मगर बातें तो किया करो।
ख़ामोशी बहुत भारी पड़ती है,
कभी दो लफ़्ज़ों में ही जी लिया करो।
हमेशा मुस्कान ही सच नहीं होती,
कभी उदासी भी पढ़ लिया करो।
जो कह न सकूँ लफ़्ज़ों में मैं,
उसे मेरी आँखों से समझ लिया करो।
कभी साथ चलते नहीं हो मेरे,
थोड़े कदम मेरे संग बढ़ा लिया करो।
मंज़िलें यूँ ही आसान हो जाएँगी,
थोड़ा-सा मेरा भी हाथ थाम लिया करो।
अगर कभी थक जाओ रास्तों से,
तो मुझमें थोड़ा ठहर लिया करो।
मैं हर मोड़ पर साथ रहूँगा,
बस यूँ ही मेरा यक़ीन किया करो।
मुझसे नाराज़ होना सीखो ज़रा,
पर दूर कभी मत रहा करो ।
कुछ शिकवे मुझसे कह लिया करो,
ख़ामोशी में सब छोड़ मत दिया करो।
No comments:
Post a Comment