पर सच कहूँ, सब कुछ गया नहीं…
उम्मीद अब भी है—कुछ बिगड़ा नहीं।
थोड़ी-सी कसक
और बहुत-सा इंतज़ार,
उलझे हुए मसलों के
कभी तो सुलझ जाने का करार।
हर सुबह…
आशा की एक किरण
आज भी मेरे कमरे में
चुपके से तुम्हारा नाम कह जाती है।
कुछ शामें हैं…
जो आज भी अधूरी-सी ढलती हैं,
जैसे तुम्हारे बिना
दिन पूरा होना भूल गया हो।
कुछ खामोशियाँ हैं…
जो अब भी तुम्हारी आहट में चलती हैं,
और दिल को हर बार
तुम्हारी ओर मोड़ जाती हैं।
वक़्त ने समझाया…
सब पीछे छोड़ दो… आगे बढ़ो…
पर दिल ने धीरे से कहा…
कुछ रिश्ते खत्म नहीं होते,
बस शोर छोड़कर
खामोशी में उतर जाते हैं…
और फिर वहीं कहीं,
भीतर की गहराइयों में
धीरे-धीरे बस जाते हैं…
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