कोई ये तो बताए अपना मन लेकर कहाँ जाऊँ मैं…!!
सबको खुश रखने की कोशिश में,
खुद से ही दूर होता जाऊँ मैं।
हर चेहरे पर मुस्कान सजाऊँ,
पर भीतर से टूटता जाऊँ मैं।
कभी किसी की उम्मीद बनूँ,
कभी किसी की मजबूरी बन जाऊँ मैं।
हर दिल की बात निभाते-निभाते,
अपने दिल की आवाज़ कहाँ सुन पाऊँ मैं।
थक जाता है मन भी कभी-कभी,
पर ये दर्द किसे बताऊँ मैं।
दुनिया की खुशियों के मेले में,
अपना अकेलापन कहाँ छुपाऊँ मैं।
कभी सोचता हूँ अपने मन का भी कर पाऊँ मैं,
इस भीड़ से थोड़ा अलग हो जाऊँ मैं।
सबके मन का करते-करते,
कभी तो अपने मन का भी कर जाऊँ मैं…।
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