Friday, 28 November 2025

तू इतना जरूरी क्यों है

तू इतना भी ज़रूरी क्यों होता है,
मेरा है—पर मेरे हिस्से में आता भी नहीं,
फिर भी खयालों में रहता है—
शायद ज़िद है दिल की,
ओर ये दिल है कि, मानता ही नहीं है।

दिनभर की थकान के बाद
सुकून की नींद सुलाता भी तू ही है,
सपनों में रहता है—
सुबह उठता भी तू ही है।
तू इतना ज़रूरी क्यों होता है?

मेरे अनगिनत अनसुलझे सवाल
इनके जवाब लाता भी तू ही है
मेरे हर मोड, हर गली के रास्ते
मंजिल पर पहुंचाता भी तो तू ही है ।

जब भी मैं निराश हूँ तो
तू ही तो आशा की किरण ले आता है ।
में तो तेरा कोई भी नहीं लगता
फिर भी तू ही इतना ज़रूरी क्यों होता है?

सबर नहीं होता तुझसे मिलने का,
तू दूर है, पर लगता सबसे करीब-सा है,
जैसे हवा को छू न पाएं, पर महसूस सा लगता है,
वैसे ही… हर पल तू ही ज़रूरी होता है।

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