Friday, 17 April 2026

वक्त तो लगता है

जी हां, वक्त तो लगता है,

कभी ज़िंदगी को समझने में,
तो कभी खुद को बदलने में।
कभी किसी की यादों से निकलने में,
तो कभी उन्हीं में फिर से उलझ जाने में,

कभी दिल को समझाने में,
तो कभी उसकी ज़िद के आगे हार जाने में।

वक्त लगता है…
किसी अपने को भुलाने में,
या उसे हर रोज़ थोड़ा-थोड़ा खोने में,
कभी सच को स्वीकारने में,
तो कभी झूठ में ही सुकून ढूंढने में।

ये दिल—
जिससे दूर जाना चाहता है,
उसी के पास लौट-लौट जाता है…

और हम—
बस खड़े रह जाते हैं बीच रास्ते में,
न पूरी तरह छोड़ पाते हैं,
न पूरी तरह अपना पाते हैं।

पर शायद…
यही सफर हमें सिखाता है—
कि हर रिश्ता मुकम्मल नहीं होता,
और हर अधूरी कहानी
बेकार भी नहीं होती …

No comments:

Post a Comment