Sunday, 7 September 2025

तुम



तुम्हें लगता है मेरे हो तुम,
मगर मेरे नहीं हो तुम।
हर धड़कन में गूंजते हो तुम,
पर धड़कन के संग नहीं हो तुम।

सपनों की चौखट पे ठहरते हो तुम,
सुबह होते ही खो जाते हो तुम।
जैसे अधूरी कोई दुआ हो तुम,
जो लबों पे रह जाते हो तुम।

बारिश की वो पहली बूंद हो तुम,
ज़मीन तक आते ही बिखर जाती हो तुम।
धूप की वो नर्म किरण हो तुम,
जो छूकर भी अक्सर जला जाती हो तुम।

मैं चाहता हूँ थाम लो मुझको तुम,
जैसे हर रिश्तों को थामती हो तुम।
मगर किस्मत के सख़्त हाथ हो तुम,
हमें हर बार दूर कर निकल जाते हो तुम।

तुम्हें लगता है मेरे हो तुम,
पर ये सच्चाई है कि गुम हो गई हो तुम।
में मुसाफिर सा खड़ा रह गया, 
इस बार बहुत दूर निकल गई तुम ।।

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