वो आज भी अपने होने का सबब ढूंढती है,
ख़ामोश सवालों में अपना जवाब खोजती है।
जो भोर होने से पहले ही उठ जाती है,
वो अपने जीवन में उजाले की किरण खोजती है।
लगा देती है दाँव पर ज़िंदगी परिवार के लिए,
और बदले में फ़र्ज़ों की फेहरिस्त के निशान खोजती है।
सभी को ख़ुश करने में ख़ुद ही मिट जाती है,
पर वही थकान मिटने के लिए सुकून का कोना खोजती है।
घरों को चहचहा कर ज़िंदा रखने वाली,
अपने ही घर में हक़ मांगने का अधिकार खोजती है।
वो हर बार बिखरती है, फिर भी सवाल नहीं करती,
बस चुपचाप अपने होने का सबब खोजती है।
तब भी नहीं आने देती पैशानी पर सलवटें कभी,
अपनों के लिए अब भी मर-मिटने का जस्बा खोजती है।
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