तुम धैर्य हो,
तुम ही अधीर हो।
तुम कथा हो,
तुम ही व्यथा हो।
तुम अनंत हो,
तुम ही अंत हो।
तुम भाग्य हो,
तुम ही भोग्य हो।
तुम वरदान हो,
तुम ही श्राप हो।
तुम ममता हो,
तुम ही कठोर हो।
तुम कोमल हो,
तुम ही प्रखर हो।
तुम विश्वास हो,
तुम ही संदेह हो।
तुम समर्पण हो,
तुम ही स्वाभिमान हो।
तुम शांति हो,
तुम ही तूफ़ान हो।
तुम सृजन हो,
तुम ही संहार हो।
तुम करुणा हो,
तुम ही प्रहार हो।
तुम लज्जा हो,
तुम ही साहस हो।
तुम सरल हो,
तुम ही जटिल हो।
तुम मुस्कान हो,
तुम ही पीड़ा हो।
तुम मरहम हो,
तुम ही ज़ख़्म हो।
तुम आस हो,
तुम ही निराश हो।
तुम चाहत हो,
तुम ही विरक्ति हो।
तुम रहस्य हो,
तुम ही स्पष्ट हो।
तुम प्रश्न हो,
तुम ही उत्तर हो।
तुम छाया हो,
तुम ही धूप हो।
तुम आरंभ हो,
तुम ही अंत हो।
तुम शक्ति हो,
तुम ही कमजोरी हो।
तुम ही जन्म देती,
तुम ही मृत्यु का कारण बनती।
तुम ही खुशी देती,
तुम ही दुख का कारण होती।
तुम ही जीवन संवारती,
तुम ही जीवन बिखेरती।
तुम ही घर बसाती,
तुम ही घर उजाड़ती।
तुम ही प्रेम सिखाती,
तुम ही विरह जगा देती।
तुम ही आस जगाती,
तुम ही मन तोड़ देती।
पर जब तुम्हें क्रोध आता है,
तुम धैर्य सारा खो देती हो।
क्षण भर के उस अंधेपन में,
तुम संतुलन सब खो देती हो।
जो घर तुमने प्रेम से रचा था,
उसे शब्दों से तोड़ देती हो।
वर्षों से जो रिश्ते जुड़े थे,
उन्हें पल में तार-तार कर देती हो।
मर्यादा की सीमा भूल जाती,
विवेक की आवाज़ खो देती हो।
क्रोध की उस ज्वाला में,
तुम विध्वंसक बन जाती हो।
सहन-शक्ति जब थक जाती है,
अधीरता हावी हो जाती है।
फिर मनमानी राह पकड़ लेती हो,
तर्क की डोर छूट जाती है।
भावनाओं की कद्र नहीं रहती,
बस आक्रोश बोलता रहता है।
फिर अपनी ही मर्जी चलती है,
न किसी का कहना सुनती है।
न रिश्तों की आहट सुनती हो,
न अपनों का मान रखती हो।
उस एक क्रोध की घड़ी में,
तुम अपना संसार ही तोड़ती हो।
पर जब क्रोध की आग बुझती है,
तब मन फिर पिघल जाता है।
जो दिल कभी पत्थर लगता था,
वही फिर आँसू बन जाता है।
जो रिश्ते तुमने तोड़े थे,
उन्हें फिर जोड़ने लगती हो।
जो शब्दों से घायल किए थे,
उन पर मरहम रखने लगती हो।
तुम तूफ़ान भी बन जाती हो,
और तुम ही शांति लाती हो।
तुम बिखेर भी देती हो सब,
और फिर खुद ही समेटती हो।
तुम सब कुछ हो इस जीवन में,
धैर्य भी, ममता भी, अभिमान भी।
सृजन भी तुम, विध्वंस भी तुम,
शक्ति भी तुम, अरमान भी।
पर कभी-कभी लगता है फिर भी,
तुम एक बात भूल जाती हो।
क्रोध की उस एक घड़ी में,
अपने ही घर को जला जाती हो।
जो दिल तुम्हें अपना मानते हैं,
कभी वही सबसे ज़्यादा रोते हैं।
तुम्हारी एक जिद की आंधी में,
कई रिश्ते चुपचाप खोते हैं।
वो आग भी है, वो पानी भी,
वो पीड़ा है, कहानी भी।
वो ज़ख़्म भी देती दुनिया को,
और मरहम की निशानी भी।
कभी आँचल में जग बसाती है,
कभी शब्दों से उसे रुलाती है।
कभी क्रोध में सब खो देती है,
कभी प्रेम से सब पा जाती है।
वो पहेली भी है जीवन की,
और उसका हल भी वही।
वो भूल भी कर बैठती है,
और उसका पश्चाताप भी वही।
वो धूप भी है, वो छाँव भी है,
वो प्रश्न भी है, उत्तर भी है।
वो आँधी भी है, ठहराव भी है,
वो दर्द भी है, चाव भी है।
इसीलिए शायद सच यही है,
उसे समझना आसान नहीं।
वो गहराई है समंदर जैसी,
जिसका कोई किनारा नहीं।
वो संसार की सबसे सुंदर रचना है,
पर उसका मन पूरा उसका ही नहीं।