ना तुम मेरे हो,
ना मेरे साथ हो,
ना तुम पर मेरा हक़ है,
फिर भी क्यों इतने ख़ास हो।
ना जज़्बातों का मेला है,
ना ख़्वाहिशों का रेला है,
ना इस दिल में तुम हो,
फिर भी दिल में झमेला है।
ना तुमसे कोई वादा है,
ना तुमसे कोई शिकायत है,
फिर भी तेरी ख़ामोशी से,
मेरे मन में एक पश्चाताप है।
ना तुम्हें पाने की चाहत है,
ना तुम्हें रोकने की ताक़त है,
फिर भी तेरे दूर जाने पर,
दिल को जाने क्यों आफ़त है।
ना तुम मेरी आदत हो,
ना मेरी कोई ज़रूरत हो,
फिर क्यों हर ख़ाली पल में,
तुम मेरी सबसे बड़ी कमी हो।
मैंने कभी तुमसे माँगा क्या,
बस थोड़ा-सा अपनापन था,
तुमने वो भी दे दिया होता,
तो शायद दर्द इतना कम था।
तुम्हें खोने का डर कैसा,
जब तुम कभी मेरे थे ही नहीं,
फिर भी ये दिल रोता है,
जैसे तुमसे ज़्यादा कोई था ही नहीं।
ना शिकायत कर सकता हूँ,
ना तुमसे सवाल कर सकता हूँ,
जिस रिश्ते पर हक़ ही नहीं,
उसका दर्द किससे बयां कर सकता हूँ।
कभी-कभी लगता है तुमसे,
दूर रहना ही बेहतर है,
फिर दिल कहता है—
तेरी यादों के बिना भी कौन-सा सवेरा है।
तुम मेरे नहीं हो,
ये सच मैं रोज़ समझता हूँ,
मगर दिल को कौन समझाए—
मैं तुम्हें आज भी अपना ही समझता हूँ।
शायद यही मेरी ख़ता है,
या दिल की कोई मजबूरी है,
तुमसे कोई रिश्ता नहीं मेरा,
फिर भी तुमसे दूरी अधूरी है।
ना तुम मेरे हो,
ना मेरे साथ हो,
ना तुम पर मेरा हक़ है,
बस एक एहसास हो…
जिसे अपना कह नहीं सकता,
जिसे भूल भी नहीं सकता,
जिससे कोई शिकायत नहीं,
फिर भी जिसके बिना
मैं रह भी नहीं सकता।
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