुम्हें फिर मिलूँगा,
किसी पुराने ख़त के लफ़्ज़ों में,
जहाँ कुछ बातें अधूरी होंगी,
और कुछ आँसू होंगे ख़ामोशियों में।

मैं तुम्हें फिर मिलूँगा,
किसी अनजान-सी राह पर,
शायद तुम पहचान न पाओ,
पर मैं ठहर जाऊँगा तुम्हारी आहट पर।

मैं तुम्हें फिर मिलूँगा,
न कोई शिकायत होगी, न सवाल,
बस एक मुस्कान होगी चेहरे पर,
और आँखों में वही पुराना ख़याल।

मैं तुम्हें फिर मिलूँगा,
जब उम्र बहुत आगे निकल जाएगी,
जब ज़िंदगी सारी थक जाएगी,
और यादें ही पास रह जाएँगी।

मैं तुम्हें फिर मिलूँगा…
मगर इस बार कोई हक़ नहीं माँगूँगा,
बस दूर से तुम्हें देखकर,
चुपचाप मुस्कुरा दूँगा।

क्योंकि कुछ रिश्ते
मिलने के लिए नहीं होते…
बस उम्रभर महसूस करने के लिए होते हैं।

बस एक एहसास

ना तुम मेरे हो,
ना मेरे साथ हो,
ना तुम पर मेरा हक़ है,
फिर भी क्यों इतने ख़ास हो।

ना जज़्बातों का मेला है,
ना ख़्वाहिशों का रेला है,
ना इस दिल में तुम हो,
फिर भी दिल में झमेला है।

ना तुमसे कोई वादा है,
ना तुमसे कोई शिकायत है,
फिर भी तेरी ख़ामोशी से,
मेरे मन में एक पश्चाताप है।

ना तुम्हें पाने की चाहत है,
ना तुम्हें रोकने की ताक़त है,
फिर भी तेरे दूर जाने पर,
दिल को जाने क्यों आफ़त है।

ना तुम मेरी आदत हो,
ना मेरी कोई ज़रूरत हो,
फिर क्यों हर ख़ाली पल में,
तुम मेरी सबसे बड़ी कमी हो।

मैंने कभी तुमसे माँगा क्या,
बस थोड़ा-सा अपनापन था,
तुमने वो भी दे दिया होता,
तो शायद दर्द इतना कम था।

तुम्हें खोने का डर कैसा,
जब तुम कभी मेरे थे ही नहीं,
फिर भी ये दिल रोता है,
जैसे तुमसे ज़्यादा कोई था ही नहीं।

ना शिकायत कर सकता हूँ,
ना तुमसे सवाल कर सकता हूँ,
जिस रिश्ते पर हक़ ही नहीं,
उसका दर्द किससे बयां कर सकता हूँ।

कभी-कभी लगता है तुमसे,
दूर रहना ही बेहतर है,
फिर दिल कहता है—
तेरी यादों के बिना भी कौन-सा सवेरा है।

तुम मेरे नहीं हो,
ये सच मैं रोज़ समझता हूँ,
मगर दिल को कौन समझाए—
मैं तुम्हें आज भी अपना ही समझता हूँ।

शायद यही मेरी ख़ता है,
या दिल की कोई मजबूरी है,
तुमसे कोई रिश्ता नहीं मेरा,
फिर भी तुमसे दूरी अधूरी है।

ना तुम मेरे हो,
ना मेरे साथ हो,
ना तुम पर मेरा हक़ है,
बस एक एहसास हो…

जिसे अपना कह नहीं सकता,
जिसे भूल भी नहीं सकता,
जिससे कोई शिकायत नहीं,
फिर भी जिसके बिना
मैं रह भी नहीं सकता।

Tuesday, 8 September 2026

मुझे तुम पूरे नहीं चाहिए

मुझे तुम पूरे नहीं चाहिए,
मुझे तुम पूरी ज़िंदगी चाहिए—
टुकड़ों में, किस्तों में,
धीरे-धीरे पुराने होते हुए।

वो जवानी में लिए कर्ज़ की पहली किश्त,
और बुढ़ापे में चुकाई आख़िरी किश्त तक।
वो पहली किराने की लिस्ट,
जिसमें घर बसाने के सपने थे,
और वो आख़िरी लिस्ट,
जिसमें बस ज़रूरत भर का सामान हो।

नए घर की पहली चाबी से,
दरवाज़े पर जमी आख़िरी जंग तक।
नए बर्तनों की चमक से,
उन पर जमी बरसों पुरानी धूल तक।
आँगन में लगाए पहले बीज से,
उसी वृक्ष के आख़िरी फल तक।

बच्चों की पहली किलकारी से,
घर में उतरती आख़िरी ख़ामोशी तक।
तुम्हारे काले बालों की पहली लट से,
उनमें उतरी आख़िरी चाँदी तक।

मुझे तुम्हारी खूबसूरत जवानी नहीं,
मुझे अब उम्रदराज समझदारी चाहिए ।
परियों की किस्से नहीं,
अब बची साँसों के हिस्से चाहिए ।

मुझे तुम पूरे नहीं चाहिए,
मुझे तुम शुरुआत से नहीं…
मुझे चाहिए तुम्हारे आख़िरी पल,
जहाँ ‘तुम’ और ‘मैं’ खत्म,
बस बाकी रह जाएं हम ।

Tuesday, 1 September 2026

मन के अच्छे लोग

कुछ लोग आज भी समझ नहीं पाते,
वो मन के अच्छे लोगों को नहीं अपनाते।
चेहरे की चमक में उलझे रहते हैं,
दिल की सच्चाई को कहाँ पहचान पाते हैं।

जो बिना मतलब साथ निभाते हैं,
वो ही अक्सर दूर कर दिए जाते हैं,
और जो मतलब से पास आते हैं,
उन्हीं को अपना समझ बैठते हैं।

अच्छे लोग शोर नहीं करते,
बस खामोशी से रिश्ते निभाते हैं,
जब तक साथ रहते हैं कदर नहीं होती,
दूर चले जाएँ तो बहुत याद आते हैं।

कुछ लोग आज भी समझ नहीं पाते,
वो मन के अच्छे लोगों को नहीं अपनाते,
फिर उम्र भर तलाशते रहते हैं उन्हें,
जो कभी उनके पास थे… मगर वो पहचान नहीं पाते।

मुझे छेड़ने का मजा

मुझे छेड़कर तुम्हें मज़ा आता है,
मगर तुम्हारा ये अंदाज़ हमें रुलाता है।
तुम तो हँसकर गुज़र जाते हो उस पल से,
पर वो पल हमारे दिल में ठहर जाता है।

हमें भी तो हसरत है दो पल तुम्हारे साथ की,
कुछ अनकही बातों की, कुछ मीठी मुलाक़ात की।
तुम्हें लगता है हम भी हँसकर भूल जाएंगे,
पर हमें आदत है हर बात दिल से लगाने की।

तुम जानकर भी क्यों दिल को यूँ सताते हो,
कभी पास बुलाते हो, कभी दूर चले जाते हो।
तुम्हारी ये अदा शायद तुम्हें बहुत प्यारी है,
मगर हम इससे हर बार थोड़ा टूट जाते हैं।

शरारत करो, मगर दिल से खेला न करो,
हमें यूँ चाहत में उलझाकर छोड़ा न करो।
तुम्हें हँसी आती है हमारी घबराहट देखकर,
हमारी धड़कनों को यूँ तमाशा बनाया न करो।

बस इतना समझ लो—तुम्हारी हर बात असर करती है,
तुम्हारी बेरुख़ी भी रातों तक सफ़र करती है।
इसलिए तुम्हारा ये अंदाज़ अब अच्छा नहीं लगता,
तुम्हारी छेड़छाड़ से ज़्यादा, तुम्हारी ख़ामोशी डराती है।

मैं सबका हो गया…

मैं सबका हो गया,
पर मेरा कोई न हो पाया,
दर्द को छुपाते-छुपाते,
अपनी खुशी भी बाँट आया।

हर रिश्ते को दिल से सींचा,
हर रिश्ते को अपना माना,
किसी की आँखों में आँसू देखे,
तो अपना दर्द भी भूल जाना।

किसी की ख़ामोशी पढ़ ली मैंने,
किसी की धड़कन समझ आया,
सबके ज़ख्मों पर मरहम रखा,
पर अपना ज़ख्म छुपाया।

सारी भीड़ मेरी जानी-पहचानी,
हर चेहरा अपना सा पाया,
सबके बीच हँसता रहा मगर,
लौटकर खुद को तन्हा पाया।

जिनके लिए खुद को खोता रहा,
उनसे ही दूर होता गया,
जिन्हें अपना कहकर उम्र दी,
उनका भी दिल दुखाता गया।

मुझे लगा कि सब ही गलत हैं,
सबने मुझे समझा नहीं,
फिर जब खुद से आँख मिलाई,
तो कोई पर्दा बचा नहीं।

गलतियों का पहाड़ खड़ा था,
मेरे ही कदमों के सामने,
जिन्हें दोषी कहता था मैं,
मैं भी था उन इल्ज़ामों में।

किसी को वक्त नहीं दे पाया,
किसी का मन नहीं पढ़ पाया,
कभी अपनी ज़िद को सच समझा,
कभी अहंकार को प्रेम बताया।

किसी के आँसू देखे तो भी,
उनका कारण समझ न पाया,
अपनी बात मनवाने की धुन में,
कितने अपने का दिल दुखाया।

आज पुरानी यादें आती हैं,
तो आँखें नम हो जाती हैं,
जो बातें तब छोटी लगती थीं,
वो अब सीने में चुभ जाती हैं।

कुछ रिश्ते मेरी भूलों से टूटे,
कुछ मेरी ख़ामोशी से रूठे,
कुछ मेरे शब्दों से घायल हुए,
कुछ मेरे लौटने तक छूटे।

विरह की ये रातें पूछती हैं,
क्यों इतना देर से समझ आया?
जिसे अपना समझकर खो दिया,
उसे अपना क्यों न रख पाया?

अब किससे जाकर माफ़ी माँगूँ,
किसके आगे सिर झुकाऊँ,
जो लौटकर आना ही नहीं चाहते,
उनको कैसे फिर से बुलाऊँ?

ना कोई शिकवा बचा अब,
ना कोई इल्ज़ाम रहा,
दूसरों को गलत कहने वाला,
आज खुद ही कटघरे में खड़ा।

मैं सबका होकर भी तन्हा था,
ये सच अब समझ में आया,
सबको अपना कहते-कहते,
खुद से ही रिश्ता टूटता पाया।

काश समय फिर लौट के आता,
कुछ पल फिर से मिल जाते,
जिन दिलों को मेरी वजह से ठेस लगी,
उन पर हाथ रखकर कह पाता—

“मुझसे भी गलतियाँ हुई थीं,
मैं हर बात में सही नहीं था,
तुम्हें खोना मेरी नियति नहीं,
मेरी अपनी भूलों का नतीजा था।”

अब जो बचा है जीवन में,
उसे शिकायत में नहीं गँवाना,
जिनसे प्रेम रहा दिल में,
उनको दिल से ही निभाना।

क्योंकि उम्र ने आखिर सिखलाया,
रिश्ते जीतने से नहीं बचते,
कभी झुकना भी पड़ता है,
कभी अपने भी दोष समझते।

मैं सबका हो गया उम्रभर,
पर मेरा कोई न हो पाया,
शायद कमी दुनिया में नहीं थी—
मैंने ही खुद को बहुत देर से समझ पाया।

दर्द को छुपाते-छुपाते,
अपनी खुशी भी बाँट आया,
सारी भीड़ मेरी अपनी थी,
फिर भी खुद को अकेला पाया।

आज बस इतना कह पाता हूँ—
पूरी उम्र गलतियाँ करता रहा,
बस मानने में पूरी उम्र लग गई…
सबको अपना समझता रहा,
पर खुद को समझने में उम्र लग गई।

वो चाहती भी है मुझे…

वो चाहती भी है मुझे,
और दूर भी नहीं रह पाती है,
कभी करीब आकर सुकून पाती है,
कभी खुद ही फासले बना जाती है।

खुद को खुद से रोकती है,
फिर खुद ही लौटकर आती है,
कहती है— “कोई फर्क नहीं पड़ता,”
फिर मेरी खामोशी में घबराती है।

मुझे अपना कहती नहीं,
किसी और का होने देती नहीं,
अजीब सी कशमकश है उसके दिल में,
मुझसे दूर भी जाती नहीं।

लापरवाह बनने का अभिनय करती है,
मगर मेरी हर बात पर ठहर जाती है,
चेहरे पर चाहे बेरुखी रखे,
आँखों से फिर भी परवाह जताती है।

शायद डरती है मुझसे मोहब्बत करने से,
शायद खुद से ही कुछ छुपाती है,
इसीलिए पास आकर सिमटती है,
और पास आते ही दूरियाँ बढ़ाती है।

मैं भी समझता हूँ उसकी मजबूरी,
उसकी उलझन को नाम नहीं देता,
बस इतना जानता हूँ—
वो मुझे छोड़ना चाहती भी है,
और छोड़ भी नहीं पाती है।

वो चाहे जितना खुद को मुझसे दूर करे,
दिल फिर उसे मेरे पास ले आता है,
कुछ रिश्ते खत्म नहीं होते कभी…
बस उन्हें निभाने का तरीका बदल जाता है।

शायद हमारा रिश्ता भी अजीब सा है,
जिसे कोई नाम दिया नहीं जाता,
वो मुझे खोना भी नहीं चाहती,
और पूरी तरह अपना भी नहीं पाती।

वो चाहे जितना खुद को मुझसे दूर करे,
दिल फिर उसे मेरे पास ले आता है,
कुछ रिश्ते खत्म नहीं होते कभी…
बस उन्हें निभाने का तरीका बदल जाता है।