और मैं तुम्हें चुन लूँगा।
तुम अगर मुस्कुराकर भी कुछ छुपा लो,
मैं तुम्हारी आँखों से सब पढ़ लूँगा।
तुम्हें ज़रूरत न पड़े कुछ कहने की,
मैं हर बात ख़ामोशी में सुन लूँगा।
तुम अगर वक़्त की धूप में झुलस जाओ,
मैं छाँव बनकर हर क़दम चलूँगा।
तुम्हारे डर अगर मुझसे भी छुपे रहें,
मैं फिर भी तुम्हारा हौसला बनूँगा।
तुम जहाँ खुद से भी सवाल करोगी,
मैं वहीं तुम्हारा यक़ीन बनूँगा।
तुम बस अपना दिल चुन लेना,
और मैं उम्र भर तुम्हें चुन लूँगा।
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