Monday, 19 October 2026

रिश्ते की केमेस्ट्री

कभी तेरा एटीट्यूड, कभी मेरा ईगो,
कभी गुस्से का शो, कभी प्यार का फ्लो,
कभी छोटी-सी बात पर टेंशन और रिएक्शन,
फिर तेरी एक आवाज़ और वही पुराना कनेक्शन।

न तेरे बिन सुकून, न मेरे बिन करार है,
न दूरी बर्दाश्त, न गुस्सा स्वीकार है,
मिलना न हो तो तबीयत बिगड़ जाती है,
तेरी नाराज़गी भी मुझे तड़पाती है।

कई बार सोचा, अब तुझे नहीं मनाऊँगा,
तेरे रूठने पर मैं भी रूठ जाऊँगा,
पर तेरी उदासी देखी नहीं जाती,
हर बार अपनी ही ज़िद से हार जाता हूँ।

न जाने ये मोहब्बत है या कोई मिस्ट्री है,
न पूरी तरह दूरी, न पूरी नज़दीकी है,
तुझसे लड़ने की वजहें हज़ार सही,
पर तुझसे दूर जाने की एक भी वजह नहीं।

❤️ एक रिश्ता ❤️

एक रिश्ता बातों का, 
एक रिश्ता एहसासों का, 
एक रिश्ता बेवजह हँसने वाले ठहाकों का, 
एक रिश्ता अल्हड़पन का, नादानियों के मेल का,
एक रिश्ता बिन मौसम खिलते हुए ख़यालों का।

एक रिश्ता दोस्ती का, 
एक रिश्ता यारी का, 
एक रिश्ता रूठने की, 
एक रिश्ता मनुहारी का, 
एक रिश्ता कट्टी का, 
फिर ख़ुद ही मान जाने का,
एक रिश्ता छोटी-छोटी बातों पर मुस्कुराने का।

एक रिश्ता फ़िक्र का, 
एक रिश्ता बेचैनी का, 
एक रिश्ता राह तकने की, 
एक रिश्ता उदासी का, 
एक रिश्ता दूर भागने का, फिर लौटकर आने का, 
एक रिश्ता बिन कहे ही सब कुछ समझ जाने का।

एक रिश्ता चाहत का, 
एक रिश्ता राहत का, 
एक रिश्ता आदत का, 
एक रिश्ता इबादत का, 
एक रिश्ता आँखों का, 
एक रिश्ता निगाहों का, 
एक रिश्ता दिल में पलते अनकहे जज़्बातों का।

एक रिश्ता लड़ने का, 
एक रिश्ता मनाने का, 
एक रिश्ता हक़ जताकर फिर ख़ुद ही झुक जाने का, 
एक रिश्ता सम्मान का, 
मर्यादा निभाने का, 
एक रिश्ता अपनी ज़िद में भी अपनों को बचाने का।

एक रिश्ता मुलाक़ात का,
एक रिश्ता दूरी का, 
एक रिश्ता अधूरी बात का,
एक रिश्ता मजबूरी का, 
एक रिश्ता पास रहकर भी फ़ासले मिटाने का, 
एक रिश्ता दूर रहकर भी दिल के पास आने का।

एक रिश्ता आँखों का, 
जो बिन बोले कह जाए, 
एक रिश्ता ख़ामोशी का, 
जो दिल तक उतर जाए, 
एक रिश्ता हँसी का, 
जो हर ग़म भुला दे, 
एक रिश्ता आँसू का, जो दिल का बोझ घटा दे।

एक रिश्ता सुबह का, 
एक रिश्ता शाम का, 
एक रिश्ता मेरे नाम का, 
एक रिश्ता तेरे नाम का, 
एक रिश्ता मिलने की ख़ुशी, बिछड़ने के मलाल का, 
एक रिश्ता हर हाल में एक-दूजे के ख़याल का।

एक रिश्ता आदतों का, 
जिन्हें बदलना मुश्किल है, एक रिश्ता चाहतों का, 
जिन्हें समझना मुश्किल है,
एक रिश्ता उलझनों का, 
फिर भी सुलझ जाने का, 
एक रिश्ता लाख रूठकर भी न बिखर जाने का।

न ये सिर्फ़ दोस्ती का, 
न मोहब्बत का नाम है, 
न ये कोई साधारण-सा, 
बस रिश्ता आम है, 
कभी चाहत, 
कभी राहत, 
कभी दिल का सुकून है, 
एक रिश्ता ऐसा अपना, 
जो हर रिश्ते से ख़ास है। ❤️

— हेमंत शर्मा

❤️ ये दिल क्या चाहे… ❤️

बस थोड़ा-सा अटेंशन,
थोड़ा-सा कनेक्शन,
रिश्तों में हो परफेक्शन,
और थोड़ा इमोशन… ❤️

भावनाओं का कोई ज़ोर नहीं,
बेबसी का शोर नहीं,
उलझनें हज़ार हों मन में,
पर क्लियर हो स्टेटमेंट…

थोड़ी-सी बात,
थोड़ा-सा साथ,
बिन कहे समझ ले कोई,
दिल की हर एक बात…

न कोई बड़ी डिमांड,
न कोई मुश्किल कमिटमेंट,
बस रिश्तों में बना रहे,
प्यार और अंडरस्टैंडिंग का एसेंस…

न महँगे तोहफ़े,
न कसमें हज़ार,
बस महसूस हो,
कि कोई करता है प्यार…

ये दिल क्या चाहे…
बस इतनी-सी रिक्वायरमेंट,
रिश्तों में प्यार हो,
और थोड़ा-सा इमोशनल अटैचमेंट… ❤️

मिलने का समय मिलता रहे,
साथ दोनों का चलता रहे,
खुशियों से भरपूर हों पल,
पर खुद का भी थोड़ा इन्वेस्टमेंट…

न रिश्तों में घुटन रहे,
न ख़्वाहिशों का दमन,
एक-दूजे के साथ भी सुकून,
और खुद से भी हो अपनापन…

बस इतना-सा अरमान है,
रिश्तों में प्यार और सम्मान रहे,
तुम्हारी दुनिया में हम भी रहें,
और हमारी अपनी पहचान रहे… ❤️✨

Thursday, 8 October 2026

जा छोड़ा साथ तुम्हारा

जा, छोड़ा साथ तुम्हारा,
तुम भी क्या याद रखोगे,
जा, छोड़ा तेरा एहसास,
जा, छोड़ा तेरा विश्वास।

जा, छोड़ी वो मीठी बातें,
जा, छोड़ी वो सारी रातें,
जा, छोड़े वो ख़्वाब तुम्हारे,
जा, छोड़े वो वादे सारे।

जा, छोड़ी तेरी वो चाहत,
जा, छोड़ी दिल की राहत,
जा, छोड़ी तेरी हर आस,
जा, छोड़ी मिलने की प्यास।

जा, छोड़ी तेरी परछाईं,
जा, छोड़ी अपनी तन्हाई,
जा, छोड़ी वो कसक पुरानी,
जा, छोड़ी अपनी कहानी।

जा, छोड़ा सुकून वो मेरा,
जा, छोड़ा वो जुनून मेरा,
जा, छोड़ा जो अब तक पकड़ा था,
जा, छोड़ा जो दिल ने जकड़ा था।

जा, छोड़ी तेरी वो यादें,
जा, छोड़ी दिल की फरियादें,
जा, छोड़ी हर वो आस तुम्हारी,
जा, छोड़ी अपनी दुनिया सारी।

जा, छोड़ा साथ तुम्हारा,
तुम भी क्या याद रखोगे…
हमने तो सब कुछ छोड़ दिया,
तुम क्या अपना कुछ याद रखोगे?

Wednesday, 7 October 2026

मोती और संगत


कभी माला के लिए मोती चुने जाते हैं,
कभी मोती भी अपना हार चुनते हैं।
हर मोती की अपनी एक चमक होती है,
फिर भी अच्छे साथ की तलाश करते हैं।

उसे कहाँ अभिमान अकेले चमकने का,
वो तो बस उजले साथ का ख़्वाब रखता है,
जानता है—एक मोती अनमोल सही,
पर हार में सजकर ही अपना रूप दिखाता है।

मोती चाहे कितना भी सुंदर हो,
गलत धागे में बिखर सकता है,
और सही हाथों की एक माला में,
वही मोती सबसे प्यारा लग सकता है।

कुछ संगतें धूल-सी होती हैं,
जो चमक को भी धुंधला कर देती हैं,
कुछ संगतें चाँदनी जैसी होती हैं,
जो अँधेरे में भी राह दिखा देती हैं।

कभी हम किसी को चुनते हैं,
कभी कोई हमें चुनने आता है,
कभी हम किसी के हार का मोती,
कभी कोई हमारा हार बन जाता है।

मोती की कीमत उसकी चमक में नहीं,
किस हार में सजा है—इसमें भी होती है,
इंसान कितना ही काबिल क्यों न हो,
उसकी असली चमक उसकी संगत से होती है।

Friday, 2 October 2026

कुदरत को समझना है



पहाड़ों का गहरा मौन,
नदियों का कलकल शोर समझना है।
इन वादियों की खामोशी में,
कुछ अनकहे से बोल समझना है।

सुबह की पहली भोर,
सांझ को पक्षियों का शोर समझना है।
ओस की बूंदों में छुपी खुशी,
हवा का मस्त झकोर समझना है।

इस नीले गगन की असीम ऊँचाई,
तो इस खाई की गहराई समझना है।
बादलों की आवारगी में,
बारिश की सच्ची रुसवाई समझना है।

उगते सूरज की सुर्ख लालिमा,
डूबते सूरज की बासंती परछाई समझना है।
हर ढलती शाम के पीछे,
एक नई सुबह की अंगड़ाई समझना है।

फूलों की महक, तितलियों के रंग,
भौंरों की मधुर तरंग समझना है।
पेड़ों की छाँव में ठहरी राहत,
माटी का अपना उमंग समझना है।

जिंदगी ने जो दिया है हमें,
उसका हर एक हिसाब समझना है।
कुदरत की इस खुली किताब में,
बस जीना नहीं—जीवन का अर्थ समझना है।

इसे लोकभाषा में कन्वर्ट करें ।

जहां से चला था


गाँवों से शहर पहुँचने की,
कल तक गाँव छोड़कर भागे थे,
जल्दी थी शहर में बसने की।

पीछे छूट गया था आँगन,
तुलसी चौरा, कच्ची दीवारें,
दादी की वो धीमी लोरी,
माँ की आवाज़ें प्यारी-प्यारी।

वो कुएँ की ठंडी छाया,
वो पीपल के नीचे चौपाल,
गोधूलि में लौटते मवेशी,
और धूल भरी वो पगडंडी बेहाल।

बरसात में कागज़ की नावें,
सर्दी में अलाव का साथ,
गर्मियों की वो छत पर नींदें,
तारों से होती अपनी बात।

खेतों में पकती गेहूँ की बालें,
सरसों का पीला-पीला रंग,
बैलगाड़ी की धीमी चाल में
बसता था अपना सारा संसार।

त्योहारों पर घर भर जाता,
दूर के अपने पास आते थे,
थोड़े साधन, बड़े दिल लेकर
हम मिलकर खुशियाँ मनाते थे।

फिर शहर ने बाँहें फैलायीं,
हम भी सपनों संग चल दिए,
रोटी, रिश्ते, नींद—न जाने
कितने मौसम वहीं ढल दिए।

अब थककर जब लौट रहे हैं,
तो समझ में आया यह राज़—
शहर ने जीवन तो दे डाला,
गाँव ने दिया था जीने का अंदाज़।

जिस आँगन को छोटा समझकर
हम दुनिया देखने निकल गए,
आज उसी की मुट्ठी भर मिट्टी को
आँखों से लगाकर लौट रहे।

देखो, जीवन कितना गोल है—
जहाँ से चला, वहीं आ रहा,
जिसे पीछे छोड़ गया था इंसान,
आज वही उसे अपना बुला रहा।

शायद लौटना पीछे जाना नहीं,
अपनी जड़ों को फिर से पहचानना है।
इंसान चाहे जहाँ तक पहुँच जाए,
अंततः उसे अपने गाँव में ही
अपना बचपन मिलना है।

Thursday, 1 October 2026

कुदरत के रंग

सुर्ख सुबह, चंपई दुपहरी, मोरपंखिया शाम,
केसर सा रंग भरे बदरवा, हुए बेईमान।

हरि की हरियाली ने मोह लिया मनवा,
कुदरत के रंग भरे, नाच रही तितरिया।

फूलों की खुशबू लेकर, बहकी-बहकी बयार,
डाली-डाली झूम उठी, जैसे सजी बहार।

कोयल की मीठी बोली, मन में घोले प्यार,
पत्तों की सरसराहट में, छुपा कोई इकरार।

नदिया की कल-कल धुन में, गूँजे कोई तान,
माटी की सौंधी खुशबू, कर दे मन बलिहान।

साँझ ढले जब पंछी लौटें, लेकर अपना गाँव,
कुदरत की इस गोद में, मिल जाए मन को ठाँव।

दिल की एक बात

दिल में एक बात है,
कह दो तो बता दूँ तुमको।

भौंरे कैसे गुनगुनाते हैं,
ये गा कर सुना दूँ तुमको।

तितलियों में रंग कैसे आते हैं,
ये रंग भी दिखा दूँ तुमको।

फूलों में खुशबू कैसे बसती है,
वो राज़ भी बता दूँ तुमको।

रात काली क्यों होती है,
कहों तो आँखें बंद करके बता दूं ।

सूरज क्यों चमकता है,
कहो तो रोशनी कर के दिखा दूं ।

चाँदनी रातें क्यों इतनी हसीं हैं,
बैठकर समझा दूँ तुमको।

मोहब्बत आखिर होती कैसी है,
आँखों से पढ़ा दूँ तुमको।

दिल में जो बरसों से छुपा रखा है,
कहो तो आज बता दूँ तुमको।


Thursday, 24 September 2026

मेरे मैं का विसर्जन

आज मैंने मेरे ‘मैं’ का विसर्जन कर लिया,
कुछ यादों और अनुभवों का सृजन कर लिया।

कुछ आदतों, कुछ लोगों का तर्पण कर लिया,
कुछ शब्दों और रिश्तों का विसर्जन कर लिया।

जो मेरा था ही नहीं, उसका त्याग कर लिया,
जो मेरा अपना था, उसका वरण कर लिया।

कर रखा था कई जगह मैंने अपना समर्पण,
आज सबसे अपना थोड़ा-सा आहरण कर लिया।

बहुत खो चुका था खुद को औरों को निभाते हुए,
आज अपने अस्तित्व का पुनः सृजन कर लिया।

न कोई शिकायत रखी, न कोई अपेक्षा रखी,
आज अपने मन का स्वयं ही शुद्धिकरण कर लिया।

अब किसी की स्वीकृति की चाह नहीं रही,
अपने होने को ही अपना प्रमाण कर लिया।

जो बीत गया, उसे बीते कल में छोड़ दिया,
आज अपने आने वाले कल का वरण कर लिया।

आज मैंने मेरे ‘मैं’ का विसर्जन कर लिया,
और उसी विसर्जन में अपना पुनर्जन्म कर लिया।

Friday, 18 September 2026

मैं तुम्हें फिर मिलूँगा

मैं तुम्हें फिर मिलूँगा,
किसी शाम की तन्हाई में,
जब तुम चुपचाप बैठी होगी,
अपने ही सवालों की गहराई में।

मैं तुम्हें फिर मिलूँगा,
किसी पुराने ख़त के लफ़्ज़ों में,
जहाँ कुछ बातें अधूरी होंगी,
और कुछ आँसू होंगे ख़ामोशियों में।

मैं तुम्हें फिर मिलूँगा,
किसी अनजान-सी राह पर,
शायद तुम पहचान न पाओ,
पर मैं ठहर जाऊँगा तुम्हारी आहट पर।

मैं तुम्हें फिर मिलूँगा,
न कोई शिकायत होगी, न सवाल,
बस एक मुस्कान होगी चेहरे पर,
और आँखों में वही पुराना ख़याल।

मैं तुम्हें फिर मिलूँगा,
जब उम्र बहुत आगे निकल जाएगी,
जब ज़िंदगी सारी थक जाएगी,
और यादें ही पास रह जाएँगी।

मैं तुम्हें फिर मिलूँगा…
मगर इस बार कोई हक़ नहीं माँगूँगा,
बस दूर से तुम्हें देखकर,
चुपचाप मुस्कुरा दूँगा।

क्योंकि कुछ रिश्ते
मिलने के लिए नहीं होते…
बस उम्रभर महसूस करने के लिए होते हैं।

बस एक एहसास

ना तुम मेरे हो,
ना मेरे साथ हो,
ना तुम पर मेरा हक़ है,
फिर भी क्यों इतने ख़ास हो।

ना जज़्बातों का मेला है,
ना ख़्वाहिशों का रेला है,
ना इस दिल में तुम हो,
फिर भी दिल में झमेला है।

ना तुमसे कोई वादा है,
ना तुमसे कोई शिकायत है,
फिर भी तेरी ख़ामोशी से,
मेरे मन में एक पश्चाताप है।

ना तुम्हें पाने की चाहत है,
ना तुम्हें रोकने की ताक़त है,
फिर भी तेरे दूर जाने पर,
दिल को जाने क्यों आफ़त है।

ना तुम मेरी आदत हो,
ना मेरी कोई ज़रूरत हो,
फिर क्यों हर ख़ाली पल में,
तुम मेरी सबसे बड़ी कमी हो।

मैंने कभी तुमसे माँगा क्या,
बस थोड़ा-सा अपनापन था,
तुमने वो भी दे दिया होता,
तो शायद दर्द इतना कम था।

तुम्हें खोने का डर कैसा,
जब तुम कभी मेरे थे ही नहीं,
फिर भी ये दिल रोता है,
जैसे तुमसे ज़्यादा कोई था ही नहीं।

ना शिकायत कर सकता हूँ,
ना तुमसे सवाल कर सकता हूँ,
जिस रिश्ते पर हक़ ही नहीं,
उसका दर्द किससे बयां कर सकता हूँ।

कभी-कभी लगता है तुमसे,
दूर रहना ही बेहतर है,
फिर दिल कहता है—
तेरी यादों के बिना भी कौन-सा सवेरा है।

तुम मेरे नहीं हो,
ये सच मैं रोज़ समझता हूँ,
मगर दिल को कौन समझाए—
मैं तुम्हें आज भी अपना ही समझता हूँ।

शायद यही मेरी ख़ता है,
या दिल की कोई मजबूरी है,
तुमसे कोई रिश्ता नहीं मेरा,
फिर भी तुमसे दूरी अधूरी है।

ना तुम मेरे हो,
ना मेरे साथ हो,
ना तुम पर मेरा हक़ है,
बस एक एहसास हो…

जिसे अपना कह नहीं सकता,
जिसे भूल भी नहीं सकता,
जिससे कोई शिकायत नहीं,
फिर भी जिसके बिना
मैं रह भी नहीं सकता।

Tuesday, 8 September 2026

मुझे तुम पूरे नहीं चाहिए

मुझे तुम पूरे नहीं चाहिए,
मुझे तुम पूरी ज़िंदगी चाहिए—
टुकड़ों में, किस्तों में,
धीरे-धीरे पुराने होते हुए।

वो जवानी में लिए कर्ज़ की पहली किश्त,
और बुढ़ापे में चुकाई आख़िरी किश्त तक।
वो पहली किराने की लिस्ट,
जिसमें घर बसाने के सपने थे,
और वो आख़िरी लिस्ट,
जिसमें बस ज़रूरत भर का सामान हो।

नए घर की पहली चाबी से,
दरवाज़े पर जमी आख़िरी जंग तक।
नए बर्तनों की चमक से,
उन पर जमी बरसों पुरानी धूल तक।
आँगन में लगाए पहले बीज से,
उसी वृक्ष के आख़िरी फल तक।

बच्चों की पहली किलकारी से,
घर में उतरती आख़िरी ख़ामोशी तक।
तुम्हारे काले बालों की पहली लट से,
उनमें उतरी आख़िरी चाँदी तक।

मुझे तुम्हारी खूबसूरत जवानी नहीं,
मुझे अब उम्रदराज समझदारी चाहिए ।
परियों की किस्से नहीं,
अब बची साँसों के हिस्से चाहिए ।

मुझे तुम पूरे नहीं चाहिए,
मुझे तुम शुरुआत से नहीं…
मुझे चाहिए तुम्हारे आख़िरी पल,
जहाँ ‘तुम’ और ‘मैं’ खत्म,
बस बाकी रह जाएं हम ।

Tuesday, 1 September 2026

मन के अच्छे लोग

कुछ लोग आज भी समझ नहीं पाते,
वो मन के अच्छे लोगों को नहीं अपनाते।
चेहरे की चमक में उलझे रहते हैं,
दिल की सच्चाई को कहाँ पहचान पाते हैं।

जो बिना मतलब साथ निभाते हैं,
वो ही अक्सर दूर कर दिए जाते हैं,
और जो मतलब से पास आते हैं,
उन्हीं को अपना समझ बैठते हैं।

अच्छे लोग शोर नहीं करते,
बस खामोशी से रिश्ते निभाते हैं,
जब तक साथ रहते हैं कदर नहीं होती,
दूर चले जाएँ तो बहुत याद आते हैं।

कुछ लोग आज भी समझ नहीं पाते,
वो मन के अच्छे लोगों को नहीं अपनाते,
फिर उम्र भर तलाशते रहते हैं उन्हें,
जो कभी उनके पास थे… मगर वो पहचान नहीं पाते।

मुझे छेड़ने का मजा

मुझे छेड़कर तुम्हें मज़ा आता है,
मगर तुम्हारा ये अंदाज़ हमें रुलाता है।
तुम तो हँसकर गुज़र जाते हो उस पल से,
पर वो पल हमारे दिल में ठहर जाता है।

हमें भी तो हसरत है दो पल तुम्हारे साथ की,
कुछ अनकही बातों की, कुछ मीठी मुलाक़ात की।
तुम्हें लगता है हम भी हँसकर भूल जाएंगे,
पर हमें आदत है हर बात दिल से लगाने की।

तुम जानकर भी क्यों दिल को यूँ सताते हो,
कभी पास बुलाते हो, कभी दूर चले जाते हो।
तुम्हारी ये अदा शायद तुम्हें बहुत प्यारी है,
मगर हम इससे हर बार थोड़ा टूट जाते हैं।

शरारत करो, मगर दिल से खेला न करो,
हमें यूँ चाहत में उलझाकर छोड़ा न करो।
तुम्हें हँसी आती है हमारी घबराहट देखकर,
हमारी धड़कनों को यूँ तमाशा बनाया न करो।

बस इतना समझ लो—तुम्हारी हर बात असर करती है,
तुम्हारी बेरुख़ी भी रातों तक सफ़र करती है।
इसलिए तुम्हारा ये अंदाज़ अब अच्छा नहीं लगता,
तुम्हारी छेड़छाड़ से ज़्यादा, तुम्हारी ख़ामोशी डराती है।

मैं सबका हो गया…

मैं सबका हो गया,
पर मेरा कोई न हो पाया,
दर्द को छुपाते-छुपाते,
अपनी खुशी भी बाँट आया।

हर रिश्ते को दिल से सींचा,
हर रिश्ते को अपना माना,
किसी की आँखों में आँसू देखे,
तो अपना दर्द भी भूल जाना।

किसी की ख़ामोशी पढ़ ली मैंने,
किसी की धड़कन समझ आया,
सबके ज़ख्मों पर मरहम रखा,
पर अपना ज़ख्म छुपाया।

सारी भीड़ मेरी जानी-पहचानी,
हर चेहरा अपना सा पाया,
सबके बीच हँसता रहा मगर,
लौटकर खुद को तन्हा पाया।

जिनके लिए खुद को खोता रहा,
उनसे ही दूर होता गया,
जिन्हें अपना कहकर उम्र दी,
उनका भी दिल दुखाता गया।

मुझे लगा कि सब ही गलत हैं,
सबने मुझे समझा नहीं,
फिर जब खुद से आँख मिलाई,
तो कोई पर्दा बचा नहीं।

गलतियों का पहाड़ खड़ा था,
मेरे ही कदमों के सामने,
जिन्हें दोषी कहता था मैं,
मैं भी था उन इल्ज़ामों में।

किसी को वक्त नहीं दे पाया,
किसी का मन नहीं पढ़ पाया,
कभी अपनी ज़िद को सच समझा,
कभी अहंकार को प्रेम बताया।

किसी के आँसू देखे तो भी,
उनका कारण समझ न पाया,
अपनी बात मनवाने की धुन में,
कितने अपने का दिल दुखाया।

आज पुरानी यादें आती हैं,
तो आँखें नम हो जाती हैं,
जो बातें तब छोटी लगती थीं,
वो अब सीने में चुभ जाती हैं।

कुछ रिश्ते मेरी भूलों से टूटे,
कुछ मेरी ख़ामोशी से रूठे,
कुछ मेरे शब्दों से घायल हुए,
कुछ मेरे लौटने तक छूटे।

विरह की ये रातें पूछती हैं,
क्यों इतना देर से समझ आया?
जिसे अपना समझकर खो दिया,
उसे अपना क्यों न रख पाया?

अब किससे जाकर माफ़ी माँगूँ,
किसके आगे सिर झुकाऊँ,
जो लौटकर आना ही नहीं चाहते,
उनको कैसे फिर से बुलाऊँ?

ना कोई शिकवा बचा अब,
ना कोई इल्ज़ाम रहा,
दूसरों को गलत कहने वाला,
आज खुद ही कटघरे में खड़ा।

मैं सबका होकर भी तन्हा था,
ये सच अब समझ में आया,
सबको अपना कहते-कहते,
खुद से ही रिश्ता टूटता पाया।

काश समय फिर लौट के आता,
कुछ पल फिर से मिल जाते,
जिन दिलों को मेरी वजह से ठेस लगी,
उन पर हाथ रखकर कह पाता—

“मुझसे भी गलतियाँ हुई थीं,
मैं हर बात में सही नहीं था,
तुम्हें खोना मेरी नियति नहीं,
मेरी अपनी भूलों का नतीजा था।”

अब जो बचा है जीवन में,
उसे शिकायत में नहीं गँवाना,
जिनसे प्रेम रहा दिल में,
उनको दिल से ही निभाना।

क्योंकि उम्र ने आखिर सिखलाया,
रिश्ते जीतने से नहीं बचते,
कभी झुकना भी पड़ता है,
कभी अपने भी दोष समझते।

मैं सबका हो गया उम्रभर,
पर मेरा कोई न हो पाया,
शायद कमी दुनिया में नहीं थी—
मैंने ही खुद को बहुत देर से समझ पाया।

दर्द को छुपाते-छुपाते,
अपनी खुशी भी बाँट आया,
सारी भीड़ मेरी अपनी थी,
फिर भी खुद को अकेला पाया।

आज बस इतना कह पाता हूँ—
पूरी उम्र गलतियाँ करता रहा,
बस मानने में पूरी उम्र लग गई…
सबको अपना समझता रहा,
पर खुद को समझने में उम्र लग गई।

वो चाहती भी है मुझे…

वो चाहती भी है मुझे,
और दूर भी नहीं रह पाती है,
कभी करीब आकर सुकून पाती है,
कभी खुद ही फासले बना जाती है।

खुद को खुद से रोकती है,
फिर खुद ही लौटकर आती है,
कहती है— “कोई फर्क नहीं पड़ता,”
फिर मेरी खामोशी में घबराती है।

मुझे अपना कहती नहीं,
किसी और का होने देती नहीं,
अजीब सी कशमकश है उसके दिल में,
मुझसे दूर भी जाती नहीं।

लापरवाह बनने का अभिनय करती है,
मगर मेरी हर बात पर ठहर जाती है,
चेहरे पर चाहे बेरुखी रखे,
आँखों से फिर भी परवाह जताती है।

शायद डरती है मुझसे मोहब्बत करने से,
शायद खुद से ही कुछ छुपाती है,
इसीलिए पास आकर सिमटती है,
और पास आते ही दूरियाँ बढ़ाती है।

मैं भी समझता हूँ उसकी मजबूरी,
उसकी उलझन को नाम नहीं देता,
बस इतना जानता हूँ—
वो मुझे छोड़ना चाहती भी है,
और छोड़ भी नहीं पाती है।

वो चाहे जितना खुद को मुझसे दूर करे,
दिल फिर उसे मेरे पास ले आता है,
कुछ रिश्ते खत्म नहीं होते कभी…
बस उन्हें निभाने का तरीका बदल जाता है।

शायद हमारा रिश्ता भी अजीब सा है,
जिसे कोई नाम दिया नहीं जाता,
वो मुझे खोना भी नहीं चाहती,
और पूरी तरह अपना भी नहीं पाती।

वो चाहे जितना खुद को मुझसे दूर करे,
दिल फिर उसे मेरे पास ले आता है,
कुछ रिश्ते खत्म नहीं होते कभी…
बस उन्हें निभाने का तरीका बदल जाता है।

Sunday, 21 June 2026

हैप्पी फादर्स डे

जब पिता रोता है,
तब बच्चों की आँखों में सपने पलते हैं।

जब पिता अपनी इच्छाएँ मारता है,
तब बच्चों की ख्वाहिशें पूरी हो पाती हैं।

जब पिता दिन-रात मेहनत करता है,
तब बच्चों को सुकून का जीवन मिल पाता है।

जब पिता जिम्मेदारियों का बोझ उठाता है,
तब बच्चों के कंधे हल्के रह पाते हैं।

जब पिता रातों को चिंता में जागता है,
तब बच्चे बेफ़िक्र होकर सो पाते हैं।

जब पिता अपने दर्द छुपाता है,
तब बच्चों के चेहरों पर मुस्कान बनी रहती है।

जब पिता अपनी खुशियाँ कुर्बान करता है,
तब बच्चों की खुशियाँ त्योहार बन जाती हैं।

जब पिता धूप में जलता है,
तब बच्चों को छाँव नसीब होती है।

जब पिता फटे जूतों में सफ़र करता है,
तब बच्चों के कदम मंज़िल तक पहुँच पाते हैं।

जब पिता झोपड़ी में गुज़ारा करता है,
तब बच्चे पक्के मकानों के सपने जी पाते हैं।

जब पिता अपनी पूरी उम्र खपा देता है,
तब बच्चों का भविष्य संवर पाता है।

जब पिता चुपचाप दुख सहता जाता है,
तब परिवार हँसता-मुस्कुराता नज़र आता है।

पिता का जीवन बड़ा अजीब होता है,
पर हर बच्चा खुशनसीब होता है,
जिसके सिर पर पिता का साया होता है।

जो पिता पूरे परिवार का सहारा होता है,
अक्सर अंत में वही सबसे ज़्यादा हारा हुआ होता है।

🙏 हैप्पी फादर्स डे 💐

Tuesday, 9 June 2026

प्यार में अभिव्यक्ति ज़रूरी होती है

जैसे जीवन को साँसों का आधार होता है,
कोपलों को बारिश का इंतज़ार होता है,
वैसे ही हर रिश्ते का अपना श्रृंगार होता है,
और प्यार में इज़हार ज़रूरी होता है।

जैसे सूरज की पहचान उसकी रोशनी होती है,
चंदा की सुंदरता उसकी चाँदनी होती है,
भावनाओं की भी अपनी एक कहानी होती है,
और प्यार को अभिव्यक्ति ज़रूरी होती है।

चेहरे पर नूर का होना अच्छा लगता है,
होंठों को शब्दों का मिलना सच्चा लगता है,
दिल का हर भाव तभी पूरा लगता है,
जब प्रेम को बयां करना ज़रूरी होता है।

जैसे बारिश का सफ़र सागर तक पूरा होता है,
सागर का अस्तित्व नदियों से गहरा होता है,
हर भावना का कोई न कोई किनारा होता है,
वैसे ही प्यार को शब्दों का सहारा ज़रूरी होता है।

कभी भावनाएँ नहीं, शब्द ज़रूरी होते हैं,
उन्हीं से एहसास और गहरे होते हैं,
रिश्तों के बंधन और सुनहरे होते हैं,
जब प्रेम में मीठे बोल ज़रूरी होते हैं।

दिल में प्रेम छिपाकर रखना भी मोहब्बत है,
पर उसे जताना भी तो इबादत है,
यही रिश्तों की सबसे सुंदर आदत है,
कि प्यार को स्वर देना ज़रूरी होता है।

अनकहे जज़्बात भी अनमोल होते हैं,
पर कहे हुए शब्द दिल के और क़रीब होते हैं,
मोहब्बत के फूल तभी पूरी तरह खिलते हैं,
जब प्यार में एहसास कराना ज़रूरी होता है। 

— हेमंत शर्मा ✍🏻✍🏻

अब उसी से मेरा पता पूछ रहा हूँ

अब मैं परेशान होने लगा हूँ,
खुद पर से कंट्रोल खोने लगा हूँ।
कभी देखे थे बड़े सपने मैंने भी,
उन्हें हालातों के हवाले करने लगा हूँ।

मुझे लगा मैं परिपक्व हो गया अब,
पर और ज़्यादा समझाने लगे लोग।
हर किसी के ज्ञान के आगे,
अपने आप को अज्ञानी समझने लगा हूँ।

कभी जिन फैसलों पर गर्व था मुझे,
अब उन्हीं पर सवाल करने लगा हूँ।
जो राह सही लगती थी कल तक,
आज उसी से डरने लगा हूँ।

सबको खुश रखने की कोशिश में,
अपनी ही ख़ुशी भुलाने लगा हूँ।
दुनिया की आवाज़ सुनते-सुनते,
अपने दिल को चुप कराने लगा हूँ।

सब मुझे तो सहारा समझने लगे हैं,
मुझे पकड़ आगे बढ़ने में लगे हैं।
सबको आगे पहुँचाने की दौड़ में,
अब मैं खुद पिछड़ने लगा हूँ।

तजुर्बा तो खूब कमा लिया,
पर बचा वक़्त अपना घटा लिया।
अब लगे हैं हाथों में चने,
पर खाने को टूटते दाँत बचा रहा हूँ।

जिन रिश्तों को सींचा बरसों तक,
उनमें अपना हिस्सा कम पाता हूँ।
सबकी ज़रूरत बनते-बनते,
मैं खुद को ही भूलने लगा हूँ।

उम्र ने समझ तो बहुत दी है,
पर कुछ मासूमियत छीन ली है।
जीतने की चाह में दौड़-दौड़ कर,
अपने सफ़र की राह भूलने लगा हूँ।

अब आईने से नज़र मिलती है तो,
एक अजनबी सा चेहरा दिखता है।
जिसे बनाने में उम्र गुज़ार दी,
अब उसी से मेरा पता पूछ रहा हूँ।

— हेमंत शर्मा ✍🏻✍🏻

Friday, 29 May 2026

हालात, दर्द ओर जिंदगी की जंग

बहुत लड़ना पड़ता है हालातों से,
खुद को खड़ा रखने के लिए…
साँसें भी यूँ ही नहीं चलती,
दिल को कई बार धड़कना पड़ता है…

कई फैसले गलत साबित होते हैं,
तो कई फैसलों को स्वीकार करना पड़ता है…
मुश्किलें भी आसानी से हल नहीं होतीं,
कभी वक़्त को, तो कभी खुद को बदलना पड़ता है…

हर चाहत मुकम्मल हो ये ज़रूरी तो नहीं,
कुछ ख़्वाबों को अधूरा छोड़ना पड़ता है…
ज़िंदगी सिर्फ़ खुशियों का सफ़र नहीं होती,
यहाँ दर्द के साथ भी मुस्कुराना पड़ता है…

कभी अपने भी समझ नहीं पाते,
और कभी गैरों में सहारा मिल जाता है…
जो भीतर से टूट चुका होता है,
अक्सर वही सबसे ज्यादा संभलना सिखा जाता है…

ये ज़िंदगी हर रोज़ इम्तिहान लेती है,
और हर इम्तिहान कुछ नया सिखा जाता है…
जो दर्द को भी ताक़त बना ले,
वही इंसान वक़्त से आगे निकल जाता है…

इतने सारे दर्द भरे पड़े हैं दिल में,
एक को खत्म करने के लिए नया दर्द जगाना पड़ता है…
मुसीबतें खत्म ही नहीं होती ज़िंदगी से,
हर रोज़ खुद को फिर से समझाना पड़ता है…

कभी अपनों की बातें चुभ जाती हैं,
तो कभी ख़ामोशियाँ रुला जाती हैं…
जो चेहरे हँसते हुए दिखते हैं बाहर से,
अक्सर अंदर से वही सबसे ज्यादा टूटे होते हैं…

ज़िंदगी शायद आसान किसी के लिए नहीं होती,
हर किसी को अपने हिस्से का दर्द उठाना पड़ता है…
और कई बार जीने के लिए भी,
खुद से ही लड़ते चले जाना पड़ता है…

थक कर बैठ जाने का मन भी करता है,
मगर जिम्मेदारियाँ सोने कहाँ देती हैं…
कुछ रिश्ते अंदर ही अंदर मर जाते हैं,
पर उनकी यादें रोने कहाँ देती हैं…

वक़्त धीरे-धीरे सब बदल देता है,
इंसान की चाहतें, आदतें, और भरोसे भी…
जो कल तक जान हुआ करते थे,
आज वही अजनबी से लगते हैं कभी-कभी…

फिर भी ना जाने क्यों उम्मीद बची रहती है,
कि शायद एक दिन सब ठीक हो जाएगा…
ये दिल लाख टूट जाए मगर,
फिर भी किसी अपने का इंतज़ार करता रह जाएगा…

Thursday, 28 May 2026

हालात बदलते हैं… लोग नहीं बदलने चाहिए

कभी कभी बहुत मन भर आता है,
किसी अपने से बात करने का खयाल आता है…
फिर बहुत देर तक खुद से लड़कर,
काँपते हाथों से वही नंबर मिलाया जाता है…

सोचते हैं शायद इस बार
कुछ अपनापन सुनने को मिल जाएगा,
जो बरसों साथ चलने का दावा था,
उसमें से थोड़ा सा साथ मिल जाएगा…

पर बातों बातों में फिर समझ आता है,
मुझे ही हर बार आज़माया जाता है…
इतनी लंबी मोहब्बत का,
जुर्माना बस मुझपे लगाया जाता है…

मन तो हल्का होता नहीं,
दिल फिर से भारी हो जाता है…
जिसे अपना घर समझकर उम्र दे दी,
उसी के सामने खुद को पराया पाया जाता है…

उन्हें लगता है वो मेरा घर बर्बाद कर रहे हैं,
पर ये खयाल उन्हें बरसों पहले नहीं आता है…
अब तो सारी हदों की सरहदें टूट गई हैं,
समझ जाओ जन्म-जन्मान्तर तक का नाता है…

जब मैं रिश्तों को जोड़ने में लगा था,
तब तुम्हें हालातों का ख्याल नहीं आया…

मैंने हर टूटती चीज़ को संभाला,
हर रिश्ते को सीने से लगाया…
अपने हिस्से की नींदें बेचकर भी,
तुम्हारे हर सपने को अपना बनाया…

मैंने तो हर रिश्ते में खुद को ढाला है,
अपने आप को तुम्हारे जैसा बनाया है…

कभी कभी उनके लिए भी जीना चाहिए,
जो आज भी तुमपे मरते हैं…
तुम्हें ही अपना समझते हैं,
और तुमसे ही बेइंतहा प्यार करते हैं…

जो तुम्हारी खामोशी में भी
तुम्हारा दर्द पढ़ लिया करते हैं,
जो अपने हिस्से की खुशियाँ छोड़कर
सिर्फ तुम्हारे लिए जिया करते हैं…

पर उन्हें तो बस अपना ही सोच प्यारा है,
किसी रिश्ते को बचाने की खातिर
खुद का बदलना भी गंवारा नहीं है…

मानता हूँ हालात बदलते हैं,
पर इन सब में हम क्यों बदल जाते हैं…
जहाँ से शुरू किया था सफ़र,
वैसे फिर क्यों नहीं रह पाते हैं…

वक्त का काम तो बस
रास्तों को बदलना होता है,
पर इंसान अक्सर
अपना दिल ही बदल जाता है…

जो हाथ कभी सुकून देते थे,
वो धीरे धीरे छूटने लगते हैं…
जो रिश्ते रूह से जुड़े होते हैं,
वो भी वक़्त के साथ टूटने लगते हैं…

हालातों को उसके हाल पर छोड़ देना चाहिए,
हमें अपना साथ निभाना चाहिए…
जो रिश्ता भगवान ने हमारे हिस्से लिखा है,
बस उसे पूरी ईमानदारी से निभाना चाहिए…

हर बात में जीत ज़रूरी तो नहीं होती,
कभी रिश्तों के लिए हारना भी पड़ता है…
किसी अपने को अपना बनाए रखने के लिए,
कभी खुद को थोड़ा बदलना भी पड़ता है…

मोहब्बत सिर्फ़ अच्छे दिनों का नाम नहीं,
बुरे वक्त में भी साथ निभाना पड़ता है…
वरना आसान तो बहुत है छोड़ जाना,
मगर रिश्ता निभाने के लिए
दिल से दिल तक आना पड़ता है…

जो लोग हर हाल में साथ खड़े रहते हैं,
असल में वही अपने कहलाते हैं…
बाकी तो हालात बदलते ही,
धीरे धीरे बदल जाते हैं…

और सबसे ज्यादा दर्द तब होता है,
जब रिश्ता टूटता नहीं…
बस पहले जैसा नहीं रह जाता है…॥

Wednesday, 29 April 2026

हर किसी के लिए नहीं

अगर में कुछ कहूँ,
तो सुन लेना कुछ बात मेरी,
में हर किसी से सब कुछ कहता नहीं, 

अगर में आगे बढ़ूँ,
तो पकड़ लेना हाथ मेरा,
में हर किसी के साथ जुड़ता नहीं।

अगर में तुम्हारे साथ चलूँ,
तो चल देना साथ मेरे,
में हर किसी के साथ कदम बढ़ाता नहीं।

अगर में खामोश रहूँ,
तो समझ लेना हाल मेरा,
में हर किसी को अपना दर्द बताता नहीं।

अगर में मुस्कुरा दूँ,
तो पहचान लेना वजह मेरी,
में हर किसी के लिए यूँ हँसता नहीं।

अगर में ठहर जाऊँ कहीं,
तो जगह दे देना पास अपने,
में हर किसी के पास यूँ ठहर जाता नहीं।

अगर में नज़रें मिलाऊँ,
तो पढ़ लेना आँखों की बात,
में हर किसी से यूँ नज़रें मिलाता नहीं।

अगर में वक्त दूँ तुझे,
तो समझ लेना अहमियत मेरी,
में हर किसी के लिए यूँ वक्त बनता नहीं।

अगर में नाम लूँ तेरा,
तो महसूस करना अपनापन,
में हर किसी को यूँ यादों में लाता नहीं।

अगर में रूठ जाऊँ कभी,
तो मना लेना मुझे,
में हर किसी से यूँ उलझता नहीं।

अगर में मना लूँ तुझे तो
मान लेना प्यार मेरा,
में हर किसी को यूँ मनाता नहीं।

अगर में साथ निभाऊँ तो
यकीन करना मेरे इरादों पर,
में हर किसी के लिए यूँ ठहरता नहीं।

अगर में तुझे चुन लूँ तो
समझ लेना फैसला मेरा,
में हर किसी को यूँ चुनता नहीं।

अगर में तेरा हो जाऊँ तो
संभाल लेना साथ मेरा,
में हर किसी का यूँ होता नहीं।

अगर में आख़िर तक तेरा रहूँ तो
यकीन करना इस बात पर,
ईश्वर ऐसे रिश्ते हर किसी को देता नहीं।

Friday, 24 April 2026

लौट आएगी

वो उलझी हुई है फ़िलहाल,
अपनी ही बनाई दिमाग़ी दुनिया में...
जहाँ वो मेरी होने से भी डरती है,
और मुझे खोने से भी.....

खुद से ही लड़ती रहती है हर रोज़,
अपने ही खयालों के साए में…
कभी पास आने की चाहत,
तो कभी दूर जाने के बहाने में…

मैं समझता हूँ उसकी खामोशी को,
ये कोई बेवफ़ाई नहीं है…
बस डर है उसे उस मोहब्बत से,
जो कभी आधी रह जाए कहीं…

वो चाहती तो है मुझे पूरे दिल से,
पर जताने से घबराती है…
इधर-उधर की बातें बनाती है,
इस बहाने थोड़ा करीब आ जाती है…

मैं भी समझता हूँ उसकी उलझन,
उसके हर डर को पहचानता हूँ…
इसलिए उसे बाँधने की कोशिश नहीं,
बस दूर से ही उसका साथ निभाता हूँ…

वो जितना मुझसे दूर भागती है,
मैं उतना ही ठहर जाता हूँ…
हर बार उसे खोने के डर से नहीं,
उसे समझने के सब्र से रुक जाता हूँ…

एक दिन वो खुद से जीत जाएगी,
अपने ही सवालों से निकल आएगी…
और बिना कुछ कहे ही शायद,
मेरे पास लौट आएगी…

यारों की कमी हो गई

यारों के साथ वाली हंसी गुम हो गई,
वो अल्हड़पन की शरारतें,
बिना टॉपिक के बेतुकी बातें,
और सुबह-शाम की मुलाक़ातें कम हो गईं।

अब हर कोई अपनी दुनिया में उलझा है,
वक्त जैसे हाथों से फिसलता सा लगता है,
जो बातें घंटों चला करती थीं पहले,
अब "बाद में बात करते हैं" में सिमटता सा लगता है।

कभी चाय की टपरी पर जो महफ़िल सजती थी,
आज वो यादों के कोने में ठहरी रह गई,
हँसी तो आज भी आती है चेहरे पर,
पर वो दिल से निकली खिलखिलाहट कहीं खो गई।

ना जाने ये ज़िम्मेदारियों का असर है,
या वक्त का कोई अनकहा सा खेल,
मिलते तो आज भी बहुत से लोगों से,
पर “अपने” कहीं रास्तों में बिछड़ते चले गए।

Thursday, 23 April 2026

मौकापरस्ती का गहना

मौकापरस्ती बहुत पुराना गहना है,
जो सिर्फ़ स्वार्थी लोगों पर ही सजता है।

चेहरों पर मुस्कान, दिल में हिसाब रखते हैं,
रिश्तों को भी ये लोग मुनाफ़े से तौलते हैं।

वक्त के साथ रंग बदलना इनकी आदत है,
हर मोड़ पर खुद की ही इबादत है।

सच और जज़्बात इनसे दूर ही रहते हैं,
ये लोग मतलब के मौसम में ही बहते हैं।

ये लालची लोग इसी गहने के लालची होते हैं,
इसे उतार फेंकने की कूवत रखते नहीं।

पर याद रखना, ये चमक ज़्यादा देर टिकती नहीं,
मौकापरस्ती की चमक में असलियत छिपती नहीं।

आख़िर में वही दिलों में बसते हैं,
जो इन गहनों के मोह से दूर रहते हैं।

Monday, 20 April 2026

तुम गए नहीं

तुम गए....
पर सच कहूँ, सब कुछ गया नहीं…
उम्मीद अब भी है—कुछ बिगड़ा नहीं।

थोड़ी-सी कसक
और बहुत-सा इंतज़ार,
उलझे हुए मसलों के
कभी तो सुलझ जाने का करार।

हर सुबह…
आशा की एक किरण
आज भी मेरे कमरे में
चुपके से तुम्हारा नाम कह जाती है।

कुछ शामें हैं…
जो आज भी अधूरी-सी ढलती हैं,
जैसे तुम्हारे बिना
दिन पूरा होना भूल गया हो।

कुछ खामोशियाँ हैं…
जो अब भी तुम्हारी आहट में चलती हैं,
और दिल को हर बार
तुम्हारी ओर मोड़ जाती हैं।

वक़्त ने समझाया…
सब पीछे छोड़ दो… आगे बढ़ो…

पर दिल ने धीरे से कहा…
कुछ रिश्ते खत्म नहीं होते,
बस शोर छोड़कर
खामोशी में उतर जाते हैं…

और फिर वहीं कहीं,
भीतर की गहराइयों में
धीरे-धीरे बस जाते हैं…

Sunday, 19 April 2026

किश्तों की कहानी

वो बरसों से अपने आप को समझा रहा था,
अपने हिस्से के सपनों को दबा रहा था,
तराश रहा था अपने बुढ़ापे को जवानी में,
हर ख्वाहिश को चुपचाप मिटा रहा था।

हँसता था वो सबकी खुशियों के बीच,
अपने दर्द को अंदर ही छुपा रहा था,
कंधों पर जिम्मेदारियों का बोझ लिए,
खुद से ही रोज़ समझौता किए जा रहा था।

जिस उम्र में जीना था खुलकर उसे,
वो बस जिम्मेदारियां बढ़ाता रहा,
खुद को हर बार गिरवी रखता था,
उसके बदले परिवार की किश्त चुकता रहा।

जितनी बार संभलने का सोचा,
हर बार जिम्मेदारियों ने टोका,
भीड़ में वो अकेला चलता रहा,
अपना वजूद खुद में ही खोता रहा।

कितने ही दर्द वो अकेला पी गया,
कई बार मौत को जी गया,
वो अकेला ही हांफता रहा,
कर्ज चुकाने की दूरियों को नापता रहा।

इतना करने के बाद भी उसे सजा मिल जाती है,
कभी ब्याज बढ़ जाता है, तो कभी किश्त चूक जाती है,
जिंदगी चाहे जितना इम्तिहान ले ले,
वो हर बार खड़ा होता है—और कहानी बन जाती है।

हेमन्त 🍁

Friday, 17 April 2026

वक्त तो लगता है

जी हां, वक्त तो लगता है,

कभी ज़िंदगी को समझने में,
तो कभी खुद को बदलने में।
कभी किसी की यादों से निकलने में,
तो कभी उन्हीं में फिर से उलझ जाने में,

कभी दिल को समझाने में,
तो कभी उसकी ज़िद के आगे हार जाने में।

वक्त लगता है…
किसी अपने को भुलाने में,
या उसे हर रोज़ थोड़ा-थोड़ा खोने में,
कभी सच को स्वीकारने में,
तो कभी झूठ में ही सुकून ढूंढने में।

ये दिल—
जिससे दूर जाना चाहता है,
उसी के पास लौट-लौट जाता है…

और हम—
बस खड़े रह जाते हैं बीच रास्ते में,
न पूरी तरह छोड़ पाते हैं,
न पूरी तरह अपना पाते हैं।

पर शायद…
यही सफर हमें सिखाता है—
कि हर रिश्ता मुकम्मल नहीं होता,
और हर अधूरी कहानी
बेकार भी नहीं होती …

Friday, 13 March 2026

अपने मन का

जो जैसा कहे, सबके मन का करते जाऊँ मैं —
कोई ये तो बताए अपना मन लेकर कहाँ जाऊँ मैं…!!

सबको खुश रखने की कोशिश में,
खुद से ही दूर होता जाऊँ मैं।
हर चेहरे पर मुस्कान सजाऊँ,
पर भीतर से टूटता जाऊँ मैं।

कभी किसी की उम्मीद बनूँ,
कभी किसी की मजबूरी बन जाऊँ मैं।
हर दिल की बात निभाते-निभाते,
अपने दिल की आवाज़ कहाँ सुन पाऊँ मैं।

थक जाता है मन भी कभी-कभी,
पर ये दर्द किसे बताऊँ मैं।
दुनिया की खुशियों के मेले में,
अपना अकेलापन कहाँ छुपाऊँ मैं।

कभी सोचता हूँ अपने मन का भी कर पाऊँ मैं,
इस भीड़ से थोड़ा अलग हो जाऊँ मैं।
सबके मन का करते-करते,
कभी तो अपने मन का भी कर जाऊँ मैं…।

Monday, 9 March 2026

तेरी कमी

“तेरी कमी तुझसे ही पूरी होगी,
किसी और का मैं क्या करूँगा।
जो खालीपन तेरे नाम से भरा है,
उसे किसी और से कैसे भरूँगा।

अगर मेरे मर्ज़ का इलाज तू है,
तो फिर दवा का मैं क्या करूँगा।
तेरी एक मुस्कान ही काफ़ी है मुझे,
हर दर्द से मैं यूँ ही लड़ लूँगा।

अगर तू साथ नहीं, वही सबसे बड़ी बेचैनी है,
तेरे बिना सुकून में रहकर मैं क्या करूँगा।
तेरी बाहों की जो आदत लग चुकी है,
उस आदत से खुद को कैसे दूर रखूँगा।

अगर तेरी मौजूदगी मेरी फ़ितरत बन गई है,
तो तेरे बिना मैं कैसे रहूँगा।
जिस दिल ने धड़कना तुझसे सीखा है,
उसे किसी और के हवाले कैसे करूँगा।

मेरा सवाल भी तू, और जवाब भी तू ही है,
तेरे सिवा मैं किससे क्या पूछूँगा।
अगर तेरे साथ मैं खुश नहीं,
तो दुनिया के सामने मुस्कुराकर क्या करूँगा।”

उनकी ख़ामोशी में प्यार

वो चाहते हैं उन्हें चाहा भी जाए,
और उनसे कोई उम्मीद भी न लगाई जाए।
हर नज़र में उनकी तस्वीर बसी रहे,
और उन्हें देखा भी ना जाए।

उनकी दुनिया में आप शामिल ना रहें,
आपकी ज़िंदगी में कोई और आ ना पाए।
वो महकते रहें आपकी रूह में इत्र की तरह,
आपको किसी और की खुशबू भी न आए।

आपकी हर दुआ में उनका ही नाम रहे,
पर उन्हें कभी पुकारा भी न जाए।
आप टूटें तो भी उनकी खातिर मुस्कुराएँ,
और उनका हाल पूछना भी ज़रूरी न समझा जाए।

आपके ख्वाबों में वो बेधड़क उतर आएँ,
पर आपको उनके ख्वाब में जगह न दी जाए।
आप हर मोड़ पर बस उनका इंतज़ार करें,
और वो आएँ… या न आएँ, कुछ कहा न जाए।

वो चाहते हैं मोहब्बत मुकम्मल मिले,
पर उस मोहब्बत का हिसाब न लगाया जाए।
उनकी ख़ामोशी में प्यार बस यूँ ही रहे,
चाहा जाए बेइंतहा…
पर कभी जताया न जाए।

🌙 “तुम मेरे साथ तो है ना...”

जिस दिन पहली बार नज़रें मिली थीं,
दिल अजीब-सी कसक के साथ धड़कने लगा था,
पता नहीं क्यों… पर उसी पल एक हूक उठी—
दिल ने बस इतना पूछा…
तुम मेरे साथ तो है ना....

फिर दोस्ती इतनी गहरी हुई,
कि हर मुस्कान में तेरा चेहरा बस गया,
और दर्द भी मीठा लगने लगा था—
उसी मीठे दर्द में फिर सवाल उठा…
तुम मेरे साथ तो है ना....

हम छुप-छुपकर मिलते थे,
पर दुनिया से छुपे प्यार में भी एक डर था,
डर कि कहीं ये पल बिखर न जाए—
उस डर ने हल्का-सा कांपकर कहा…
तुम मेरे साथ तो है ना....

घंटों बातें करते थे हम,
जैसे वक्त हमारे लिए ठहर जाता हो,
और खामोशियाँ भी रोमांस बन जाती थीं—
खामोशी ने भी फुसफुसाकर पूछा…
तुम मेरे साथ तो है ना....

फिर वो दिन आया जब तू चली गई,
दिल जैसे किसी ने झटके से तोड़ दिया,
सवाल बहुत थे… जवाब कोई नहीं—
टूटा हुआ दिल बस यही जानना चाहता था…
तुम मेरे साथ तो है ना....

सालों तक सिर्फ तेरी आवाज़ सुनी,
तेरा चेहरा स्क्रीन की रोशनी में चमकता था,
और मैं हर रात उसी रोशनी में सो जाता था—
इस रोशनी ने भी जैसे कहा…
तुम मेरे साथ तो है ना....

दूरी ने मुझे भीतर-ही-भीतर राख कर दिया,
तेरी यादें सीने में सुलगती रहीं,
पर इन्हीं यादों ने मुझे जिंदा भी रखा—
उस जलन में भी एक आवाज़ उठती थी…
तुम मेरे साथ तो है ना....

फिर एक दिन तू वापस आई,
जैसे टूटी साँसें अचानक जुड़ गई हों,
मेरे होंठ कांपे… पर दिल मुस्कुराया—
मुस्कान ने धीरे से पुकारा…
तुम मेरे साथ तो है ना....

फिर वही नोक-झोंक,
वही रूठना-मनाना, वही आँखों में प्यार,
हर दर्द फिर से खूबसूरत लगने लगा—
प्यार ने फिर से याद दिलाया…
तुम मेरे साथ तो है ना....

अब जब भी तुझे देखता हूँ,
तो लगता है प्यार कहीं गया ही नहीं,
बस रूह में चुपचाप सोया था—
रूह ने भी धीमे से कहा…
तुम मेरे साथ तो है ना....

कई बार एक सवाल मन में उठता है,
अंदर तक दिल को हिला जाता है,
नहीं जानता मैं सही हूँ या गलत—
पर दिल का एक एहसास बार-बार कहता है…
तुम मेरे साथ तो है ना....

जहाँ तक का साथ

ज़िंदगी एक लंबा सफर है।
इस सफर में मंज़िल से ज़्यादा मायने रखता है — साथ।
कुछ लोग थोड़ी दूर तक साथ चलते हैं,
कुछ पूरी उम्र तक,
और कुछ बस यादों में रह जाने के लिए मिलते हैं।
मगर जो भी पल किसी अपने के साथ जी लिए जाएँ,
वही बाद में जीवन की सबसे कीमती यादें बन जाते हैं।
इन्हीं पलों और इसी साथ की अहमियत को समर्पित ये पंक्तियाँ…

जहाँ तक का साथ है वहाँ तक तो चले चलो,
राह में मुश्किलें बहुत हैं — किसी को तो साथ ले चलो।
कौन जाने किस मोड़ पर राहें बदल जाएँ,
आज जो साथ है कल वो बिछड़ जाए ।

मंज़िल मिले न मिले ये किस्मत की बात है,
सफर के हसीन लम्हे साथ में जीते चलो।
शिकायतें बहुत मिलेंगी इस दुनिया की राह में,
पर दिलों में प्यार का दिया रोशन किए चले चलो।

याद रखना — नहीं भुला पाओगे साथ वाले पल,
कल कभी नहीं आएँगे आज जैसे ये पल।
तन्हा सफर तो कट जाएगा किसी तरह मगर,
जी न पाए तो फिर लौटकर नहीं आएगा ये पल।

वक़्त की रफ़्तार सब कुछ बदल देती है,
अपना ही जीवन कभी मुश्किल कर देती है।
बस इन्हीं पलों के लिए किसी को साथ लिए चलो,
एक-दूजे की हिम्मत बनो और साथ दिए चलो।

हँसी की वो बातें, बेवजह के वो सिलसिले,
दिल में कहीं चुपके से घर बना जाते हैं।
जब तन्हाई में कभी यादों की हवा चलती है,
यही पल आँखों में नमी बनकर आ जाते हैं।

इसलिए जो आज है उसे दिल से जी लो,
मुस्कुराहटों की हवा को यूँ ही बहने दो।
कल की चिंता में आज को मत खो देना,
इस पल को ही जी लो — इसे जी भर के जी लो।

कौन कब बिछड़ जाए ये वक़्त ही तय करता है,
हर रिश्ता अपनी उम्र लेकर ही चलता है।
इसलिए जो साथ है उसे दिल से निभा लो,
कल सिर्फ यादें ही रहेंगी — आज को जी भर के जी लो।


सफर में मंज़िल से ज़्यादा कीमती साथ होता है,
क्योंकि मंज़िल मिल भी जाए —
पर साथ देने वाले दोबारा नहीं मिलते। ✨

थोड़ी फिजूल की बातें किया करो

फिजूल की बातें अपनों से ही होती हैं,
जैसे दरिया आकर समुंदर में मिलती हैं।
दिल को सुकून वहीं मिलता है अक्सर,
जहाँ बिना वजह भी बातें खिलती हैं।

कभी हँसी में, कभी यूँ ही खामोशी में,
रिश्तों की गहराई धीरे-धीरे ढलती है।
दुनिया से जो बातें कह नहीं पाते हम,
वो अपनों की चौखट पर ही निकलती हैं।

बुरे तो नहीं, पर बुरी बातें तो रहती हैं,
यही बातें हमको बुरा होने नहीं देतीं।
दिल में कितनी भी कड़वाहट क्यों न आ जाए,
अपनों की याद हमें पत्थर होने नहीं देती।

कभी गुस्से में लफ़्ज़ थोड़े तीखे हो जाते हैं,
पर रिश्तों की जड़ इतनी कमज़ोर नहीं होती।
थोड़ी खटास ही तो मिठास बचाए रखती है,
वरना हर बात में सच्चाई भी नहीं होती।

ऐसी फ़िज़ूल की बातें किया करो,
एक पल में हज़ार जीवन जिया करो।
हँसी में थोड़ा सा बचपन भी रखा करो,
गंभीरता में खुद को मत खोया करो।

हर लम्हा इतना कीमती नहीं होता,
कुछ लम्हों को यूँ ही बहने दिया करो।
ज़िंदगी सिर्फ़ समझने की चीज़ नहीं,
कभी-कभी बस दिल से जिया करो।

चलो आज फिर बेवजह हँस लिया जाए,
थोड़ी सी नादानी में जी लिया जाए।
अगर यही फ़िज़ूल बातें सुकून देती हैं,
तो आओ इन्हें दिल खोलकर किया जाए।

ना तुम चुप रहो ना हम चुप रहें

तुम कहते रहे और हम सुनते रहे,
दिलों की दास्तां पर बातें करते रहे।
लफ़्ज़ों में जैसे कोई अपना सा घर था,
हर बात में अपनापन महसूस करते रहे।

ठहाकों में समय निकलता गया,
वो कितना पास था महसूस हो गया।
हँसी की ओट में कितनी शामें ढल गईं,
और हर पल जैसे और भी खास हो गया।

कभी किस्सों में, कभी यादों में खोए रहे,
छोटी-छोटी बातों पर भी हम रोए-हँसे रहे।
वो साथ किसी सुकून की छाँव सा लगता था,
जिसमें बैठकर हम दुनिया से दूर होते रहे।

लगता था जैसे सब कुछ कह दिया हमने,
हर राज़ दिल का बयाँ कर दिया हमने।
पर कुछ एहसास दिल में ऐसे भी ठहरे रहे,
जिन्हें महसूस तो किया… पर कह न सके हम।

फिर एक दिन चुप्पी ने जगह बना ली,
बातों की महफ़िल भी खामोश हो चली।
जो रिश्ता हँसी में इतना अपना लगता था,
वही दूरी की राह पर धीरे-धीरे चल पड़ा।

इसलिए अपनों से कभी चुप ना होना,
बातों का सिलसिला यूँ ही जारी रखना।
कौन कब उड़ जाए समय की हवा में,
हर पल अपनों को दिलों में संजोए रखना ।

Sunday, 8 March 2026

दुःखी मन मेरा

जब मेरा दिल दुखता है,
फिर किसी से नहीं संभलता है।
लाख मना ले कोई मुझे,
बहुत ही मुश्किल से पिघलता है।

होंठों पर चुप्पी सी जम जाती है,
अंदर ही अंदर कुछ जलता है।
लोग समझते हैं बस रूठा हूँ मैं,
पर अंदर ही अंदर दिल खामोशी से टूटता है।

भीड़ में हँसता हुआ दिखता हूँ,
जैसे मुझमें कुछ भी बदलता है।
पर तन्हाई की लंबी रातों में,
मेरा दर्द ही मुझसे मिलता है।

समझाने को तो बहुत आते हैं,
पर दर्द कहाँ किसी से बदलता है।
जो दिल पर बीतती है चुपचाप,
वो शब्दों में कहाँ निकलता है।

अब समझ आया है धीरे-धीरे,
क्यों दिल इतना संभलता है।
एक बार जो गहरा टूट जाए,
वो फिर मुश्किल से पिघलता है।

कथा भी तुम, व्यथा भी तुम

तुम धैर्य हो,
तुम ही अधीर हो।

तुम कथा हो,
तुम ही व्यथा हो।

तुम अनंत हो,
तुम ही अंत हो।

तुम भाग्य हो,
तुम ही भोग्य हो।

तुम वरदान हो,
तुम ही श्राप हो।

तुम ममता हो,
तुम ही कठोर हो।

तुम कोमल हो,
तुम ही प्रखर हो।

तुम विश्वास हो,
तुम ही संदेह हो।

तुम समर्पण हो,
तुम ही स्वाभिमान हो।

तुम शांति हो,
तुम ही तूफ़ान हो।

तुम सृजन हो,
तुम ही संहार हो।

तुम करुणा हो,
तुम ही प्रहार हो।

तुम लज्जा हो,
तुम ही साहस हो।

तुम सरल हो,
तुम ही जटिल हो।

तुम मुस्कान हो,
तुम ही पीड़ा हो।

तुम मरहम हो,
तुम ही ज़ख़्म हो।

तुम आस हो,
तुम ही निराश हो।

तुम चाहत हो,
तुम ही विरक्ति हो।

तुम रहस्य हो,
तुम ही स्पष्ट हो।

तुम प्रश्न हो,
तुम ही उत्तर हो।

तुम छाया हो,
तुम ही धूप हो।

तुम आरंभ हो,
तुम ही अंत हो।

तुम शक्ति हो,
तुम ही कमजोरी हो।

तुम ही जन्म देती,
तुम ही मृत्यु का कारण बनती।

तुम ही खुशी देती,
तुम ही दुख का कारण होती।

तुम ही जीवन संवारती,
तुम ही जीवन बिखेरती।

तुम ही घर बसाती,
तुम ही घर उजाड़ती।

तुम ही प्रेम सिखाती,
तुम ही विरह जगा देती।

तुम ही आस जगाती,
तुम ही मन तोड़ देती।

पर जब तुम्हें क्रोध आता है,
तुम धैर्य सारा खो देती हो।

क्षण भर के उस अंधेपन में,
तुम संतुलन सब खो देती हो।

जो घर तुमने प्रेम से रचा था,
उसे शब्दों से तोड़ देती हो।

वर्षों से जो रिश्ते जुड़े थे,
उन्हें पल में तार-तार कर देती हो।

मर्यादा की सीमा भूल जाती,
विवेक की आवाज़ खो देती हो।

क्रोध की उस ज्वाला में,
तुम विध्वंसक बन जाती हो।

सहन-शक्ति जब थक जाती है,
अधीरता हावी हो जाती है।

फिर मनमानी राह पकड़ लेती हो,
तर्क की डोर छूट जाती है।

भावनाओं की कद्र नहीं रहती,
बस आक्रोश बोलता रहता है।

फिर अपनी ही मर्जी चलती है,
न किसी का कहना सुनती है।

न रिश्तों की आहट सुनती हो,
न अपनों का मान रखती हो।

उस एक क्रोध की घड़ी में,
तुम अपना संसार ही तोड़ती हो।

पर जब क्रोध की आग बुझती है,
तब मन फिर पिघल जाता है।

जो दिल कभी पत्थर लगता था,
वही फिर आँसू बन जाता है।

जो रिश्ते तुमने तोड़े थे,
उन्हें फिर जोड़ने लगती हो।

जो शब्दों से घायल किए थे,
उन पर मरहम रखने लगती हो।

तुम तूफ़ान भी बन जाती हो,
और तुम ही शांति लाती हो।

तुम बिखेर भी देती हो सब,
और फिर खुद ही समेटती हो।

तुम सब कुछ हो इस जीवन में,
धैर्य भी, ममता भी, अभिमान भी।

सृजन भी तुम, विध्वंस भी तुम,
शक्ति भी तुम, अरमान भी।

पर कभी-कभी लगता है फिर भी,
तुम एक बात भूल जाती हो।

क्रोध की उस एक घड़ी में,
अपने ही घर को जला जाती हो।

जो दिल तुम्हें अपना मानते हैं,
कभी वही सबसे ज़्यादा रोते हैं।

तुम्हारी एक जिद की आंधी में,
कई रिश्ते चुपचाप खोते हैं।

वो आग भी है, वो पानी भी,
वो पीड़ा है, कहानी भी।

वो ज़ख़्म भी देती दुनिया को,
और मरहम की निशानी भी।

कभी आँचल में जग बसाती है,
कभी शब्दों से उसे रुलाती है।

कभी क्रोध में सब खो देती है,
कभी प्रेम से सब पा जाती है।

वो पहेली भी है जीवन की,
और उसका हल भी वही।

वो भूल भी कर बैठती है,
और उसका पश्चाताप भी वही।

वो धूप भी है, वो छाँव भी है,
वो प्रश्न भी है, उत्तर भी है।

वो आँधी भी है, ठहराव भी है,
वो दर्द भी है, चाव भी है।

इसीलिए शायद सच यही है,
उसे समझना आसान नहीं।

वो गहराई है समंदर जैसी,
जिसका कोई किनारा नहीं।

वो संसार की सबसे सुंदर रचना है,
पर उसका मन पूरा उसका ही नहीं।

Friday, 27 February 2026

खामोशी का मलबा

हवाओं ने रुख क्या बदला,
सारे पत्तों ने अपनी जगह छोड़ दी,
हम जड़ थे, सो जमे रहे,
और आँधियों ने राह मोड़ ली।

कल तक सवार था उनका जुनून माथे पर,
आज उसी याद ने नींदें तोड़ दीं,
जिस नाम से सजती थीं हर सुबहें,
उसी नाम ने शामें निचोड़ दीं।

हमने खामोशी को भी वफ़ा समझा,
उन्होंने खामोशी से ही बात मोड़ ली,
हम तो ठहरे रहे उसी चौखट पर कुछ देर,
उन्होंने उन राहों से परछाईं भी मोड़ ली।

सच तो ये है, हेमंत…
तुम एक ही दिन में नहीं टूटे हो,
इतने सालों की वफ़ा के धागों को
एक ही झटके में अपने हाथों से तोड़े गए हो।

अब नहीं पूरा होगा वो सफ़रनामा
जिस पर टिका था जीवन हमारा,
हम उम्र भर धागों-सा बुनते रहे,
उन्होंने एक ही झटके में उधेड़ दिया सारा ताना-बाना।

हम सालों से घर बनाते रहे,
वो एक लम्हे में मलबा कर गए,
हम साँसों से सींचते रहे रिश्ता,
वो खामोशी से बंजर कर गए।

हवाएँ आज भी चलती हैं,
पर अब पत्ते गिरने का डर नहीं,
क्योंकि पेड़ खड़ा तो है अभी,
बस हरियाली उसका घर नहीं।

और अंत में बस इतना जाना —

उम्मीदें मत रखो, बस निभाते जाओ,
अपनी ही चाहत को समझाते जाओ,
तुम्हें हक नहीं है सवाल करने का —
ये भी खुद को ही सिखाते जाओ।