Saturday, 29 November 2025

उलझनों के रंग

यूं ही उलझा हुआ-सा रहने दे तुझमें,
अभी जीने की तमन्ना बची है थोड़ी।
अगर सुलझ गया तो बिखर जाऊंगा,
तेरे ही अक्स में जिंदा रहने दे मुझे।

मुझे यूं बेफ़िक्रा-सा होना नहीं जमता,
थोड़ा अपने करीब ठहरने दे।
अभी तो तेरे सवाल समझने हैं,
मुझे तेरे जवाबों में ही उलझा रहने दे।

इतने सालों से देखता रहा हूँ तुझको,
और कोई तस्वीर जमती ही नहीं।
एक आईना ही है जो तुझे बना सके,
तू नहीं मिली, उस आईने को ही रखने दे मुझे।

तुझे आज तक समझ नहीं पाया,
उन नाज़ुक भावों तक पहुँच नहीं पाया।
दिल की तड़प बाकी रहने दे तुझमें,
तेरे बिना तेरा ही एहसास रहने दे मुझमें।

Friday, 28 November 2025

✨ क्या अब भी तुम वहीं हो ना ✨

जहाँ से हम हाथ पकड़े चले थे,
बंधन दुनिया के तोड़े थे,
राहें बदल गई, मोड़ छूट गए,
क्या अब भी तुम वहीं हों ना।

हमने जो ख्वाब आधे-अधूरे बोए थे,
क्या उनकी ख़ुशबू तुम तक पहुँचती है,
रातों की ख़ामोशी में कहीं
मेरा नाम अब भी तुम पुकारते हो ना।

हम वक़्त से हारकर अलग तो हुए,
पर एहसासों की डोर कहाँ छूटी,
दिल के किसी चुप कोने में
धडकनों में अब भी मुझे ढूंढते हो ना।

जिसपे जानिसार थी सारी खुशियाँ,
वो थी मेरी खुशियों की बगियाँ,
छूटा था साथ जहाँ अपना—
अब भी तुम… शायद वहीं हो ना।

तू इतना जरूरी क्यों है

तू इतना भी ज़रूरी क्यों होता है,
मेरा है—पर मेरे हिस्से में आता भी नहीं,
फिर भी खयालों में रहता है—
शायद ज़िद है दिल की,
ओर ये दिल है कि, मानता ही नहीं है।

दिनभर की थकान के बाद
सुकून की नींद सुलाता भी तू ही है,
सपनों में रहता है—
सुबह उठता भी तू ही है।
तू इतना ज़रूरी क्यों होता है?

मेरे अनगिनत अनसुलझे सवाल
इनके जवाब लाता भी तू ही है
मेरे हर मोड, हर गली के रास्ते
मंजिल पर पहुंचाता भी तो तू ही है ।

जब भी मैं निराश हूँ तो
तू ही तो आशा की किरण ले आता है ।
में तो तेरा कोई भी नहीं लगता
फिर भी तू ही इतना ज़रूरी क्यों होता है?

सबर नहीं होता तुझसे मिलने का,
तू दूर है, पर लगता सबसे करीब-सा है,
जैसे हवा को छू न पाएं, पर महसूस सा लगता है,
वैसे ही… हर पल तू ही ज़रूरी होता है।

Wednesday, 26 November 2025

खुद से मुलाक़ात — एक सफ़र

कभी-कभी रो भी लेना चाहिए,
दिल का बोझ हल्का कर देना चाहिए।
जब बह जाएँ दर्द के सारे निशान,
तो आँसू पोंछकर फिर मुस्कुराना चाहिए।

कभी राह अकेली भी चुननी पड़ती है,
संग-साथ की भी कीमत चुकती है।
हिम्मत करो अकेले सफ़र को तय करने की—
न लगे मन को ठीक, तो वापस लौट आना चाहिए।

कभी-कभी खुद पर गुस्सा भी आ जाना चाहिए,
दबा दर्द आवाज़ बन बाहर आना चाहिए।
हर बार गुस्सा बुरा नहीं होता,
बस खुद को ही शांत करना आना चाहिए।

कभी दुख और तकलीफ़ भी उठानी चाहिए,
दूसरों की पीड़ा भी महसूस होनी चाहिए।
यही तो वक़्त बताता है—कौन है अपना,
और खुद को ही दर्द से निकालना आना चाहिए।

कभी खुद से भी शर्मिंदा हो जाना चाहिए,
दिल की सफ़ाई का सबूत मिल जाना चाहिए।
गलतियों से डरना नहीं, मानना है उन्हें,
सही राह पर फिर लौट आना चाहिए।

कभी-कभी टूटकर बिखरना भी आना चाहिए,
गिरकर फिर उठने का हुनर जगना चाहिए।
हम भी बिखरकर ही समझते हैं—
कि खुद को खुद से जोड़ना फिर से आना चाहिए।

कभी-कभी उलझनों से भी भिड़ जाना चाहिए,
ये रास्ते हैं, बंधन नहीं—मान जाना चाहिए।
इन राहों की पहचान जरूरी है,
और खुद को ही सुलझाना आना चाहिए।

कभी-कभी किसी की बात बुरी भी लग जानी चाहिए,
सच के घाव से दिल तप जाना चाहिए।
पर लौटना है आखिर खुद की ओर ही—
क्योंकि खुद को ही मानना और मनाना आना चाहिए।

Saturday, 22 November 2025

मोहब्बत की हद

आज मोहब्बत भी एक हद में क़ैद नज़र आई,
वो पार कर गए अपनी सारी हदें  — 
फिर भी उसकी कोई ख़ता न पाई।

उसके लिए तो रिश्ते बस टूटता हुआ एक दायरा थे,
मेरी बारी आई… 
तो फिर उसे दायरे की याद आई।

उसकी चाहत के आगे कोई सरहद कभी नहीं ठहरी,
वो बंदिशें तोड़े तो कोई बात नहीं,
उसने मेरी हर कोशिश पर बस लगाम ही लगाई।


वो बेख़ौफ़ खेलते रहे अपनी मर्ज़ी की हर लकीर से,
और वही लकीर .....
सिर्फ़ मेरी बारी पर ही उसे फिर याद आई।

Sunday, 9 November 2025

💔 "आँसू क्यों निकल आते हैं" 💔


हर बात पर क्यों निकल आते हैं आँसू,
बात बेबात पर क्यों रुलाते हैं आँसू।

ज़ख़्म तो पुराने हैं, भर भी नहीं पाते,
तुम याद दिलाओ तो छलक जाते हैं आँसू।

लब ख़ामोश हैं, पर दिल पुकार उठता है,
हर नाम के पीछे तेरा चेहरा लाते हैं आँसू।

भुलाने की कोशिश में सौ दफ़ा टूटा हूँ,
पर तेरे ख़यालों से टकरा जाते हैं आँसू।

लोग कहते हैं — वक़्त बदल देता है सब कुछ,
मगर उस वक़्त में भी तेरे निशां लाते हैं आँसू।

ख़ुशी में भी तेरा एहसास सताता है मुझको,
हँसते हुए भी पलकों पे ठहर जाते हैं आँसू।

हेमंत अब क्या लिखे अपनी तन्हाई का फ़साना,
हर शेर में तेरी झलक दिखा जाते हैं आँसू।

Wednesday, 5 November 2025

तुम खत्म, मै खत्म

मिलना ख़त्म — नज़दीकियाँ ख़त्म,
नज़दीकियाँ ख़त्म — एहसास ख़त्म।
एहसास ख़त्म — जज़्बात ख़त्म,
जज़्बात ख़त्म — तो संबंध भी ख़त्म।

बात ख़त्म — बातचीत ख़त्म,
साथ ख़त्म — तो सफ़र भी ख़त्म।
साँस ख़त्म — धड़कन भी ख़त्म,
ग़ुस्सा ख़त्म — तो असर भी ख़त्म।

नज़रें ख़त्म — तो पहचान ख़त्म,
पहचान ख़त्म — तो अरमान ख़त्म।
पल ख़त्म — तो उम्मीद भी ख़त्म,
उम्मीद ख़त्म — तो तामीर भी ख़त्म।

शिकवा ख़त्म — शिकायत ख़त्म,
झगड़ा ख़त्म — तो प्यार भी ख़त्म।
प्यार ख़त्म — तो दुनिया भी ख़त्म,
दुनिया ख़त्म — तेरी यादें ख़त्म।

यादें ख़त्म — तो सुकून भी ख़त्म,
सुकून ख़त्म — तो नींदें भी ख़त्म।
सवाल ख़त्म — तो जवाब भी ख़त्म,
रिश्ता ख़त्म — तो नाते भी ख़त्म।

अब कुछ नहीं बचा कहने को,
दलील खत्म, फ़रियाद खत्म।

💫 और कितनी ज़िद करोगी… 💫

किसको झुकाना चाहती हो,
किससे जितना जताना चाहती हो?
ये कैसी जंग है तुम्हारी,
जिसमें कोई अपना संग नहीं है।

क्या पा लोगी इस सख़्ती से,
किसे और तोड़ोगी अपनी ख़ामोशी से ?
जहाँ पहले हँसी का बसेरा था,
अब सन्नाटे का डेरा है।

इस जिद का क्या मोल रहेगा,
जब साथ कोई अपना न रहेगा।
जब देखोगी आईने में तन्हा चेहरा,
तब समझोगी — ये सब था घना कोहरा ।

तुम्हारी ज़िद शायद जीत जाएगी,
पर तन्हाई की चुप्पी संग लाएगी।
जो एहसास रूह से जुड़े थे,
अब आँखों से अश्क बह रहे हैं ।

और कितनी ज़िद करोगी,
कितना और नुकसान करोगी...
ऐसे में न तुम सुकून पाओगी,
न सामने वाले को चैन दिलाओगी ।

प्यार कोई सौदा नहीं होता,
जिसका हिसाब लगाया जाए,
ये तो वो सजदा है —
जहाँ दिल नहीं, रूह झुक जाए।

तुम्हारी ज़िद ने दूर किए सारे अपने,
हर बार तोड़े भरोसे के सपने।
जो साथ थे तेरे हर मुश्किल में,
अब खामोश हैं अपनी मंज़िल में।

पर तुमने उस यक़ीन को ठुकरा दिया,
बस अपनी जिद को सच मान लिया।
और मैं चुप रहा — शायद यही सही था,
क्या हर बार तुम सही — और मैं ही ग़लत था?

एक आख़िरी बार मैं कोशिश करूँगा,
इस बार मैं तुम्हारी कुछ नहीं सुनूंगा।
खुद हार जाऊँ — वो चलेगा,
पर तुम्हारी ज़िद को अब जीतने नहीं दूँगा।