किसको झुकाना चाहती हो,
किससे जितना जताना चाहती हो?
ये कैसी जंग है तुम्हारी,
जिसमें कोई अपना संग नहीं है।
क्या पा लोगी इस सख़्ती से,
किसे और तोड़ोगी अपनी ख़ामोशी से ?
जहाँ पहले हँसी का बसेरा था,
अब सन्नाटे का डेरा है।
इस जिद का क्या मोल रहेगा,
जब साथ कोई अपना न रहेगा।
जब देखोगी आईने में तन्हा चेहरा,
तब समझोगी — ये सब था घना कोहरा ।
तुम्हारी ज़िद शायद जीत जाएगी,
पर तन्हाई की चुप्पी संग लाएगी।
जो एहसास रूह से जुड़े थे,
अब आँखों से अश्क बह रहे हैं ।
और कितनी ज़िद करोगी,
कितना और नुकसान करोगी...
ऐसे में न तुम सुकून पाओगी,
न सामने वाले को चैन दिलाओगी ।
प्यार कोई सौदा नहीं होता,
जिसका हिसाब लगाया जाए,
ये तो वो सजदा है —
जहाँ दिल नहीं, रूह झुक जाए।
तुम्हारी ज़िद ने दूर किए सारे अपने,
हर बार तोड़े भरोसे के सपने।
जो साथ थे तेरे हर मुश्किल में,
अब खामोश हैं अपनी मंज़िल में।
पर तुमने उस यक़ीन को ठुकरा दिया,
बस अपनी जिद को सच मान लिया।
और मैं चुप रहा — शायद यही सही था,
क्या हर बार तुम सही — और मैं ही ग़लत था?
एक आख़िरी बार मैं कोशिश करूँगा,
इस बार मैं तुम्हारी कुछ नहीं सुनूंगा।
खुद हार जाऊँ — वो चलेगा,
पर तुम्हारी ज़िद को अब जीतने नहीं दूँगा।
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