Wednesday, 31 December 2025

मैं फिर लौटूंगा

टूट गया था मैं बिल्कुल,
हिम्मत साथ छोड़ने लगी थी,
खुद को समेट भी नहीं पा रहा था,
फिर भी कहीं भीतर
बच गया मैं।

दर्द हुआ था मुझे,
ऐसा जो किसी को दिखा नहीं,
दिन चलता रहा,
रात भारी होती गई,
फिर भी
बच गया मैं।

कड़वाहट भर गई थी मुझमें,
हर बात चुभने लगी थी,
अपनों से भी दूरी बनने लगी,
उस हाल में भी
बच गया मैं।

डर गया था मैं,
अपने ही ख्यालों से,
आगे का रास्ता धुंधला था,
पीछे कुछ बचा नहीं था,
तब भी
बच गया मैं।

घबरा गया था मैं,
जब सब कुछ हाथ से फिसलने लगा,
सवाल बहुत थे,
जवाब कहीं नहीं,
उस पल में भी
बच गया मैं।

लौटने वाला था मैं,
सब छोड़कर,
खुद से हार मानकर,
पर उसी मोड़ पर
बच गया मैं।

अब मैं चलता रहूँगा,
निडर होकर,
खुद को जोड़ता रहूँगा,
दर्द को पीछे छोड़कर—
मैं लौटूँगा फिर।

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