वो बरसों से अपने आप को समझा रहा था,
अपने हिस्से के सपनों को दबा रहा था,
तराश रहा था अपने बुढ़ापे को जवानी में,
हर ख्वाहिश को चुपचाप मिटा रहा था।
हँसता था वो सबकी खुशियों के बीच,
अपने दर्द को अंदर ही छुपा रहा था,
कंधों पर जिम्मेदारियों का बोझ लिए,
खुद से ही रोज़ समझौता किए जा रहा था।
जिस उम्र में जीना था खुलकर उसे,
वो बस जिम्मेदारियां बढ़ाता रहा,
खुद को हर बार गिरवी रखता था,
उसके बदले परिवार की किश्त चुकता रहा।
जितनी बार संभलने का सोचा,
हर बार जिम्मेदारियों ने टोका,
भीड़ में वो अकेला चलता रहा,
अपना वजूद खुद में ही खोता रहा।
कितने ही दर्द वो अकेला पी गया,
कई बार मौत को जी गया,
वो अकेला ही हांफता रहा,
कर्ज चुकाने की दूरियों को नापता रहा।
इतना करने के बाद भी उसे सजा मिल जाती है,
कभी ब्याज बढ़ जाता है, तो कभी किश्त चूक जाती है,
जिंदगी चाहे जितना इम्तिहान ले ले,
वो हर बार खड़ा होता है—और कहानी बन जाती है।
हेमन्त 🍁
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