Tuesday, 30 September 2025

रिश्तों का अंत

रिश्ते का अंत समझदारी से हो,
ना कोई मलाल हो, ना मन भारी हो।
एक ही जीवन मिला है हमको,
जो भी हो अंत, वो लाभकारी हो।

अंत तो सबका तय होता,
यही तो शुरू से भय होता।
किसी का मिलन आंसुओं से तो,
किस का बिछोह हंसी खुशी होता है।

अब नहीं बन रही है तो छोड़ो,
नव कड़ियों से जीवन जोड़ो।
खत्म करो इस बोझ को,
बदल दो अपनी सोच को ।

वो रास्ते जो ठहर गए हैं,
उन्हें हवा में उड़ जाने दो।
जो दिल में जमी हैं गांठें,
उन्हें खुलकर बिखर जाने दो।

कुछ यादें छोड़ना पड़ेगी,
बची हुई तन्हाई समेटना पड़ेगी।
वक्त अच्छा था समझ ना पाए,
उन रिश्तों को सहेज ना पाए।

मन में कोई बोझ रखना नहीं,
कोई बुरी बातें सहेजना नहीं।
यादें जीवनभर साथ निभाएंगी,
हर सुख-दुख में पास आएंगी।

रिश्तों में भावनाएँ ही होती हैं,
उन्हें आहत होने ना देना।
उस रिश्ते को सुंदर अंत देना,
जीवन को जीने का मंत्र देना।

रिश्ते का अंत समझदारी से हो,
ना कोई मलाल हो, ना मन भारी हो।
एक ही जीवन मिला है हमको,
जो भी हो अंत, वो लाभकारी हो।

Monday, 29 September 2025

👨‍👧 पिता और बेटी 👨‍👧

पिता और बेटी, का एक अपना संसार है,
जहाँ हर कोने में बस बेहिसाब प्यार है।

बेटी अगर एक आंख है तो पिता उसकी पलक है,
पिता अगर दिल है तो बेटी उसकी धड़क है।

बेटी बाप की दुनिया का सबसे प्यारा फरिश्ता है,
उन दोनों के बीच अनमोल, अटूट सा रिश्ता है।

जब बेटी रोती है तो बाप का मन भीग जाता है,
और जब वो मुस्कुराती है तो उसका जहान जगमगाता है।

बाप काम पर जाता है तो बेटी राहें तकती है,
उसकी मासूम पुकार हर थकान हर लेती है।

बेटी की मुस्कान से पिता की रूह खिल जाती है,
उसकी खामोशी से उसकी सांसें भी थम जाती हैं।

बेटी का हर अरमान बाप का सपना होता है,
बिन मांगे उसकी हर ख्वाहिश पूरी कर देता है।

जिस घर में बेटी नहीं होती,
वहां उसकी मन्नत होती,

क्योंकि बेटी ही तो पिता की
सबसे बड़ी जन्नत होती।

बाप का घर बेटी की किलकारियों से महकता है,
और उसकी विदाई से वही घर वीराना सा लगता है।

बाप का दर्द शब्दों में बयां नहीं होता,
उसकी आंखों में नमी, लबों पर दुआ होता।

वो एहसास कोई नहीं समझ पाएगा,
ऐसा भाग्य सिर्फ नसीब वाला पाएगा।

पिता ही है जो दिल थाम कर मुस्कुराता है,
बेटी को विदा कर भी उसे दुआएं देता जाता है।

जब बेटी हंसेगी वहां,
बाप की रूह खिल उठेगी यहाँ।

पढ़कर रोना मत मेरे भाई,
अगर तुझे बेटी है तो सहना पड़ेगी जुदाई।

ऐसा बलिदान कोई कर पाएगा,
अपने जिगर के टुकड़े को किसी दे पाएगा।

जिगर के टुकड़े को कोई देता है,
जो देता है, बस वही सच्चा बाप होता है।

अगर आपको बेटी है तो उसे संभालना,
उसके सारे नाज-नखरे मुस्कुराकर उठाना।

उसकी हर ख्वाहिश को अपने दिल में बसाना,
उसकी हर हँसी में खुद को भूला देना।

जब वह रोए तो उसकी चुप्पी समझना,
उसके आँसुओं में अपनी आँखें डुबो देना।

और जब वह उड़ान भरे,
उसे अपने पर फैलाने देना,

उसकी पीठ थपथपाना, 
उसका हौसला बढ़ाना।

दुनिया से उसको लड़ना सिखाना,
सबसे बहादुर बेटी बनाना है ।

जब उसको मिलेंगे अच्छे संस्कार,
तभी तो बनेगी परिवार का आधार ।

जब जब उसको मिलेगा सम्मान,
तब तब बढ़ेगा बाप का मान ।

बेटी को खोना मत,
अगर खोया तो फिर रोना मत,

बेटी का है ये हम पर एहसान
उससे ही फैलती हर घर में मुस्कान ।

Friday, 26 September 2025

राधा का कृष्ण, मीरा का श्याम

जग में एक ही प्यारा नाम,
राधा-मीरा करे गुणगान।
राधा का वृंदावन में था वास,
मीरा राजमहल की थी खास।

गोकुल गलियों में राधा की छवि,
यमुना तट पर मुरली की तान बजी।
राधा ने बरसाने में लीला रचाई,
मीरा ने भजनों से कथा सुनाई। 

राधा संग गोपियों का रंगीला रास,
मीरा ने सहा विरह का दुःख खास।
राधा ने अमृत रस पीया,
मीरा ने जहर भी हँसकर जिया।

राधा संग बंसी की मधुर तान,
मीरा के गीत भजन थे जान।
राधा ने लीला में मन बहलाया,
मीरा ने दूरी में प्रेम निभाया। 

राधा रानी, वृंदावन की दीवानी,
मीरा दीवानी, त्याग की रानी।
राधा ने पाया मिलन का सुख,
मीरा ने सहा विरह का दुःख। 

बरसाने की गलियों में राधा भटकी,
यमुना के तट पर मुरली अटकी।
राधा मगन रहीं रास में,
मीरा रोई विलाप में।

राधा द्वापर की सखी सुहानी,
मीरा कलियुग की साध्वी ज्ञानी।
राधा ने कान्हा संग लीला सजाई,
मीरा ने भजन में आत्मा डुबाई। 

मीरा विरह में उम्र गुज़ारी,
राधा ने की कृष्ण की मनुहारी।
मीरा ने पाया स्मरण का जीवन,
राधा ने किया कृष्ण संग रमण। 

राधा हो या मीरा…
कथा सब गावे…
मिलन हो या विरह…
प्रेम वही सिखावे…

बरसाने की लीला, यमुना की छाया…
चित्तौड़ की हवेली में भी भक्ति समाया ।
मीरा ने विरह में आपणी रूह गंवाई,
राधा ने वियोग में परम आनंद पाई।

मीरा जैसा कोई ना भजे,
राधा जैसा कोई ना सजे ।
सांवरे के नाम के मजे,
इस जग में ना कोई प्रेम ताजे ।।

राधा – मोहब्बत की दीवानी,
मीरा – भक्ति की दीवानी।
मिलन हो या विरह,
दोनों प्रेम को ही पहचानी ।

मीरा राधा नाम से, जग जाए गुणगान ।
भक्ति मोहमयी कथा, अमर रहे भगवान ।।

Thursday, 25 September 2025

अगर सपने सच होते

अगर सपने सच होते,
तो कितने अधूरे ख्वाब पूरे होते।
उम्मीदों के सब दरवाज़े खुलते,
पाँव ज़मीं पर, पर सपने आसमान में होते।

हर गरीब की थाली में पकवान होते,
किसानों के खेत सोने से लहलहाते।
हर माँ की आँखों में चमक होती,
हर बाप के हाथ सदा भरे होते।

ना बेरोज़गारी की लाइन होती,
ना महंगाई की कोई मार होती।
हर परिवार के सिर पर छत होती,
हर थाली में दो वक़्त की रोटी होती।

घर-आँगन में एकता होती,
जायदाद में झगड़ा नहीं होता।
रात को चूल्हा सबके लिए जलता,
हर दिल में खुशियों का दीप जलता।

हर बच्चा पढ़ने जाता,
पढ़-लिखकर ऊँचा मुकाम पाता।
ना कोई भूख से बिलखता,
ना कोई दवा को तरसता।

ना उम्र की कोई कैद होती,
ना रिश्तों में कोई बंधन होता।
जैसा दिल चाहता वैसा होता—
काश ये सपना सच होता।

Wednesday, 24 September 2025

तेरे साथ होने के ये एहसास

तेरे साथ होने के ये एहसास
होते हैं बहुत खास,
पूरी रूह महक जाती है
जब बदलती हो तुम अंदाज़।

वो नजाकत, वो नफ़ासत,
वो गुलाबी से बोल,
नशीली आँखें, गाल पर तिल,
और चेहरे पर गिरते घुंघराले बाल।

वो तेरी महकती साँसें,
धड़कनों में गूंजता संगीत,
गालों पे दमकती चांदनी,
बोली तेरी जैसे सुमधुर गीत।

बलखाती लहराती तेरी चाल,
हर कदम पे ठहर जाए हर सवाल,
जैसे चाँदनी बिखर जाए रात में,
वैसे ही तू समा जाए मेरी बात में।

और जब भी तू पास होती है,
दिल में बस जाती है मिठास,
हर ख्वाब सच सा लगने लगता है—
तब होता है तेरे साथ का ये एहसास।

Monday, 22 September 2025

मुलाकातों का सिलसिला

मुलाकातों का सिलसिला थमने मत देना,
दिलों के बीच फासले बढ़ने मत देना।
जमाना तोड़ना चाहता है हर अपनापन,
उनकी साजिशें रिश्तों में घुलने मत देना।

सिंचा है हर रिश्ते को अपने प्यार से,
उस चाहत को कमज़ोर होने मत देना।
वक्त कठिन है, मगर गुजर ही जाएगा,
तुम हालात को दिल के बीच आने मत देना।

बनाया है घरौंदा बड़े प्यार से हमने,
उसका एक एक तिनका जोड़ के रखना ।
उम्मीदों के साथ पकड़ा है हाथ तेरा,
किसी के बहकावे में उसे छूटने मत देना।

भरोसा रखना साथ निभाने का उम्र भर,
साथ रहा तो मुश्किलों को भी हरा देंगे ।
लड़ जाएंगे हर बिगड़े हालातों से,
तुम उम्र भर हौंसला टूटने मत देना।

Saturday, 20 September 2025

मेरा बचपन

आज थोड़ा सा बचपन जी आया,
कुछ पुरानी यादों से मिल आया।

आज की भगमभग वाली ज़िंदगी,
और नकली हँसी पीछे छोड़ आया।

कंचों की चमक, गिल्ली-डंडे का शोर,
फिर से मन को अपना बना आया।

माँ की पुकार, आँगन की रौनक,
उस मिट्टी की खुशबू संग लाया।

बचपन के खिलौने, गलियों के कोने,
सपनों के महल और मिट्टी के खिलौने।

पेड़ की छाँव तले बैठना घंटों,
नदी के पानी में पत्थर गिन-गिन फेंकना।

गुड़िया की शादी, गुड्डे का घरौंदा,
पतंगों की डोर में उलझा किस्सा।

बरसात में कागज़ की नावों का सफ़र,
धूप में आम के पेड़ों पर चढ़ने का हुनर।

माँ की पुकार पर खेल का रुक जाना,
नानी की कहानियों में खो जाना।

आज मैं अपने गाँव हो आया,
थोड़ा-सा बचपन फिर जी आया।

Thursday, 18 September 2025

तेरी आंखें और हंसी

देखा है तेरी आंखों में,
प्यार ही प्यार बेशुमार।
हर ख्वाब में तू ही तू है,
हर धड़कन तेरा इंतज़ार।

तेरी हंसी से रोशन है,
मेरी हर सुबह और शाम।
तेरे बिना अधूरी लगे,
ये ज़िंदगी का हर पैग़ाम।

तेरी आंखों की गहराई में,
एक समंदर छुपा हुआ है।
उनकी खामोशियों में भी,
प्यार का दरिया बहा हुआ है।

तेरी आंखों का हर जादू,
मेरे दिल को छू जाता है।
हर नजर का तेरा इज़हार,
मुझसे कुछ कह जाता है।

तेरी हंसी की खनक सुनूं,
तो फूलों सा महक उठूं।
उसकी मासूम सी मिठास से,
हर ग़म अपना भुला बैठूं।

तेरी आंखें जैसे आईना,
जिसमें मैं खुद को देखूं।
उनकी रौशनी में हर पल,
अपनी दुनिया मैं खोजूं।

तेरी हंसी की मासूमियत,
बनती है मेरी पहचान।
तेरी आंखों की गहराई ही,
मेरे जीने का अरमान।

तेरी आंखें और तेरी हंसी,
दोनों मेरी दुनिया हैं।
इनसे ही सजती है मेरी,
हर खुशी, हर चाहत, हर दुआ हैं।

भगवान की बनाई सीक्वेंस

भगवान ने कैसी सीक्वेंस जमाई,
हार के बाद ही जीत दिखाई ।

पहले होता घोर अंधेरा,
फिर खिलता सुनहरा सवेरा ।

जबान को जब तीखा लग जाता,
फिर सबको मीठे का स्वाद याद आता ।

तलवार के संग ढाल बनाई,
तो सुलह के पहले लड़ाई भी सजाई ।

राह में न जाने कितनी रुकावटें आईं,
हर रुकावट के बाद कुछ राह सुझाई ।

हर खुशी के पहले आँखें हुईं नम,
भूल गए उसके पहले के सारे ग़म ।

पतझड़ के बाद ही बहार आई,
सूखी टहनियों पर कली मुस्कुराई ।

गिरने के बाद ही संभलना सिखाया,
ग़मों के बाद ही खुशियों का रस आया ।

संग संघर्ष के ही मंज़िल सजाई,
भगवान ने कैसी अद्भुत सीक्वेंस बनाई ।

Thursday, 11 September 2025

"ट्रैफिक जाम"

ट्रैफिक जाम,

हर तबका हर इंसा परेशान,

ये रोज रोज का काम,

नहीं मिलता बिल्कुल भी आराम ।


हर चौराहा रेड लाइट,

स्थिति बहुत है टाइट,

हौसला है थका,

सिर्फ उम्मीदों पर टीका ।


बेवजह का शोर,

नहीं चलता अपना जोर,

कोशिश आगे निकलने की,

एक दूसरे को पीछे छोड़ने की ।


तब कान फूट जाते हैं

जब सारे हॉर्न बज जाते हैं

कईं इंजन शोर मचाते हैं

प्रदूषण का इंडेक्स बढ़ाते हैं ।


अस्पतालों के बेड भर रहें

करोड़ों लोग पीड़ित बन रहे,

कईं सांस नहीं ले पा रहे,

बाकी अपने फेफड़े में धूल जमा रहे ।


बेवजह का चक्काजाम,

दुकानदार फैला रहा सड़क पर दुकान,

कोई अपनी हद पार कर रहा,

उधर एम्बुलेंस में लेटा भगवान को याद कर रहा ।


सिपाही सिटी बजा रहा,

जैसे कानों में म्यूजिक सुना रहा,

इंस्पेक्टर चलान बना रहा,

आम आदमी अपनी जेब से चुका रहा ।


सड़क पर ठेलों का राज,

भीड़ में खड़े जोर जोर से देते आवाज,

एक दिन सब सुधर जाएगा,

क्या मालूम वो दिन कब आएगा ।


क्यों नहीं अपनाते पब्लिक ट्रांसपोर्ट,

नहीं जाना पड़ेगा चालान चुकाने कोर्ट,

सड़कों को भी थोड़ी सांस आएगी,

सबकी 2- 4 साल जिंदगी बढ़ जाएगी ।


अब नई पीढ़ी आयेगी,

साफ़ हवा संग मुस्कुराएगी,

हर बच्चा होगा तंदरुस्त,

युवा रहेंगे मन और शरीर होगा स्वस्थ ।


हर सड़क पर हरियाली होगी,

न धुआं, न कचरे की ढेरी होगी,

साफ़ हवा का तोहफ़ा पाएंगे,

पक्षियों की चहचहाहट फिर से लौटाएंगे ।


ना हॉर्न का शोर, ना जाम की मार,

साइकिल और पैदल चलना होगा अपार,

पब्लिक ट्रांसपोर्ट बनेगी पहचान,

कम होगा प्रदूषण, शहर का बढ़ेगा सम्मान।


जब सांसें होंगी हल्की और साफ़,

दिल भी रहेगा मजबूत और ख़ास,

नई सुबह एक वादा लाएगी,

अबकी पीढ़ी मुस्कुराती जाएगी। 


भाई कहां खो गया,

तब इस जाम से भी मुक्ति मिल जाएगी ।

ए इश्क़ — तू क्या चाहे

 ए इश्क़ तू क्या चाहे,
थोड़ा सा अदब और
प्यार के दो बोल चाहे।

चोरी-चोरी, चुपके से मिलना,
और फिर ढेर सारी बातें करना चाहे।

कभी खामोश लम्हों को याद बना दे,
तो कभी छोटी से बात में रूठ जाना चाहे।

घंटों तक एक-दूजे की राह तकना,
मिलते ही फिर मासूम-सा झगड़ना चाहे।

ना जाने कितने झगड़े,
और अंत में बस इक समझौता चाहे।

कभी हंसी में आंसू छुपाना,
कभी आंसुओं में सुकून पाना चाहे।

रात रात भर बात करना और
आखिर में लड़कर रोना चाहे।

ए इश्क़—तेरी बड़ी अजीब चाह है,
हम तेरे रहे या ना रहें, तू क्या चाहे।

कभी कभी दिल को तोड़ना
फिर मुझे ही समझाना चाहे।

खुद को धीमा दर्द देना चाहे,
फिर उसी दर्द में राहत भी पाना चाहे।

बार बार तुझ पर मरना चाहे,
मर मर कर तेरे साथ जीना चाहे।

ये रोना चाहे, हंसना चाहे,
तेरे इश्क में फ़ना होना चाहे।

ए इश्क जिद ना कर, 
आज तो तू बता,
तू मुझसे क्या चाहे ।

Wednesday, 10 September 2025

मंजिल यही है

 कभी-कभी रस्ते नहीं,

खुद को बदलना पड़ता है ।


​जिस मंजिल की तलाश में चले थे,

उसे भी छोड़ना पड़ता है।


​उम्र निकल जाती है पहुँचने में,

कईं अपनों का साथ छोड़ना पड़ता है।


​राह दर राह बदलते रहे हम,

मुकाम भी वहीं मिला,

जहाँ से चले थे हम।


​कितने करीब से निकले थे,

हम मंजिल के, 

फिर भी, दूरियों का अहसास था।

शायद, मंजिल नहीं, 

सफर ही जिंदगी का सार था।


​अब चलते हैं हम,

बिना किसी मंजिल की आस में,

हर हर कदम पड़े अपनों के साथ से ।


​यहां हर कदम पर नया सवेरा है।

और हर मोड़ पर एक नई कहानी है।

यही तो अपनी जिंदगानी है।

Tuesday, 9 September 2025

ठहर जा अब

कभी-कभी रस्ते नहीं,
खुद को बदलना पड़ता है।

जिस मंज़िल की तलाश में निकले थे,
उसे भी छोड़ना पड़ता है।

उम्र निकल जाती है पहुँचने की चाह में,
छोड़ना पड़ता है कितनों को ही इस राह में।

राह दर राह बदलते रहे हम,
मुकाम भी वहीं मिला,
जहाँ से चले थे हम।

कितने करीब से गुज़रे थे हम मंज़िल के,
फिर भी दूरियों का अहसास था।

शायद, मंज़िल नहीं,
सफ़र ही ज़िंदगी का सार था।

अब चलते हैं हम
बिना किसी मंज़िल की आस में,

हर कदम रखते हैं,
अपनों के साथ में।

यहाँ हर कदम पर घना कोहरा है,
उसी के बाद तो नया सवेरा है ।

हर मोड़ पे छुपी हुई एक कहानी है,
यही तो अपनी जिंदगानी है।

खुद को खुद में तलाश,
अब कहीं और न भाग।

तेरी चाही मंज़िल शायद कभी न आएगी,
बस तुझे यूं ही भटकाएगी।

मत भटक, ठहर जा अब...
सुकून इसी ठहराव में पाएगा,

नहीं तो दौड़ते-दौड़ते
अंत में समा जाएगा।

ना रहेगी मंजिल ओर 
ना फिर कोई मुकाम आयेगा ।

जहां से चला था खुद को ढूंढने 
अपने आप को फिर वहीं पाएगा ।।

Sunday, 7 September 2025

तुम



तुम्हें लगता है मेरे हो तुम,
मगर मेरे नहीं हो तुम।
हर धड़कन में गूंजते हो तुम,
पर धड़कन के संग नहीं हो तुम।

सपनों की चौखट पे ठहरते हो तुम,
सुबह होते ही खो जाते हो तुम।
जैसे अधूरी कोई दुआ हो तुम,
जो लबों पे रह जाते हो तुम।

बारिश की वो पहली बूंद हो तुम,
ज़मीन तक आते ही बिखर जाती हो तुम।
धूप की वो नर्म किरण हो तुम,
जो छूकर भी अक्सर जला जाती हो तुम।

मैं चाहता हूँ थाम लो मुझको तुम,
जैसे हर रिश्तों को थामती हो तुम।
मगर किस्मत के सख़्त हाथ हो तुम,
हमें हर बार दूर कर निकल जाते हो तुम।

तुम्हें लगता है मेरे हो तुम,
पर ये सच्चाई है कि गुम हो गई हो तुम।
में मुसाफिर सा खड़ा रह गया, 
इस बार बहुत दूर निकल गई तुम ।।

✨ कड़ी, जोड़, संबंध✨


🌸 संबंध की ताक़त 🌸


दिखने में तो छोटी-सी है,

पर काम बड़े-बड़े कर जाती है।

तोड़ दो चाहे सब कुछ जीवन में,

ये एक झटके में जोड़ जाती है।


ध्रुव तारे से जब जोड़ो इसे,

ज्ञान का पथ प्रकाशित हो जाता है।

सितारों में ढूंढो जब इसको,

तो सप्तऋषि रूप सामने आ जाता है।


रिश्तों से जोड़ो तो रिश्तेदार,

अनजान से जोड़ो तो दोस्ती बन जाते।

हर जोड़ में छुपी एक दास्तान होती है,

कुछ नई खिलती, कुछ पुरानी पहचान होती है।


एक-एक जोड़ते जाओ तो,

कईं सुराग़ सामने आ जाते हैं।

कईं रहस्यों की परतें खुल जातीं,

छुपे हुए राज़ सामने आ जाते हैं।


DNA के रहस्य भी उजागर हो जाते,

जब खून से धागे जुड़ जाते।


पर इंसान ही अक्सर चूक जाता है,

रिश्तों में जोड़ना भूल जाता है।

अगर जोड़ ले अपने परिवार से,

तो रिश्तों के फूल खिल उठते हैं।

खुशियों के ताले खुल जाते हैं।


संबंध ही सच्ची शक्ति है,

जो दिल के द्वार खोल देती है।

बिन कुंजी भी जब जुड़ जाए,

तो हर राह रौशन हो जाती है।

Saturday, 6 September 2025

परिवार के संबंध

 मेरी एक नई रचना से फिर से शुरुआत कर रहा हूं ।


माँ-बाप से बच्चा जो रिश्ता पाता,

उसमें सारा संसार समा जाता।

यह रिश्ता ही जीवन का पहला गीत,

हर पल देता स्नेह का मीत।


भाई-बहन का मीठा नाता,

खुशियों से भरा हुआ प्यारा साधा ।

कभी झगड़ा, कभी हंसी की बात,

नाते से ही सजती जीवन की रात।


पति-पत्नी का गहरा बंधन,

सुख-दुख में बनता अटूट संगम।

बंधन से ही जीवन संवर जाता,

हर आंधी तूफ़ान को पार कर जाता।


दादा-दादी का स्नेहिल संपर्क,

बचपन में भर देता अद्भुत आकर्षण ।

संपर्क से ही पीढ़ियाँ जुड़ पातीं,

अनुभव की रोशनी इसे आगे बढ़ातीं।


दोस्तों से जो गहरा लगाव हो जाए,

तो मन का बोझ हल्का हो जाए।

लगाव ही है जीवन की सच्ची पूँजी,

जिससे हर मुश्किल हो जाए दूजी।


रिश्तों में जब जुड़ाव गहराता है,

दिल से दिल का फासला मिट जाता है।

जुड़ाव ही है अपनापन की निशानी,

जो बना देता है पराया भी अपना पानी।


परिवार में बसती आत्मीयता की धारा,

जो हर दिल को बना दे प्यारा।

आत्मीयता से ही बंधे घर-आँगन,

यही है जीवन का सबसे बड़ा धन।


हर पीढ़ी की अपनी अलग कड़ी है,

पर इन्हें जोड़ती प्रेम की लड़ी है।

कड़ी से ही चलता वंश का क्रम,

यही बनाता जीवन को गरिमामय दम।


दिल से दिल का सच्चा मेल,

बिन शब्दों के कह देता खेल।

मेल से ही रिश्ते खिल उठते हैं,

हर कोना फूलों-सा महक उठते हैं।


जीवन में परस्परता ज़रूरी है,

यही तो परिवार की मजबूती है।

परस्परता से बढ़ता अपनापन,

यही है जीवन, यही है संबंध का दर्पण।


हेमंत शर्मा