वो पार कर गए अपनी सारी हदें —
फिर भी उसकी कोई ख़ता न पाई।
उसके लिए तो रिश्ते बस टूटता हुआ एक दायरा थे,
मेरी बारी आई…
तो फिर उसे दायरे की याद आई।
उसकी चाहत के आगे कोई सरहद कभी नहीं ठहरी,
वो बंदिशें तोड़े तो कोई बात नहीं,
उसने मेरी हर कोशिश पर बस लगाम ही लगाई।
वो बेख़ौफ़ खेलते रहे अपनी मर्ज़ी की हर लकीर से,
और वही लकीर .....
सिर्फ़ मेरी बारी पर ही उसे फिर याद आई।
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