कुछ पुरानी यादों से मिल आया।
आज की भगमभग वाली ज़िंदगी,
और नकली हँसी पीछे छोड़ आया।
कंचों की चमक, गिल्ली-डंडे का शोर,
फिर से मन को अपना बना आया।
माँ की पुकार, आँगन की रौनक,
उस मिट्टी की खुशबू संग लाया।
बचपन के खिलौने, गलियों के कोने,
सपनों के महल और मिट्टी के खिलौने।
पेड़ की छाँव तले बैठना घंटों,
नदी के पानी में पत्थर गिन-गिन फेंकना।
गुड़िया की शादी, गुड्डे का घरौंदा,
पतंगों की डोर में उलझा किस्सा।
बरसात में कागज़ की नावों का सफ़र,
धूप में आम के पेड़ों पर चढ़ने का हुनर।
माँ की पुकार पर खेल का रुक जाना,
नानी की कहानियों में खो जाना।
आज मैं अपने गाँव हो आया,
थोड़ा-सा बचपन फिर जी आया।
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