बंधन दुनिया के तोड़े थे,
राहें बदल गई, मोड़ छूट गए,
क्या अब भी तुम वहीं हों ना।
हमने जो ख्वाब आधे-अधूरे बोए थे,
क्या उनकी ख़ुशबू तुम तक पहुँचती है,
रातों की ख़ामोशी में कहीं
मेरा नाम अब भी तुम पुकारते हो ना।
हम वक़्त से हारकर अलग तो हुए,
पर एहसासों की डोर कहाँ छूटी,
दिल के किसी चुप कोने में
धडकनों में अब भी मुझे ढूंढते हो ना।
जिसपे जानिसार थी सारी खुशियाँ,
वो थी मेरी खुशियों की बगियाँ,
छूटा था साथ जहाँ अपना—
अब भी तुम… शायद वहीं हो ना।
No comments:
Post a Comment