Wednesday, 29 April 2026

हर किसी के लिए नहीं

अगर में कुछ कहूँ,
तो सुन लेना कुछ बात मेरी,
में हर किसी से सब कुछ कहता नहीं, 

अगर में आगे बढ़ूँ,
तो पकड़ लेना हाथ मेरा,
में हर किसी के साथ जुड़ता नहीं।

अगर में तुम्हारे साथ चलूँ,
तो चल देना साथ मेरे,
में हर किसी के साथ कदम बढ़ाता नहीं।

अगर में खामोश रहूँ,
तो समझ लेना हाल मेरा,
में हर किसी को अपना दर्द बताता नहीं।

अगर में मुस्कुरा दूँ,
तो पहचान लेना वजह मेरी,
में हर किसी के लिए यूँ हँसता नहीं।

अगर में ठहर जाऊँ कहीं,
तो जगह दे देना पास अपने,
में हर किसी के पास यूँ ठहर जाता नहीं।

अगर में नज़रें मिलाऊँ,
तो पढ़ लेना आँखों की बात,
में हर किसी से यूँ नज़रें मिलाता नहीं।

अगर में वक्त दूँ तुझे,
तो समझ लेना अहमियत मेरी,
में हर किसी के लिए यूँ वक्त बनता नहीं।

अगर में नाम लूँ तेरा,
तो महसूस करना अपनापन,
में हर किसी को यूँ यादों में लाता नहीं।

अगर में रूठ जाऊँ कभी,
तो मना लेना मुझे,
में हर किसी से यूँ उलझता नहीं।

अगर में मना लूँ तुझे तो
मान लेना प्यार मेरा,
में हर किसी को यूँ मनाता नहीं।

अगर में साथ निभाऊँ तो
यकीन करना मेरे इरादों पर,
में हर किसी के लिए यूँ ठहरता नहीं।

अगर में तुझे चुन लूँ तो
समझ लेना फैसला मेरा,
में हर किसी को यूँ चुनता नहीं।

अगर में तेरा हो जाऊँ तो
संभाल लेना साथ मेरा,
में हर किसी का यूँ होता नहीं।

अगर में आख़िर तक तेरा रहूँ तो
यकीन करना इस बात पर,
ईश्वर ऐसे रिश्ते हर किसी को देता नहीं।

Friday, 24 April 2026

लौट आएगी

वो उलझी हुई है फ़िलहाल,
अपनी ही बनाई दिमाग़ी दुनिया में...
जहाँ वो मेरी होने से भी डरती है,
और मुझे खोने से भी.....

खुद से ही लड़ती रहती है हर रोज़,
अपने ही खयालों के साए में…
कभी पास आने की चाहत,
तो कभी दूर जाने के बहाने में…

मैं समझता हूँ उसकी खामोशी को,
ये कोई बेवफ़ाई नहीं है…
बस डर है उसे उस मोहब्बत से,
जो कभी आधी रह जाए कहीं…

वो चाहती तो है मुझे पूरे दिल से,
पर जताने से घबराती है…
इधर-उधर की बातें बनाती है,
इस बहाने थोड़ा करीब आ जाती है…

मैं भी समझता हूँ उसकी उलझन,
उसके हर डर को पहचानता हूँ…
इसलिए उसे बाँधने की कोशिश नहीं,
बस दूर से ही उसका साथ निभाता हूँ…

वो जितना मुझसे दूर भागती है,
मैं उतना ही ठहर जाता हूँ…
हर बार उसे खोने के डर से नहीं,
उसे समझने के सब्र से रुक जाता हूँ…

एक दिन वो खुद से जीत जाएगी,
अपने ही सवालों से निकल आएगी…
और बिना कुछ कहे ही शायद,
मेरे पास लौट आएगी…

यारों की कमी हो गई

यारों के साथ वाली हंसी गुम हो गई,
वो अल्हड़पन की शरारतें,
बिना टॉपिक के बेतुकी बातें,
और सुबह-शाम की मुलाक़ातें कम हो गईं।

अब हर कोई अपनी दुनिया में उलझा है,
वक्त जैसे हाथों से फिसलता सा लगता है,
जो बातें घंटों चला करती थीं पहले,
अब "बाद में बात करते हैं" में सिमटता सा लगता है।

कभी चाय की टपरी पर जो महफ़िल सजती थी,
आज वो यादों के कोने में ठहरी रह गई,
हँसी तो आज भी आती है चेहरे पर,
पर वो दिल से निकली खिलखिलाहट कहीं खो गई।

ना जाने ये ज़िम्मेदारियों का असर है,
या वक्त का कोई अनकहा सा खेल,
मिलते तो आज भी बहुत से लोगों से,
पर “अपने” कहीं रास्तों में बिछड़ते चले गए।

Thursday, 23 April 2026

मौकापरस्ती का गहना

मौकापरस्ती बहुत पुराना गहना है,
जो सिर्फ़ स्वार्थी लोगों पर ही सजता है।

चेहरों पर मुस्कान, दिल में हिसाब रखते हैं,
रिश्तों को भी ये लोग मुनाफ़े से तौलते हैं।

वक्त के साथ रंग बदलना इनकी आदत है,
हर मोड़ पर खुद की ही इबादत है।

सच और जज़्बात इनसे दूर ही रहते हैं,
ये लोग मतलब के मौसम में ही बहते हैं।

ये लालची लोग इसी गहने के लालची होते हैं,
इसे उतार फेंकने की कूवत रखते नहीं।

पर याद रखना, ये चमक ज़्यादा देर टिकती नहीं,
मौकापरस्ती की चमक में असलियत छिपती नहीं।

आख़िर में वही दिलों में बसते हैं,
जो इन गहनों के मोह से दूर रहते हैं।

Monday, 20 April 2026

तुम गए नहीं

तुम गए....
पर सच कहूँ, सब कुछ गया नहीं…
उम्मीद अब भी है—कुछ बिगड़ा नहीं।

थोड़ी-सी कसक
और बहुत-सा इंतज़ार,
उलझे हुए मसलों के
कभी तो सुलझ जाने का करार।

हर सुबह…
आशा की एक किरण
आज भी मेरे कमरे में
चुपके से तुम्हारा नाम कह जाती है।

कुछ शामें हैं…
जो आज भी अधूरी-सी ढलती हैं,
जैसे तुम्हारे बिना
दिन पूरा होना भूल गया हो।

कुछ खामोशियाँ हैं…
जो अब भी तुम्हारी आहट में चलती हैं,
और दिल को हर बार
तुम्हारी ओर मोड़ जाती हैं।

वक़्त ने समझाया…
सब पीछे छोड़ दो… आगे बढ़ो…

पर दिल ने धीरे से कहा…
कुछ रिश्ते खत्म नहीं होते,
बस शोर छोड़कर
खामोशी में उतर जाते हैं…

और फिर वहीं कहीं,
भीतर की गहराइयों में
धीरे-धीरे बस जाते हैं…

Sunday, 19 April 2026

किश्तों की कहानी

वो बरसों से अपने आप को समझा रहा था,
अपने हिस्से के सपनों को दबा रहा था,
तराश रहा था अपने बुढ़ापे को जवानी में,
हर ख्वाहिश को चुपचाप मिटा रहा था।

हँसता था वो सबकी खुशियों के बीच,
अपने दर्द को अंदर ही छुपा रहा था,
कंधों पर जिम्मेदारियों का बोझ लिए,
खुद से ही रोज़ समझौता किए जा रहा था।

जिस उम्र में जीना था खुलकर उसे,
वो बस जिम्मेदारियां बढ़ाता रहा,
खुद को हर बार गिरवी रखता था,
उसके बदले परिवार की किश्त चुकता रहा।

जितनी बार संभलने का सोचा,
हर बार जिम्मेदारियों ने टोका,
भीड़ में वो अकेला चलता रहा,
अपना वजूद खुद में ही खोता रहा।

कितने ही दर्द वो अकेला पी गया,
कई बार मौत को जी गया,
वो अकेला ही हांफता रहा,
कर्ज चुकाने की दूरियों को नापता रहा।

इतना करने के बाद भी उसे सजा मिल जाती है,
कभी ब्याज बढ़ जाता है, तो कभी किश्त चूक जाती है,
जिंदगी चाहे जितना इम्तिहान ले ले,
वो हर बार खड़ा होता है—और कहानी बन जाती है।

हेमन्त 🍁

Friday, 17 April 2026

वक्त तो लगता है

जी हां, वक्त तो लगता है,

कभी ज़िंदगी को समझने में,
तो कभी खुद को बदलने में।
कभी किसी की यादों से निकलने में,
तो कभी उन्हीं में फिर से उलझ जाने में,

कभी दिल को समझाने में,
तो कभी उसकी ज़िद के आगे हार जाने में।

वक्त लगता है…
किसी अपने को भुलाने में,
या उसे हर रोज़ थोड़ा-थोड़ा खोने में,
कभी सच को स्वीकारने में,
तो कभी झूठ में ही सुकून ढूंढने में।

ये दिल—
जिससे दूर जाना चाहता है,
उसी के पास लौट-लौट जाता है…

और हम—
बस खड़े रह जाते हैं बीच रास्ते में,
न पूरी तरह छोड़ पाते हैं,
न पूरी तरह अपना पाते हैं।

पर शायद…
यही सफर हमें सिखाता है—
कि हर रिश्ता मुकम्मल नहीं होता,
और हर अधूरी कहानी
बेकार भी नहीं होती …