Friday, 18 September 2026

मैं तुम्हें फिर मिलूँगा

मैं तुम्हें फिर मिलूँगा,
किसी शाम की तन्हाई में,
जब तुम चुपचाप बैठी होगी,
अपने ही सवालों की गहराई में।

मैं तुम्हें फिर मिलूँगा,
किसी पुराने ख़त के लफ़्ज़ों में,
जहाँ कुछ बातें अधूरी होंगी,
और कुछ आँसू होंगे ख़ामोशियों में।

मैं तुम्हें फिर मिलूँगा,
किसी अनजान-सी राह पर,
शायद तुम पहचान न पाओ,
पर मैं ठहर जाऊँगा तुम्हारी आहट पर।

मैं तुम्हें फिर मिलूँगा,
न कोई शिकायत होगी, न सवाल,
बस एक मुस्कान होगी चेहरे पर,
और आँखों में वही पुराना ख़याल।

मैं तुम्हें फिर मिलूँगा,
जब उम्र बहुत आगे निकल जाएगी,
जब ज़िंदगी सारी थक जाएगी,
और यादें ही पास रह जाएँगी।

मैं तुम्हें फिर मिलूँगा…
मगर इस बार कोई हक़ नहीं माँगूँगा,
बस दूर से तुम्हें देखकर,
चुपचाप मुस्कुरा दूँगा।

क्योंकि कुछ रिश्ते
मिलने के लिए नहीं होते…
बस उम्रभर महसूस करने के लिए होते हैं।

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