Wednesday, 29 October 2025

ज़िद है जितने की

आज सुलगा ही दो चिराग़ों को,
दो हिस्सों में फाड़ दो आग को।
दम खत्म नहीं — बस बदन थका है,
इरादा अब भी सीना ठोककर ज़िंदा खड़ा है।

आज भी गिरकर,
उठना आता है,
दम टूट जाए,
तब भी चलना आता है।

जो टूट गए,
वो मामूली काँच थे,
जिद पर आ जाएं तो,
लोहा मोड़ दें हाथ से।

जितनी बार गिरेंगे,
उतनी बार खुद को गढ़ेंगे।
न डरेंगे, न भागेंगे,
जीत की दास्तान अपने हाथ से लिखेंगे।

कई कसौटियों पर परखे जाएँगे,
खुद को आग में तपाएँगे।
तूफ़ानों में घिरी अपनी कश्ती को,
किनारे भी हम ही लगाएंगे।

आज पसीने को खून की तरह बहा दो,
मेहनत को अपनी ज़िद बना लो।
जो मंज़िल आज लगती है दूर,
कल वही बनाएगी तुम्हें असली कोहिनूर।

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