Monday, 9 March 2026

ना तुम चुप रहो ना हम चुप रहें

तुम कहते रहे और हम सुनते रहे,
दिलों की दास्तां पर बातें करते रहे।
लफ़्ज़ों में जैसे कोई अपना सा घर था,
हर बात में अपनापन महसूस करते रहे।

ठहाकों में समय निकलता गया,
वो कितना पास था महसूस हो गया।
हँसी की ओट में कितनी शामें ढल गईं,
और हर पल जैसे और भी खास हो गया।

कभी किस्सों में, कभी यादों में खोए रहे,
छोटी-छोटी बातों पर भी हम रोए-हँसे रहे।
वो साथ किसी सुकून की छाँव सा लगता था,
जिसमें बैठकर हम दुनिया से दूर होते रहे।

लगता था जैसे सब कुछ कह दिया हमने,
हर राज़ दिल का बयाँ कर दिया हमने।
पर कुछ एहसास दिल में ऐसे भी ठहरे रहे,
जिन्हें महसूस तो किया… पर कह न सके हम।

फिर एक दिन चुप्पी ने जगह बना ली,
बातों की महफ़िल भी खामोश हो चली।
जो रिश्ता हँसी में इतना अपना लगता था,
वही दूरी की राह पर धीरे-धीरे चल पड़ा।

इसलिए अपनों से कभी चुप ना होना,
बातों का सिलसिला यूँ ही जारी रखना।
कौन कब उड़ जाए समय की हवा में,
हर पल अपनों को दिलों में संजोए रखना ।

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