अपनी ही बनाई दिमाग़ी दुनिया में...
जहाँ वो मेरी होने से भी डरती है,
और मुझे खोने से भी.....
खुद से ही लड़ती रहती है हर रोज़,
अपने ही खयालों के साए में…
कभी पास आने की चाहत,
तो कभी दूर जाने के बहाने में…
मैं समझता हूँ उसकी खामोशी को,
ये कोई बेवफ़ाई नहीं है…
बस डर है उसे उस मोहब्बत से,
जो कभी आधी रह जाए कहीं…
वो चाहती तो है मुझे पूरे दिल से,
पर जताने से घबराती है…
इधर-उधर की बातें बनाती है,
इस बहाने थोड़ा करीब आ जाती है…
मैं भी समझता हूँ उसकी उलझन,
उसके हर डर को पहचानता हूँ…
इसलिए उसे बाँधने की कोशिश नहीं,
बस दूर से ही उसका साथ निभाता हूँ…
वो जितना मुझसे दूर भागती है,
मैं उतना ही ठहर जाता हूँ…
हर बार उसे खोने के डर से नहीं,
उसे समझने के सब्र से रुक जाता हूँ…
एक दिन वो खुद से जीत जाएगी,
अपने ही सवालों से निकल आएगी…
और बिना कुछ कहे ही शायद,
मेरे पास लौट आएगी…
No comments:
Post a Comment