Wednesday, 31 December 2025

मैं फिर लौटूंगा

टूट गया था मैं बिल्कुल,
हिम्मत साथ छोड़ने लगी थी,
खुद को समेट भी नहीं पा रहा था,
फिर भी कहीं भीतर
बच गया मैं।

दर्द हुआ था मुझे,
ऐसा जो किसी को दिखा नहीं,
दिन चलता रहा,
रात भारी होती गई,
फिर भी
बच गया मैं।

कड़वाहट भर गई थी मुझमें,
हर बात चुभने लगी थी,
अपनों से भी दूरी बनने लगी,
उस हाल में भी
बच गया मैं।

डर गया था मैं,
अपने ही ख्यालों से,
आगे का रास्ता धुंधला था,
पीछे कुछ बचा नहीं था,
तब भी
बच गया मैं।

घबरा गया था मैं,
जब सब कुछ हाथ से फिसलने लगा,
सवाल बहुत थे,
जवाब कहीं नहीं,
उस पल में भी
बच गया मैं।

लौटने वाला था मैं,
सब छोड़कर,
खुद से हार मानकर,
पर उसी मोड़ पर
बच गया मैं।

अब मैं चलता रहूँगा,
निडर होकर,
खुद को जोड़ता रहूँगा,
दर्द को पीछे छोड़कर—
मैं लौटूँगा फिर।

Saturday, 27 December 2025

दो लफ्जों का साथ तेरा

थोड़ी थोड़ी सी ही सही,
मगर बातें तो किया करो।
ख़ामोशी बहुत भारी पड़ती है,
कभी दो लफ़्ज़ों में ही जी लिया करो।

हमेशा मुस्कान ही सच नहीं होती,
कभी उदासी भी पढ़ लिया करो।
जो कह न सकूँ लफ़्ज़ों में मैं,
उसे मेरी आँखों से समझ लिया करो।

कभी साथ चलते नहीं हो मेरे,
थोड़े कदम मेरे संग बढ़ा लिया करो।
मंज़िलें यूँ ही आसान हो जाएँगी,
थोड़ा-सा मेरा भी हाथ थाम लिया करो।

अगर कभी थक जाओ रास्तों से,
तो मुझमें थोड़ा ठहर लिया करो।
मैं हर मोड़ पर साथ रहूँगा,
बस यूँ ही मेरा यक़ीन किया करो।

मुझसे नाराज़ होना सीखो ज़रा,
पर दूर कभी मत रहा करो ।
कुछ शिकवे मुझसे कह लिया करो,
ख़ामोशी में सब छोड़ मत दिया करो।

Thursday, 25 December 2025

ख़ामोश खोज

वो आज भी अपने होने का सबब ढूंढती है,
ख़ामोश सवालों में अपना जवाब खोजती है।

जो भोर होने से पहले ही उठ जाती है,
वो अपने जीवन में उजाले की किरण खोजती है।

लगा देती है दाँव पर ज़िंदगी परिवार के लिए,
और बदले में फ़र्ज़ों की फेहरिस्त के निशान खोजती है।

सभी को ख़ुश करने में ख़ुद ही मिट जाती है,
पर वही थकान मिटने के लिए सुकून का कोना खोजती है।

घरों को चहचहा कर ज़िंदा रखने वाली,
अपने ही घर में हक़ मांगने का अधिकार खोजती है।

वो हर बार बिखरती है, फिर भी सवाल नहीं करती,
बस चुपचाप अपने होने का सबब खोजती है।

तब भी नहीं आने देती पैशानी पर सलवटें कभी,
अपनों के लिए अब भी मर-मिटने का जस्बा खोजती है।

Tuesday, 23 December 2025

"में तुम्हे चुन लूंगा"

तुम वो चुन लेना जो तुम्हें सही लगे,
और मैं तुम्हें चुन लूँगा।

तुम अगर मुस्कुराकर भी कुछ छुपा लो,
मैं तुम्हारी आँखों से सब पढ़ लूँगा।

तुम्हें ज़रूरत न पड़े कुछ कहने की,
मैं हर बात ख़ामोशी में सुन लूँगा।

तुम अगर वक़्त की धूप में झुलस जाओ,
मैं छाँव बनकर हर क़दम चलूँगा।

तुम्हारे डर अगर मुझसे भी छुपे रहें,
मैं फिर भी तुम्हारा हौसला बनूँगा।

तुम जहाँ खुद से भी सवाल करोगी,
मैं वहीं तुम्हारा यक़ीन बनूँगा।

तुम बस अपना दिल चुन लेना,
और मैं उम्र भर तुम्हें चुन लूँगा।

तेरी साँसें, मेरी कहानी

तू वो हस्ती है
जिसमें मेरी दुनिया बसती है।
तेरी मुस्कुराहट से मेरी दुनिया चलती है,
तेरी उदासी से मेरी दुनिया ढलती है।

मेरे हर कदम में तेरी आहट होती है,
तेरे होने से ही दिल में बसाहट होती है।
धड़कनें चाहे कितना भी शोर करें,
मेरी साँसें तुझ पर आकर ही थम जाती हैं।

तू साथ हो तो डर भी कम लगता है,
हर रास्ता थोड़ा अपना सा लगता है।
तू समझ लेता है बिना कुछ कहे,
इसलिए दिल तुझ पर आकर ही टिकता है।

ना ज़्यादा चाहत, ना कोई दिखावा,
बस तेरा होना ही काफ़ी है।
मेरी इस सादी सी ज़िंदगी में,
तेरी मौजूदगी ही सबसे बड़ी कहानी है।

Wednesday, 17 December 2025

मजबूरी का हौंसला

वो फिर से उठ खड़ा हो जाता है,
सुबह की नींद में बसे सपनों को तोड़कर,
निकल पड़ता है अकेला
जलती धूप में,
छाँव के लिए लड़ने का बहाना ओढ़कर।

कुछ चुभन उसे भी रोज़ होती है,
मसले हैं उसके
जो कभी खत्म नहीं होते,
फिक्र ने उसे मजबूत बनाया है
मगर
पहले उसे हर रोज़
कमज़ोर करके।

कंधों पर ज़िम्मेदारियों का बोझ है,
और जेब में
ख़ामोश तंगी,
वो थकता है—
पर रुकने की
इजाज़त उसे नहीं।

कोई नहीं पूछता
आज दर्द कितना है,
वो मुस्कुरा देता है
और अपने आँसू
अंदर ही कहीं
सुला देता है।

शाम ढलती है
तो उसका जिस्म बैठ जाता है,
पर अगली सुबह
फिर वही कहानी—
वो फिर से उठ खड़ा हो जाता है।

Thursday, 11 December 2025

✨ अगले मोड़ पर मोहब्बत ✨


अगले मोड़ पर सुकून होगा,
चल ज़िंदगी थोड़ा और चलें।
अभी रिश्तों में थोड़ी नमी है,
आगे दिलों में कोई भीगी कहानी मिले।

कदम थमा नहीं करते,
दर्द भी राहों में साथी बन चले;
हर मोड़ पर एक नया दर्द मिलता है,
क्या पता दर्द बाँटने वाला अगले मोड़ पर मिले।

कभी कोई मुस्कान राह रोक ले,
तो शायद दिल फिर से यक़ीन करना सीख ले;
टूटे मौसम भी नए रंग दिखाते हैं,
जब किसी की आँखों में अपना-सा नूर मिले।

चल, उम्मीद का हाथ थाम लें,
अधूरी चाहतें भी पूरी बन कर खिल उठें;
क्या पता अगले पते पर
किसी दिल के दरवाज़े पर हमारा नाम लिख दे।

फिर सफ़र भी क्या-ही प्यारा लगे,
जब साथ में हाथ की गर्माहट मिले;
दुनिया अपनी जगह रहे—
और हम छोटी-सी ख़ुशी में पूरी दुनिया पा लें।

Thursday, 4 December 2025

“पिताजी की याद में”

आज भी एहसास होता है,
कि एक साया हमेशा साथ चलता है,
जब भी मन कहीं उदास होता है,
आपके होने का ही आभास मिलता है।

सीख आपकी अब भी राह दिखाती है,
हर मुश्किल को आसान बनाती है,
आपकी सिखाई छोटी छोटी बातें,
आज भी जीवन में काम आती  हैं।

प्यार आपका यूँ ही धड़कनों में बसा है,
सख़्त लहज़े में छिपा अपनापन जैसा है,
कभी डाँट में, कभी मुस्कान में मिला—
वो स्नेह अब भी मेरे साथ चला।

आदर्श आपके जैसे पर्वत से अटल,
व्यक्तित्व आपका उजाला-सा निर्मल,
आपके शब्द, आपके तरीके, आपकी पहचान—
आज भी जीवन की सबसे बड़ी खदान ।

प्रेरणा आपकी हर मोड़ पर संभालती है,
गिरने से पहले ही थाम लेती है,
आपकी बातें, आपका विश्वास—
मेरे कदमों को अब भी ताक़त देती है।

आपकी कमी तो हर पल खलती है,
आपके बिना ये दुनिया अधूरी-सी लगती है,
पर आपकी छाप दिल में इतनी गहरी है—
कि लगता है आप यहीं, मेरे पास ही कहीं हैं।

आपके जाने के बाद भी पिताजी,
आप रुके हुए हैं मेरे हर काम में,
मेरे हर निर्णय में, हर साँस में,
मेरी हर जीत में… मेरी हर याद में।