जिस दिन पहली बार नज़रें मिली थीं,
दिल अजीब-सी कसक के साथ धड़कने लगा था,
पता नहीं क्यों… पर उसी पल एक हूक उठी—
दिल ने बस इतना पूछा…
तुम मेरे साथ तो है ना....
फिर दोस्ती इतनी गहरी हुई,
कि हर मुस्कान में तेरा चेहरा बस गया,
और दर्द भी मीठा लगने लगा था—
उसी मीठे दर्द में फिर सवाल उठा…
तुम मेरे साथ तो है ना....
हम छुप-छुपकर मिलते थे,
पर दुनिया से छुपे प्यार में भी एक डर था,
डर कि कहीं ये पल बिखर न जाए—
उस डर ने हल्का-सा कांपकर कहा…
तुम मेरे साथ तो है ना....
घंटों बातें करते थे हम,
जैसे वक्त हमारे लिए ठहर जाता हो,
और खामोशियाँ भी रोमांस बन जाती थीं—
खामोशी ने भी फुसफुसाकर पूछा…
तुम मेरे साथ तो है ना....
फिर वो दिन आया जब तू चली गई,
दिल जैसे किसी ने झटके से तोड़ दिया,
सवाल बहुत थे… जवाब कोई नहीं—
टूटा हुआ दिल बस यही जानना चाहता था…
तुम मेरे साथ तो है ना....
सालों तक सिर्फ तेरी आवाज़ सुनी,
तेरा चेहरा स्क्रीन की रोशनी में चमकता था,
और मैं हर रात उसी रोशनी में सो जाता था—
इस रोशनी ने भी जैसे कहा…
तुम मेरे साथ तो है ना....
दूरी ने मुझे भीतर-ही-भीतर राख कर दिया,
तेरी यादें सीने में सुलगती रहीं,
पर इन्हीं यादों ने मुझे जिंदा भी रखा—
उस जलन में भी एक आवाज़ उठती थी…
तुम मेरे साथ तो है ना....
फिर एक दिन तू वापस आई,
जैसे टूटी साँसें अचानक जुड़ गई हों,
मेरे होंठ कांपे… पर दिल मुस्कुराया—
मुस्कान ने धीरे से पुकारा…
तुम मेरे साथ तो है ना....
फिर वही नोक-झोंक,
वही रूठना-मनाना, वही आँखों में प्यार,
हर दर्द फिर से खूबसूरत लगने लगा—
प्यार ने फिर से याद दिलाया…
तुम मेरे साथ तो है ना....
अब जब भी तुझे देखता हूँ,
तो लगता है प्यार कहीं गया ही नहीं,
बस रूह में चुपचाप सोया था—
रूह ने भी धीमे से कहा…
तुम मेरे साथ तो है ना....
कई बार एक सवाल मन में उठता है,
अंदर तक दिल को हिला जाता है,
नहीं जानता मैं सही हूँ या गलत—
पर दिल का एक एहसास बार-बार कहता है…
तुम मेरे साथ तो है ना....
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