वो अल्हड़पन की शरारतें,
बिना टॉपिक के बेतुकी बातें,
और सुबह-शाम की मुलाक़ातें कम हो गईं।
अब हर कोई अपनी दुनिया में उलझा है,
वक्त जैसे हाथों से फिसलता सा लगता है,
जो बातें घंटों चला करती थीं पहले,
अब "बाद में बात करते हैं" में सिमटता सा लगता है।
कभी चाय की टपरी पर जो महफ़िल सजती थी,
आज वो यादों के कोने में ठहरी रह गई,
हँसी तो आज भी आती है चेहरे पर,
पर वो दिल से निकली खिलखिलाहट कहीं खो गई।
ना जाने ये ज़िम्मेदारियों का असर है,
या वक्त का कोई अनकहा सा खेल,
मिलते तो आज भी बहुत से लोगों से,
पर “अपने” कहीं रास्तों में बिछड़ते चले गए।
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