Thursday, 11 September 2025

ए इश्क़ — तू क्या चाहे

 ए इश्क़ तू क्या चाहे,
थोड़ा सा अदब और
प्यार के दो बोल चाहे।

चोरी-चोरी, चुपके से मिलना,
और फिर ढेर सारी बातें करना चाहे।

कभी खामोश लम्हों को याद बना दे,
तो कभी छोटी से बात में रूठ जाना चाहे।

घंटों तक एक-दूजे की राह तकना,
मिलते ही फिर मासूम-सा झगड़ना चाहे।

ना जाने कितने झगड़े,
और अंत में बस इक समझौता चाहे।

कभी हंसी में आंसू छुपाना,
कभी आंसुओं में सुकून पाना चाहे।

रात रात भर बात करना और
आखिर में लड़कर रोना चाहे।

ए इश्क़—तेरी बड़ी अजीब चाह है,
हम तेरे रहे या ना रहें, तू क्या चाहे।

कभी कभी दिल को तोड़ना
फिर मुझे ही समझाना चाहे।

खुद को धीमा दर्द देना चाहे,
फिर उसी दर्द में राहत भी पाना चाहे।

बार बार तुझ पर मरना चाहे,
मर मर कर तेरे साथ जीना चाहे।

ये रोना चाहे, हंसना चाहे,
तेरे इश्क में फ़ना होना चाहे।

ए इश्क जिद ना कर, 
आज तो तू बता,
तू मुझसे क्या चाहे ।

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