जब मन में हो महाभारत,
और दिल में हो रामायण,
तब बुद्धि बस मौन हो जाती,
ज्ञान की रोशनी अंधेरे में खो जाती।
अर्जुन-सा खड़ा होता हूँ मैं,
विचारों के गांडीव को लेकर रण में,
कभी कृष्ण की वाणी सुनता हूँ,
कभी दुर्योधन के अंतःमन में।
एक ओर शांत-सा गागर है,
जहाँ संयम की सीमा जगती है,
दूजी ओर हिंडोले मारता सागर है,
जहाँ तर्क की लहरें टूटती हैं।
राम की मर्यादा, लक्ष्मण की रेखा,
भाई में भाई का त्याग देखा है,
उधर दुर्योधन का अहम अनोखा,
मन में लाक्षागृह का धोखा है।
जहाँ सत्य और मोह टकराते हैं,
पाषाण भी सुमेरु बन जाते हैं,
जब धर्म के युद्ध में भाई लड़ जाते हैं,
तब कृष्ण भी — अर्जुन के हो जाते हैं।
आख़िर ये द्वंद कब तक चलेगा,
राम को रावण कब समझेगा?
जब तक भीतर युद्ध सुलगता है
मन में महाभारत चलता है ।
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