Sunday, 8 March 2026

दुःखी मन मेरा

जब मेरा दिल दुखता है,
फिर किसी से नहीं संभलता है।
लाख मना ले कोई मुझे,
बहुत ही मुश्किल से पिघलता है।

होंठों पर चुप्पी सी जम जाती है,
अंदर ही अंदर कुछ जलता है।
लोग समझते हैं बस रूठा हूँ मैं,
पर अंदर ही अंदर दिल खामोशी से टूटता है।

भीड़ में हँसता हुआ दिखता हूँ,
जैसे मुझमें कुछ भी बदलता है।
पर तन्हाई की लंबी रातों में,
मेरा दर्द ही मुझसे मिलता है।

समझाने को तो बहुत आते हैं,
पर दर्द कहाँ किसी से बदलता है।
जो दिल पर बीतती है चुपचाप,
वो शब्दों में कहाँ निकलता है।

अब समझ आया है धीरे-धीरे,
क्यों दिल इतना संभलता है।
एक बार जो गहरा टूट जाए,
वो फिर मुश्किल से पिघलता है।

No comments:

Post a Comment