Friday, 13 March 2026

अपने मन का

जो जैसा कहे, सबके मन का करते जाऊँ मैं —
कोई ये तो बताए अपना मन लेकर कहाँ जाऊँ मैं…!!

सबको खुश रखने की कोशिश में,
खुद से ही दूर होता जाऊँ मैं।
हर चेहरे पर मुस्कान सजाऊँ,
पर भीतर से टूटता जाऊँ मैं।

कभी किसी की उम्मीद बनूँ,
कभी किसी की मजबूरी बन जाऊँ मैं।
हर दिल की बात निभाते-निभाते,
अपने दिल की आवाज़ कहाँ सुन पाऊँ मैं।

थक जाता है मन भी कभी-कभी,
पर ये दर्द किसे बताऊँ मैं।
दुनिया की खुशियों के मेले में,
अपना अकेलापन कहाँ छुपाऊँ मैं।

कभी सोचता हूँ अपने मन का भी कर पाऊँ मैं,
इस भीड़ से थोड़ा अलग हो जाऊँ मैं।
सबके मन का करते-करते,
कभी तो अपने मन का भी कर जाऊँ मैं…।

Monday, 9 March 2026

तेरी कमी

“तेरी कमी तुझसे ही पूरी होगी,
किसी और का मैं क्या करूँगा।
जो खालीपन तेरे नाम से भरा है,
उसे किसी और से कैसे भरूँगा।

अगर मेरे मर्ज़ का इलाज तू है,
तो फिर दवा का मैं क्या करूँगा।
तेरी एक मुस्कान ही काफ़ी है मुझे,
हर दर्द से मैं यूँ ही लड़ लूँगा।

अगर तू साथ नहीं, वही सबसे बड़ी बेचैनी है,
तेरे बिना सुकून में रहकर मैं क्या करूँगा।
तेरी बाहों की जो आदत लग चुकी है,
उस आदत से खुद को कैसे दूर रखूँगा।

अगर तेरी मौजूदगी मेरी फ़ितरत बन गई है,
तो तेरे बिना मैं कैसे रहूँगा।
जिस दिल ने धड़कना तुझसे सीखा है,
उसे किसी और के हवाले कैसे करूँगा।

मेरा सवाल भी तू, और जवाब भी तू ही है,
तेरे सिवा मैं किससे क्या पूछूँगा।
अगर तेरे साथ मैं खुश नहीं,
तो दुनिया के सामने मुस्कुराकर क्या करूँगा।”

उनकी ख़ामोशी में प्यार

वो चाहते हैं उन्हें चाहा भी जाए,
और उनसे कोई उम्मीद भी न लगाई जाए।
हर नज़र में उनकी तस्वीर बसी रहे,
और उन्हें देखा भी ना जाए।

उनकी दुनिया में आप शामिल ना रहें,
आपकी ज़िंदगी में कोई और आ ना पाए।
वो महकते रहें आपकी रूह में इत्र की तरह,
आपको किसी और की खुशबू भी न आए।

आपकी हर दुआ में उनका ही नाम रहे,
पर उन्हें कभी पुकारा भी न जाए।
आप टूटें तो भी उनकी खातिर मुस्कुराएँ,
और उनका हाल पूछना भी ज़रूरी न समझा जाए।

आपके ख्वाबों में वो बेधड़क उतर आएँ,
पर आपको उनके ख्वाब में जगह न दी जाए।
आप हर मोड़ पर बस उनका इंतज़ार करें,
और वो आएँ… या न आएँ, कुछ कहा न जाए।

वो चाहते हैं मोहब्बत मुकम्मल मिले,
पर उस मोहब्बत का हिसाब न लगाया जाए।
उनकी ख़ामोशी में प्यार बस यूँ ही रहे,
चाहा जाए बेइंतहा…
पर कभी जताया न जाए।

🌙 “तुम मेरे साथ तो है ना...”

जिस दिन पहली बार नज़रें मिली थीं,
दिल अजीब-सी कसक के साथ धड़कने लगा था,
पता नहीं क्यों… पर उसी पल एक हूक उठी—
दिल ने बस इतना पूछा…
तुम मेरे साथ तो है ना....

फिर दोस्ती इतनी गहरी हुई,
कि हर मुस्कान में तेरा चेहरा बस गया,
और दर्द भी मीठा लगने लगा था—
उसी मीठे दर्द में फिर सवाल उठा…
तुम मेरे साथ तो है ना....

हम छुप-छुपकर मिलते थे,
पर दुनिया से छुपे प्यार में भी एक डर था,
डर कि कहीं ये पल बिखर न जाए—
उस डर ने हल्का-सा कांपकर कहा…
तुम मेरे साथ तो है ना....

घंटों बातें करते थे हम,
जैसे वक्त हमारे लिए ठहर जाता हो,
और खामोशियाँ भी रोमांस बन जाती थीं—
खामोशी ने भी फुसफुसाकर पूछा…
तुम मेरे साथ तो है ना....

फिर वो दिन आया जब तू चली गई,
दिल जैसे किसी ने झटके से तोड़ दिया,
सवाल बहुत थे… जवाब कोई नहीं—
टूटा हुआ दिल बस यही जानना चाहता था…
तुम मेरे साथ तो है ना....

सालों तक सिर्फ तेरी आवाज़ सुनी,
तेरा चेहरा स्क्रीन की रोशनी में चमकता था,
और मैं हर रात उसी रोशनी में सो जाता था—
इस रोशनी ने भी जैसे कहा…
तुम मेरे साथ तो है ना....

दूरी ने मुझे भीतर-ही-भीतर राख कर दिया,
तेरी यादें सीने में सुलगती रहीं,
पर इन्हीं यादों ने मुझे जिंदा भी रखा—
उस जलन में भी एक आवाज़ उठती थी…
तुम मेरे साथ तो है ना....

फिर एक दिन तू वापस आई,
जैसे टूटी साँसें अचानक जुड़ गई हों,
मेरे होंठ कांपे… पर दिल मुस्कुराया—
मुस्कान ने धीरे से पुकारा…
तुम मेरे साथ तो है ना....

फिर वही नोक-झोंक,
वही रूठना-मनाना, वही आँखों में प्यार,
हर दर्द फिर से खूबसूरत लगने लगा—
प्यार ने फिर से याद दिलाया…
तुम मेरे साथ तो है ना....

अब जब भी तुझे देखता हूँ,
तो लगता है प्यार कहीं गया ही नहीं,
बस रूह में चुपचाप सोया था—
रूह ने भी धीमे से कहा…
तुम मेरे साथ तो है ना....

कई बार एक सवाल मन में उठता है,
अंदर तक दिल को हिला जाता है,
नहीं जानता मैं सही हूँ या गलत—
पर दिल का एक एहसास बार-बार कहता है…
तुम मेरे साथ तो है ना....

जहाँ तक का साथ

ज़िंदगी एक लंबा सफर है।
इस सफर में मंज़िल से ज़्यादा मायने रखता है — साथ।
कुछ लोग थोड़ी दूर तक साथ चलते हैं,
कुछ पूरी उम्र तक,
और कुछ बस यादों में रह जाने के लिए मिलते हैं।
मगर जो भी पल किसी अपने के साथ जी लिए जाएँ,
वही बाद में जीवन की सबसे कीमती यादें बन जाते हैं।
इन्हीं पलों और इसी साथ की अहमियत को समर्पित ये पंक्तियाँ…

जहाँ तक का साथ है वहाँ तक तो चले चलो,
राह में मुश्किलें बहुत हैं — किसी को तो साथ ले चलो।
कौन जाने किस मोड़ पर राहें बदल जाएँ,
आज जो साथ है कल वो बिछड़ जाए ।

मंज़िल मिले न मिले ये किस्मत की बात है,
सफर के हसीन लम्हे साथ में जीते चलो।
शिकायतें बहुत मिलेंगी इस दुनिया की राह में,
पर दिलों में प्यार का दिया रोशन किए चले चलो।

याद रखना — नहीं भुला पाओगे साथ वाले पल,
कल कभी नहीं आएँगे आज जैसे ये पल।
तन्हा सफर तो कट जाएगा किसी तरह मगर,
जी न पाए तो फिर लौटकर नहीं आएगा ये पल।

वक़्त की रफ़्तार सब कुछ बदल देती है,
अपना ही जीवन कभी मुश्किल कर देती है।
बस इन्हीं पलों के लिए किसी को साथ लिए चलो,
एक-दूजे की हिम्मत बनो और साथ दिए चलो।

हँसी की वो बातें, बेवजह के वो सिलसिले,
दिल में कहीं चुपके से घर बना जाते हैं।
जब तन्हाई में कभी यादों की हवा चलती है,
यही पल आँखों में नमी बनकर आ जाते हैं।

इसलिए जो आज है उसे दिल से जी लो,
मुस्कुराहटों की हवा को यूँ ही बहने दो।
कल की चिंता में आज को मत खो देना,
इस पल को ही जी लो — इसे जी भर के जी लो।

कौन कब बिछड़ जाए ये वक़्त ही तय करता है,
हर रिश्ता अपनी उम्र लेकर ही चलता है।
इसलिए जो साथ है उसे दिल से निभा लो,
कल सिर्फ यादें ही रहेंगी — आज को जी भर के जी लो।


सफर में मंज़िल से ज़्यादा कीमती साथ होता है,
क्योंकि मंज़िल मिल भी जाए —
पर साथ देने वाले दोबारा नहीं मिलते। ✨

थोड़ी फिजूल की बातें किया करो

फिजूल की बातें अपनों से ही होती हैं,
जैसे दरिया आकर समुंदर में मिलती हैं।
दिल को सुकून वहीं मिलता है अक्सर,
जहाँ बिना वजह भी बातें खिलती हैं।

कभी हँसी में, कभी यूँ ही खामोशी में,
रिश्तों की गहराई धीरे-धीरे ढलती है।
दुनिया से जो बातें कह नहीं पाते हम,
वो अपनों की चौखट पर ही निकलती हैं।

बुरे तो नहीं, पर बुरी बातें तो रहती हैं,
यही बातें हमको बुरा होने नहीं देतीं।
दिल में कितनी भी कड़वाहट क्यों न आ जाए,
अपनों की याद हमें पत्थर होने नहीं देती।

कभी गुस्से में लफ़्ज़ थोड़े तीखे हो जाते हैं,
पर रिश्तों की जड़ इतनी कमज़ोर नहीं होती।
थोड़ी खटास ही तो मिठास बचाए रखती है,
वरना हर बात में सच्चाई भी नहीं होती।

ऐसी फ़िज़ूल की बातें किया करो,
एक पल में हज़ार जीवन जिया करो।
हँसी में थोड़ा सा बचपन भी रखा करो,
गंभीरता में खुद को मत खोया करो।

हर लम्हा इतना कीमती नहीं होता,
कुछ लम्हों को यूँ ही बहने दिया करो।
ज़िंदगी सिर्फ़ समझने की चीज़ नहीं,
कभी-कभी बस दिल से जिया करो।

चलो आज फिर बेवजह हँस लिया जाए,
थोड़ी सी नादानी में जी लिया जाए।
अगर यही फ़िज़ूल बातें सुकून देती हैं,
तो आओ इन्हें दिल खोलकर किया जाए।

ना तुम चुप रहो ना हम चुप रहें

तुम कहते रहे और हम सुनते रहे,
दिलों की दास्तां पर बातें करते रहे।
लफ़्ज़ों में जैसे कोई अपना सा घर था,
हर बात में अपनापन महसूस करते रहे।

ठहाकों में समय निकलता गया,
वो कितना पास था महसूस हो गया।
हँसी की ओट में कितनी शामें ढल गईं,
और हर पल जैसे और भी खास हो गया।

कभी किस्सों में, कभी यादों में खोए रहे,
छोटी-छोटी बातों पर भी हम रोए-हँसे रहे।
वो साथ किसी सुकून की छाँव सा लगता था,
जिसमें बैठकर हम दुनिया से दूर होते रहे।

लगता था जैसे सब कुछ कह दिया हमने,
हर राज़ दिल का बयाँ कर दिया हमने।
पर कुछ एहसास दिल में ऐसे भी ठहरे रहे,
जिन्हें महसूस तो किया… पर कह न सके हम।

फिर एक दिन चुप्पी ने जगह बना ली,
बातों की महफ़िल भी खामोश हो चली।
जो रिश्ता हँसी में इतना अपना लगता था,
वही दूरी की राह पर धीरे-धीरे चल पड़ा।

इसलिए अपनों से कभी चुप ना होना,
बातों का सिलसिला यूँ ही जारी रखना।
कौन कब उड़ जाए समय की हवा में,
हर पल अपनों को दिलों में संजोए रखना ।

Sunday, 8 March 2026

दुःखी मन मेरा

जब मेरा दिल दुखता है,
फिर किसी से नहीं संभलता है।
लाख मना ले कोई मुझे,
बहुत ही मुश्किल से पिघलता है।

होंठों पर चुप्पी सी जम जाती है,
अंदर ही अंदर कुछ जलता है।
लोग समझते हैं बस रूठा हूँ मैं,
पर अंदर ही अंदर दिल खामोशी से टूटता है।

भीड़ में हँसता हुआ दिखता हूँ,
जैसे मुझमें कुछ भी बदलता है।
पर तन्हाई की लंबी रातों में,
मेरा दर्द ही मुझसे मिलता है।

समझाने को तो बहुत आते हैं,
पर दर्द कहाँ किसी से बदलता है।
जो दिल पर बीतती है चुपचाप,
वो शब्दों में कहाँ निकलता है।

अब समझ आया है धीरे-धीरे,
क्यों दिल इतना संभलता है।
एक बार जो गहरा टूट जाए,
वो फिर मुश्किल से पिघलता है।

कथा भी तुम, व्यथा भी तुम

तुम धैर्य हो,
तुम ही अधीर हो।

तुम कथा हो,
तुम ही व्यथा हो।

तुम अनंत हो,
तुम ही अंत हो।

तुम भाग्य हो,
तुम ही भोग्य हो।

तुम वरदान हो,
तुम ही श्राप हो।

तुम ममता हो,
तुम ही कठोर हो।

तुम कोमल हो,
तुम ही प्रखर हो।

तुम विश्वास हो,
तुम ही संदेह हो।

तुम समर्पण हो,
तुम ही स्वाभिमान हो।

तुम शांति हो,
तुम ही तूफ़ान हो।

तुम सृजन हो,
तुम ही संहार हो।

तुम करुणा हो,
तुम ही प्रहार हो।

तुम लज्जा हो,
तुम ही साहस हो।

तुम सरल हो,
तुम ही जटिल हो।

तुम मुस्कान हो,
तुम ही पीड़ा हो।

तुम मरहम हो,
तुम ही ज़ख़्म हो।

तुम आस हो,
तुम ही निराश हो।

तुम चाहत हो,
तुम ही विरक्ति हो।

तुम रहस्य हो,
तुम ही स्पष्ट हो।

तुम प्रश्न हो,
तुम ही उत्तर हो।

तुम छाया हो,
तुम ही धूप हो।

तुम आरंभ हो,
तुम ही अंत हो।

तुम शक्ति हो,
तुम ही कमजोरी हो।

तुम ही जन्म देती,
तुम ही मृत्यु का कारण बनती।

तुम ही खुशी देती,
तुम ही दुख का कारण होती।

तुम ही जीवन संवारती,
तुम ही जीवन बिखेरती।

तुम ही घर बसाती,
तुम ही घर उजाड़ती।

तुम ही प्रेम सिखाती,
तुम ही विरह जगा देती।

तुम ही आस जगाती,
तुम ही मन तोड़ देती।

पर जब तुम्हें क्रोध आता है,
तुम धैर्य सारा खो देती हो।

क्षण भर के उस अंधेपन में,
तुम संतुलन सब खो देती हो।

जो घर तुमने प्रेम से रचा था,
उसे शब्दों से तोड़ देती हो।

वर्षों से जो रिश्ते जुड़े थे,
उन्हें पल में तार-तार कर देती हो।

मर्यादा की सीमा भूल जाती,
विवेक की आवाज़ खो देती हो।

क्रोध की उस ज्वाला में,
तुम विध्वंसक बन जाती हो।

सहन-शक्ति जब थक जाती है,
अधीरता हावी हो जाती है।

फिर मनमानी राह पकड़ लेती हो,
तर्क की डोर छूट जाती है।

भावनाओं की कद्र नहीं रहती,
बस आक्रोश बोलता रहता है।

फिर अपनी ही मर्जी चलती है,
न किसी का कहना सुनती है।

न रिश्तों की आहट सुनती हो,
न अपनों का मान रखती हो।

उस एक क्रोध की घड़ी में,
तुम अपना संसार ही तोड़ती हो।

पर जब क्रोध की आग बुझती है,
तब मन फिर पिघल जाता है।

जो दिल कभी पत्थर लगता था,
वही फिर आँसू बन जाता है।

जो रिश्ते तुमने तोड़े थे,
उन्हें फिर जोड़ने लगती हो।

जो शब्दों से घायल किए थे,
उन पर मरहम रखने लगती हो।

तुम तूफ़ान भी बन जाती हो,
और तुम ही शांति लाती हो।

तुम बिखेर भी देती हो सब,
और फिर खुद ही समेटती हो।

तुम सब कुछ हो इस जीवन में,
धैर्य भी, ममता भी, अभिमान भी।

सृजन भी तुम, विध्वंस भी तुम,
शक्ति भी तुम, अरमान भी।

पर कभी-कभी लगता है फिर भी,
तुम एक बात भूल जाती हो।

क्रोध की उस एक घड़ी में,
अपने ही घर को जला जाती हो।

जो दिल तुम्हें अपना मानते हैं,
कभी वही सबसे ज़्यादा रोते हैं।

तुम्हारी एक जिद की आंधी में,
कई रिश्ते चुपचाप खोते हैं।

वो आग भी है, वो पानी भी,
वो पीड़ा है, कहानी भी।

वो ज़ख़्म भी देती दुनिया को,
और मरहम की निशानी भी।

कभी आँचल में जग बसाती है,
कभी शब्दों से उसे रुलाती है।

कभी क्रोध में सब खो देती है,
कभी प्रेम से सब पा जाती है।

वो पहेली भी है जीवन की,
और उसका हल भी वही।

वो भूल भी कर बैठती है,
और उसका पश्चाताप भी वही।

वो धूप भी है, वो छाँव भी है,
वो प्रश्न भी है, उत्तर भी है।

वो आँधी भी है, ठहराव भी है,
वो दर्द भी है, चाव भी है।

इसीलिए शायद सच यही है,
उसे समझना आसान नहीं।

वो गहराई है समंदर जैसी,
जिसका कोई किनारा नहीं।

वो संसार की सबसे सुंदर रचना है,
पर उसका मन पूरा उसका ही नहीं।