Wednesday, 26 November 2025

खुद से मुलाक़ात — एक सफ़र

कभी-कभी रो भी लेना चाहिए,
दिल का बोझ हल्का कर देना चाहिए।
जब बह जाएँ दर्द के सारे निशान,
तो आँसू पोंछकर फिर मुस्कुराना चाहिए।

कभी राह अकेली भी चुननी पड़ती है,
संग-साथ की भी कीमत चुकती है।
हिम्मत करो अकेले सफ़र को तय करने की—
न लगे मन को ठीक, तो वापस लौट आना चाहिए।

कभी-कभी खुद पर गुस्सा भी आ जाना चाहिए,
दबा दर्द आवाज़ बन बाहर आना चाहिए।
हर बार गुस्सा बुरा नहीं होता,
बस खुद को ही शांत करना आना चाहिए।

कभी दुख और तकलीफ़ भी उठानी चाहिए,
दूसरों की पीड़ा भी महसूस होनी चाहिए।
यही तो वक़्त बताता है—कौन है अपना,
और खुद को ही दर्द से निकालना आना चाहिए।

कभी खुद से भी शर्मिंदा हो जाना चाहिए,
दिल की सफ़ाई का सबूत मिल जाना चाहिए।
गलतियों से डरना नहीं, मानना है उन्हें,
सही राह पर फिर लौट आना चाहिए।

कभी-कभी टूटकर बिखरना भी आना चाहिए,
गिरकर फिर उठने का हुनर जगना चाहिए।
हम भी बिखरकर ही समझते हैं—
कि खुद को खुद से जोड़ना फिर से आना चाहिए।

कभी-कभी उलझनों से भी भिड़ जाना चाहिए,
ये रास्ते हैं, बंधन नहीं—मान जाना चाहिए।
इन राहों की पहचान जरूरी है,
और खुद को ही सुलझाना आना चाहिए।

कभी-कभी किसी की बात बुरी भी लग जानी चाहिए,
सच के घाव से दिल तप जाना चाहिए।
पर लौटना है आखिर खुद की ओर ही—
क्योंकि खुद को ही मानना और मनाना आना चाहिए।

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