कभी-कभी रस्ते नहीं,
खुद को बदलना पड़ता है।
जिस मंज़िल की तलाश में निकले थे,
उसे भी छोड़ना पड़ता है।
उम्र निकल जाती है पहुँचने की चाह में,
छोड़ना पड़ता है कितनों को ही इस राह में।
राह दर राह बदलते रहे हम,
मुकाम भी वहीं मिला,
जहाँ से चले थे हम।
कितने करीब से गुज़रे थे हम मंज़िल के,
फिर भी दूरियों का अहसास था।
शायद, मंज़िल नहीं,
सफ़र ही ज़िंदगी का सार था।
अब चलते हैं हम
बिना किसी मंज़िल की आस में,
हर कदम रखते हैं,
अपनों के साथ में।
यहाँ हर कदम पर घना कोहरा है,
उसी के बाद तो नया सवेरा है ।
हर मोड़ पे छुपी हुई एक कहानी है,
यही तो अपनी जिंदगानी है।
खुद को खुद में तलाश,
अब कहीं और न भाग।
तेरी चाही मंज़िल शायद कभी न आएगी,
बस तुझे यूं ही भटकाएगी।
मत भटक, ठहर जा अब...
सुकून इसी ठहराव में पाएगा,
नहीं तो दौड़ते-दौड़ते
अंत में समा जाएगा।
ना रहेगी मंजिल ओर
ना फिर कोई मुकाम आयेगा ।
जहां से चला था खुद को ढूंढने
अपने आप को फिर वहीं पाएगा ।।
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